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फिर घुसपैठ की रणनीति

Wed, 24 Apr 2013 10:31 PM IST
बी. रमन
बी. रमन Updated Wed, 24 Apr 2013 10:31 PM IST
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row with china in ladakh

भारत और चीन की पश्चिमी सीमा क्षेत्र में पूर्वी लद्दाख के दौलत बेग ओल्डी सेक्टर (डीबीओ) में बर्थे के पास चीनी सेनाओं की घुसपैठ भारत के लिए गंभीर विश्लेषण और चिंता का विषय होना चाहिए, लेकिन इसे चेतावनी नहीं मान सकते।

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बीजिंग ने भारतीय क्षेत्र में ऐसी किसी भी घुसपैठ को खारिज किया है। जबकि भारत वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर दोनों देशों की अलग-अलग राय को इस घुसपैठ की वजह मान रहा है, इसीलिए वह सामान्य प्रक्रिया के तहत इसे सुलझाना चाह रहा है।
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ताजा घुसपैठ इस क्षेत्र में चीन के क्षेत्रीय संप्रभुता के दावे को अमली जामा पहनाने की शुरुआत मानने का पुख्ता सुबूत तो नहीं है।

हां, इसके पीछे चीन की यह मंशा जरूर हो सकती है कि वह सीमा पर शांति का माहौल बिगाड़े बगैर इस इलाके पर अपनी संप्रभुता का दावा फिर से पेश करे।

फिलहाल चीनी सेना एक शिविर में ठहरी हुई है। हमारे लिए चिंता तब हो सकती है, जब चीनी सैनिक यहां ठहर कर स्थायी शिविर बनाने की कोशिश करें, जैसा अमूमन वे दक्षिणी चीन सागर के वीरान द्वीपों पर करते हैं।
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दक्षिणी और पूर्वी चीन सागरों पर बसे द्वीपों पर संप्रभुता के अपने दावों को लेकर पिछले वर्ष से चीन कुछ ज्यादा ही आग्रही दिख रहा है।

ऐसी खबरें हैं कि चीन ने इनमें से कुछ द्वीपों पर स्थायी तौर पर रक्षा और प्रशासनिक ढांचा बना लिया है, जिनको लेकर उसका वियतनाम और फिलीपींस से विवाद भी चल रहा है।

पूर्वी चीन सागर में संप्रभुता को लेकर जापान के साथ चल रहे विवाद के मद्देनजर चीन ने वहां ऐसे स्थायी निर्माणों से बचना सही समझा है।

फिर भी उन द्वीपों के आसपास चीनी वायुसेना और नौसेना के आक्रामक गश्ती दलों की नजर बनी हुई है। चीनी नौसेना ने दक्षिणी चीन सागर के उन द्वीपों पर भी अपने अभियान तेज कर दिए हैं, जिन पर बीजिंग अपना अधिकार जताता रहा है।

दक्षिणी और पूर्वी चीन सागर में अपनी संप्रभुता के दावे को लेकर चीन की अब तक जैसी सक्रियता दिखी है, वैसी भारत-चीन सीमा पर नहीं।

घुसपैठ के ताजा मामले में अगर चीनी सेना भारतीय क्षेत्र में रुकती है और सैन्य ढांचों का निर्माण करती है, तो इसका मतलब होगा कि भारत-चीन सीमा के संदर्भ में भी उन्होंने उसी आक्रामक नीति को अपनाने का फैसला किया है, जो उसने दक्षिणी और पूर्वी चीन सागर में अपनाई है।

इससे सीमाओं की सुरक्षा के मामले में हमारी चिंताएं बढ़नी चाहिए। यह नौबत भी आ सकती है कि हम शांति और धीरज वाली अपनी नीति पर पुनर्विचार करें और चीन की सक्रियता से निपटने के लिए ज्यादा सक्रिय नीति बनाएं।
 
भारत-चीन सीमा के पश्चिमी क्षेत्र में, जिसका बड़ा हिस्सा जनशून्य है, यथास्थिति बनाए रखना चीन के लिए फायदेमंद है।

