फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   roadmap of changes in big cities

बड़े शहरों में बदलाव की आहट

Thu, 03 Apr 2014 06:40 PM IST
तिग्मांशु धूलिया
तिग्मांशु धूलिया Updated Thu, 03 Apr 2014 06:40 PM IST
विज्ञापन
roadmap of changes in big cities

आज साधारण लोगों में भी परिवर्तन की जबर्दस्त इच्छा दिखती है, तो इसका कारण यह है कि दशकों से राजनीति कर रहे दल उनकी उम्मीदों पर खरे नहीं उतर पाए हैं। एक वक्त हमारे पास सिर्फ दो बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां, कांग्रेस और भाजपा थीं। कुछ क्षेत्रीय दल भी थे। आज आम आदमी पार्टी (आप) तेजी से सामने आ रही है। यह पूरे देश में उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश में है। इस पार्टी के उभार का कारण देश का युवा है।

विज्ञापन


हमारी पचास फीसदी से ज्यादा आबादी तीस साल से कम की है, जिसे कांग्रेस का इतिहास प्रभावित नहीं करता। उसे नेहरू-इंदिरा से कोई लेना-देना नहीं। इस युवा वर्ग को भाजपा की कुछ मामलों में संकीर्ण सोच वाली राजनीति से भी परहेज है। कम्युनिस्ट पार्टियां भी नाम की कम्युनिस्ट रह गई हैं। आज का युवा तरक्कीपसंद है। ऐसे में ‘आप’ विकल्प के रूप में उभर रही है, जो भ्रष्टाचार के विरुद्ध बात करती है; देश को आगे ले जाने की बात करती है। मुझे लगता है कि यह पार्टी भले ही अपने पहले लोकसभा चुनाव में ज्यादा सीटें न जीत सके, लेकिन दूसरी पार्टियों का बड़ा नुकसान करेगी। मुस्लिम वोटरों के लिए भी आप आगे जाकर अच्छा विकल्प साबित हो सकती है।
विज्ञापन


इस बार के चुनाव बहुत मजेदार होंगे और इनकी ‘एंटरटेनमेंट वेल्यू’ बहुत होने वाली है। मुझे लगता है कि मुंबई, दिल्ली, बंगलूरू और अहमदाबाद जैसे बड़े शहरों में बदलाव की आहट ज्यादा सुनाई पड़ती है, लेकिन छोटे शहरों और खास तौर पर उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान जैसे प्रदेशों में जात-पात से ऊपर उठकर वोट पड़ सकेंगे, इसकी संभावनाएं कम हैं। ऐसा नहीं कि यहां का युवा यथास्थिति से परेशान नहीं है, लेकिन उनकी परिस्थितियां अलग हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन


छोटे शहरों में आपके नाम और जाति से कई चीजें तय होती हैं, जबकि बड़े शहरों में यह नहीं है। बड़े शहरों का युवा इन बातों से पैदा होने वाली मुश्किलों से बच जाता है। बड़े शहर के युवा के पास कुछ सुविधाएं हैं, आजादी है, तो उनकी कुछ मुश्किलें भी हैं। वह कॉफी डे में बैठकर, अपने पसंदीदा पार्टनर का साथ पाकर संतुष्ट है। बदलते सामाजिक मूल्यों के बीच वह लिव-इन रिलेशनशिप तो चाहता है, मगर शादी घरवालों की मर्जी से करना चाहता है। वह कॉरपोरेट की नौकरी से बाहर कुछ नहीं देख पाता।

कॉरपोरेट हिंदुस्तान में अपना जाल फैला रहे हैं। वे ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह हैं, जो आपका पौरुष खत्म कर देते हैं। आपके अंदर जो तेवर हैं, मर्दानगी है, वह खत्म कर देते हैं। आपके अंदर का गुस्सा, गलत के खिलाफ बोलने वाली आवाज को इस संस्कृति में खत्म कर दिया जाता है। टाई पहनकर सब एक जैसी भाषा बोलते हैं। निजता खत्म हो गई है। सारे चेहरे एक जैसे हैं। सबकी बागडोर कहीं दूर अमेरिका या इंग्लैंड में बैठे लोगों के हाथों में है।

