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नदियां तो बदला ले ही लेंगी
लीलाधर जगूड़ी
Updated Thu, 30 May 2013 09:56 PM IST
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गोमुख से उत्तरकाशी तक 'ईको सेंसिटिव जोन' घोषित किए जाने को जनहित में पूरी तरह परिभाषित किया जाना अथवा सीमांत सुरक्षा और हजारों वर्षों से वहां के नागरिक जीवन के उत्कर्ष के संदर्भ में फिर से गंभीरतापूर्वक विचार करना आवश्यक है।
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सेंसिटिव जोन के नाम पर जो नियम सामने आए हैं, वे मनुष्य के मूलभूत अधिकारों के भी विरुद्ध हैं और सीमांत इलाका होने के कारण राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी खतरनाक है। जब भारतीय संविधान में प्रति पांच वर्ष में कुछ न कुछ संशोधन नागरिक बेहतरी के लिए होते रहते हैं, तो पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता के नाम पर वहां के जनजीवन को खतरे में डालकर किसके लिए पर्यावरण की रक्षा की जा रही है?
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स्वयं हिमालय की उपत्यकाओं के तीव्र ढलानों से गिरने वाली छोटी और बड़ी नदियां वर्षा ऋतु में पर्यावरण के महाविनाश का कारण बनती हैं। तटवर्ती पहाड़ों को काटकर भूक्षरण का कारण बनती हैं। भूस्खलन से जंगल के जंगल उखड़कर नदी में आ जाते हैं, जिनसे आकस्मिक बांध बन जाते हैं।
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प्रकृति द्वारा बनाए गए ये कृत्रिम और अनियंत्रित बांध दूरवर्ती पहाड़ों तक अपना जलस्तर उठा देते हैं। इससे भारी तबाही मच जाती है और पहाड़ के लोग हर वर्ष इन तबाहियों के शिकार होते हैं। पर्यावरण के नाम पर संपूर्ण जनजीवन को पर्वतीय क्षेत्रों से हटा दिया जाना क्या संभव है और क्या यह मानवाधिकार की दृष्टि से न्यायोचित होगा?
जहां नदियां नहीं है, वहां भी बारिश के मौसम में बादलों के फटने से भारी तबाही होती है। बादल फटने से अकल्पित स्थानों पर भी भूस्खलन और बाढ़ का खतरा बढ़ जाता है। यहां का नागरिक जीवन सदियों से इन पहाड़ों और घाटियों को विपत्ति के बावजूद, धन-जन की हानि के बावजूद, संवारता रहता है। क्या इन्हें विकास और सुरक्षा के उपायों से वंचित कर वहां से विस्थापित कर देना न्यायसंगत होगा? क्या इससे निर्जन सीमांत क्षेत्र शत्रुओं की घुसपैठ के लिए अधिक स्वतंत्र और सुविधापूर्ण नहीं हो जाएगा?
गंगा-यमुना जैसी बड़ी नदियों को सहायक नदियों सहित मजबूत तटबंधों की योजना के अंतर्गत नए रूप में ढालने की योजना बनाई जानी चाहिए। उत्तराखंड में उद्गम से हरिद्वार अथवा अन्य मैदानी भागों के शुरुआती मिलन क्षेत्रों तक तटबंध निर्माण की नई योजनाएं लागू करने की सोच विकसित नहीं हो रही है। विस्थापन और प्रतिबंध से पर्यावरण नहीं बच पाएगा।
मनुष्य नुकसान नहीं करेगा, तो प्रकृति स्वयं वार्षिक प्रलय करने में सक्षम है। पानी को प्रदूषित होने से बचाना ठीक है, लेकिन नदियों को मार्ग बदलने की स्वतंत्रता देना आज कतई उचित नहीं है। आज हमारी इंजीनियरिंग नदियों को नियंत्रित और सुनियोजित करने में सक्षम है। इसलिए गांवों, नगरों और तीव्र ढलानों पर नदियों के प्रवाह को प्रलंयकारी होने से बचाने के लिए उनसे बिजली पैदा करना अधिक बुद्धिमानी का काम होगा।
गोमुख से उत्तरकाशी तक यदि वर्तमान स्वरूप में ईको सेंसिटिव जोन को लागू करना है, तो इसे सबसे पहले 'नो मैन्स जोन' (जनशून्य भूमि) घोषित करना होगा। फिर अगर ऐसे जनहीन व जनशून्य स्थानों को प्रकृति उजाड़ दे, शत्रु देश हड़प ले, तो क्या फर्क नहीं पड़ेगा?
प्रति वर्ष बारिश के मौसम में पहाड़ों की हजारों वर्गमील भूमि भूस्खलन और बाढ़ से उत्पन्न कटाव के कारण बहकर नष्ट हो जाती है। क्या यह पर्यावरण विनाश नहीं है? वहां के निवासियों के लिए पैदा किए जाने वाले आपदा निवारण के वैज्ञानिक उपाय प्रकृति और मनुष्य, दोनों की रक्षा करेंगे। इस दृष्टि से 'ईको सेंसिटिव जोन' पर पुनर्विचार कर इसके स्वरूप को नागरिक रक्षा की दृष्टि से प्राथमिकता देना जरूरी है।
पर्यावरण संतुलन में एक प्रमुख कारक है, मनुष्य समाज की सहभागिता। यदि मनुष्य नहीं होगा, तो ईको सेंसिटिव जोन किसके लिए है? नो मैन्स लैंड बीहड़ से अधिक कुछ भी नहीं है। हम आरण्यक सभ्यता के लोग हैं, हमारे बिना जंगल अधूरे हैं। जंगलों के साथ आधुनिक सभ्यता की रिहाइश में सुधार की संस्कृति का विकास होना ठीक लगता है, लेकिन मनुष्य को निर्मूल कर केवल जंगलों का पोषण ठेकेदार दृष्टि के अलावा कुछ नहीं लगता।