1962 से ही चीन ने इस इलाके में जहां भी अपना दावा किया, उसी पर उसने कब्जा भी जमाया। इस कारण चीनी नियंत्रण वाले इस इलाके के किसी भी क्षेत्र में संप्रभुता का दावा पेश करना हमारे लिए आसान नहीं होगा।

पूर्वी सीमा पर स्थित अरुणाचल प्रदेश में, जिसे चीनी दक्षिणी तिब्बत कहते हैं, घनी आबादी है, इसलिए वहां यथास्थिति बनाए रखना भारत के लिए लाभदायक है।

यह सही है कि अरुणाचल प्रदेश में हमारा रक्षा और प्रशासनिक ढांचा स्वायत्त तिब्बत क्षेत्र (टीएआर) में चीन के ढांचे से कमजोर है, फिर भी पश्चिमी सीमा की तुलना में पूर्वी सीमा पर हमारी स्थिति मजबूत है।

चीन हालांकि समय-समय पर अरुणाचल प्रदेश पर भी अपना दावा पेश करता रहा है, लेकिन इस क्षेत्र में उसकी सक्रियता पश्चिमी सीमा की तरह नहीं है। यह भी उल्लेखनीय है कि चीन और भारत, दोनों पूर्वी या पश्चिमी सेक्टर में उग्र कार्रवाई से बचते रहे हैं।

पूर्वी सीमा पर भारतीय क्षेत्र पर अपने दावे को लेकर चीन के रुख में तब तक नरमी आने की उम्मीद नहीं है, जब तक कि वह तिब्बतियों पर एक ऐसा दलाई लामा थोपने में कामयाब नहीं हो जाता, जिसे कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ चाइना (सीपीसी) ने चुना हो।

चीन के तिब्बत क्षेत्र में मार्च 2009 से अब तक आत्महत्या की 115 घटनाएं सामने आई हैं। इसने चीन को भी चिंता में डाल दिया है कि जब सीपीसी द्वारा चुने गए दलाई लामा को तिब्बतियों पर थोपा जाएगा, तो वहां राजनीतिक अस्थिरता पैदा होने की आशंका भी बढ़ जाएगी।

दलाई लामा से प्रेरित तिब्बतियों की पुरानी पीढ़ी विरोध प्रदर्शन के शांतिपूर्ण तरीकों पर विश्वास करती है। बीजिंग की चिंता यह है कि मौजूदा दलाई लामा के बाद सीपीसी द्वारा चुने गए दलाई लामा को खारिज करते हुए तिब्बतियों की युवा पीढ़ी हिंसक प्रदर्शनों पर उतर सकती हैं।

तब सीपीसी की सैन्य शाखा पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) को अरुणाचल प्रदेश के जनसंख्या बहुल इलाकों में कार्रवाई करनी पड़ सकती है।

जब तक तिब्बत में शांति का माहौल है और तिब्बतियों पर चीन द्वारा चुने गए दलाई लामा को स्वीकारने का दबाव कायम है, तब तक बीजिंग अरुणाचल प्रदेश पर अपना दावा करता रहेगा, ताकि वह इस क्षेत्र में शांति बरकरार रखने के लिए जरूरत पड़ने पर पीएलए की कार्रवाइयों का औचित्य साबित कर सके।


अगर चीन अरुणाचल प्रदेश को भारत का अभिन्न अंग मान लेगा, तो वह इस क्षेत्र का उपयोग अपने हित में नहीं कर पाएगा।

इसी तरह तिब्बत को चीन का हिस्सा मान लेने से वहां हस्तक्षेप की हमारी संभावनाएं खत्म हो जाएंगी।

ऐसे में चीन के लिए जरूरी है कि अरुणाचल प्रदेश के मुद्दे को वह तब तक हवा देता रहे, जब तक दलाई लामा को चुनने के चीन के फैसले को तिब्बती स्वीकार नहीं कर लेते।

भारत-चीन संबंधों पर व्यापक रणनीति पर विचार करते वक्त हमें इस पहलू पर जरूर ध्यान देना चाहिए।



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