छोटे और बड़े शहरों में राजनीति का अंदाज भी अलग है। छोटे शहरों में असुरक्षा की भावना ज्यादा होती है। लोगों को लगता है कि हमारी जाति का आदमी जीत जाएगा, तो हमें कुछ फायदा होगा। वह हमारे लिए काम करेगा। जबकि वह आपका काम कभी नहीं करता। उसकी दिलचस्पी केवल टिकट और वोट पाने तक होती है। इसके आगे वह अपने लिए पैसा-प्रॉपर्टी बनाने का काम देखता है, क्योंकि जितना पार्टी को दिया है, उससे ज्यादा उसे वसूल करना है।

बड़े शहरों में तरक्की के मुद्दे पर राजनीति होती है। अगर तरक्की नहीं दिखेगी, तो नेता कैसे वोट मांगेगा? हालांकि बड़े शहरों में भी स्थानीय संस्थाओं के चुनाव में जाति-धर्म असर दिखाते हैं। अगर ऐसा नहीं होता, तो मुंबई जैसा महानगर किसी ‘डस्टबिन’ की तरह नहीं होता। मतलब साफ है कि जात-पात, यूनियन या स्थानीय पार्टियों के आधार पर होने वाले चुनावों में कोई अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाता। ऐसे में भ्रष्टाचार हमारी जीवन-शैली बन गया है।

सवाल यह है कि हमारे जो सामाजिक मूल्य दरक चुके हैं, उन्हें कौन दुरुस्त करेगा। सिनेमा पर नैतिक मर्यादाएं लांघने के आरोप लगते हैं, लेकिन सिनेमा वही दिखाता है, जो समाज में हो रहा है। सिनेमा अपने आप में कुछ नहीं है। वह केवल समाज का हिस्सा है। तस्वीर का एक पहलू यह है कि समाज में वही बातें दिखाई देती हैं, जो राजनीतिक व्यवस्था तय करती है। इसे यों समझिए कि व्यवस्था ने देश की आर्थिक नीतियां तय कर दीं। फिर एमएनसी (बहुराष्ट्रीय कंपनियां) आती हैं। मैकडॉनल्ड खुलता है। पिज्जा हट आता है। एफसीयूके के कपड़े आते हैं। अब चीजें समाज में प्रतिबिंबित होने लगेंगी। फिर सिनेमा में दिखेंगी। तो शुरुआत कहां से हुई...? अंततः राजनीति ही आपके जीवन को सबसे ज्यादा प्रभावित करती है।

फिल्में बनाते हुए मैंने उत्तर प्रदेश की पॉलिटिक्स को करीब से देखा है। वहां जैसे बसपा-सपा ने तय कर रखा है कि पांच साल तुम, पांच साल हम। मायावती ने सिर्फ लखनऊ को सुंदर बनाया, बाकी यूपी को पिछड़ा रखा। हां, उनके समय में कानून-व्यवस्था ठीक थी, पर नई सरकार में तो वह भी नहीं रह गई; विकास तो दूर है ही। सुनने में यहां तक आता है कि यह सरकार धर्म की राजनीति भी कर रही है। बहु-पार्टी व्यवस्था के इस दौर में देश की हालत खस्ता है। साफ है कि जाति और धर्म के नाम पर राजनीति हो रही है। मुद्दे की बातों और लोगों की तरफ किसी का ध्यान नहीं है। यह गलत है।


राजनीति में एक क्वालिटी होनी चाहिए। हमें बड़े परिवर्तन की जरूरत है, जो शायद किसी बड़े संकट के बाद ही पैदा हो सकता है। ऐसा संकट, जिसमें तमाम पॉलिटिकल डायनासोर खत्म हो जाएंगे। हो सकता है कि हम वह दिन देखने को नहीं रहें, लेकिन विश्वास कीजिए कि वह दिन आएगा जरूर।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed