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वतन वापसी का जोखिम

कुलदीप तलवार Updated Thu, 28 Mar 2013 09:56 PM IST
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पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति जनरल परवेज मुशर्रफ अपनी जान की बाजी लगाकर चार साल बाद चुनावी मौसम में आखिरकार वतन लौट आए हैं। वह लंदन एवं दुबई में आत्मनिर्वासन का जीवन व्यतीत कर रहे थे।
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आगामी 11 मई को वहां चुनाव होने वाले हैं और उनका कहना है कि वह पाकिस्तान को बचाने के लिए आए हैं। अपने वतन को मोहम्मद अली जिन्ना का पाकिस्तान बनाने की इच्छा रखने वाले इस पूर्व तानाशाह को यकीन है कि देशवासी इसमें उनका सहयोग देंगे।

जबकि आम ख्याल यह है कि वह सत्ता की राजनीति में दूसरी पारी खेलने के लिए वापस आए हैं और अपनी पार्टी ऑल पाकिस्तान मुस्लिम लीग को चुनाव में बढ़त दिलवाने का सपना देख रहे हैं। मुशर्रफ ने 1999 में तख्ता पलटकर सत्ता हथियाई थी और 2008 में उन्हें तब सत्ता छोड़नी पड़ी, जब तत्कालीन गठबंधन सरकार ने उनके खिलाफ महाभियोग चलाने की धमकी दी थी। उस समय वह खुद ही देश छोड़कर चले गए थे।

यह ठीक है कि वह अपने गिरफ्तारी वारंट पर दो सप्ताह की अग्रिम जमानत ले चुके हैं, लेकिन पाकिस्तान में उन्हें पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो और बलूच राष्ट्रवादी नेता अकबर बुक्ती की हत्याओं के मामलों का सामना करने के लिए अदालत के सामने पेश होना है। इस्लामाबाद की आतंकवाद-विरोधी अदालत ने उनकी पत्नी की मुशर्रफ को माफ कर देने की अपील भी रद्द कर दी है।

आपातकाल लागू करने और सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश समेत कई न्यायाधीशों को बर्खास्त करने के मामले में उन्हें राजद्रोह के आरोपों का सामना भी करना पड़ सकता है। कारगिल युद्ध के लिए भी उन्हें जिम्मेदार माना जाता है। इसकी जांच के लिए न्यायिक आयोग गठित करने की मांग की जा रही है, जबकि सुनियोजित ढंग से उन्होंने अब कारगिल युद्ध का औचित्य ठहराया है। वह तालिबान के निशाने पर भी हैं। पाक तालिबान ने उनकी हत्या के लिए एक विशेष दस्ता भी गठित किया है। बलूचिस्तान में राष्ट्रवादियों ने मुशर्रफ की गिरफ्तारी की मांग तेज कर दी है। अकबर बुक्ती के बेटे ने मुशर्रफ के सिर पर एक करोड़ का इनाम घोषित किया है।

इन हालात में उनकी सुरक्षा का मसला भी संगीन बना हुआ है। सैन्य प्रशासन ने गृह मंत्रालय को उन्हें सुरक्षा उपलब्ध कराने को कहा जरूर है, लेकिन पाकिस्तान में किसी की सुरक्षा की गारंटी नहीं है। इस्लामाबाद की लाल मस्जिद में फौजी कार्रवाई के उनके हुक्म से कट्टरपंथी उनसे बेहद नाराज हैं, जिसमें सौ से ज्यादा लोग मारे गए थे।

मस्जिद में मारे जाने वालों के रिश्तेदारों ने सर्वोच्च न्यायालय में 25 मार्च को क याचिका दायर की कि मुशर्रफ का नाम एक्जिट कंट्रोल सूची में डाल दिया जाए, ताकि अब वह देश से भाग न सकें। यह मामला पहले ही अदालत में चल रहा है। जहां तक चुनाव की बात है, तो उसमें मुशर्रफ और उनकी पार्टी की कोई संभावना नहीं दिखती।

पीपीपी, मुस्लिम लीग (नवाज), एमक्यूएम, इमरान खान की तहरीके-इंसाफ और एएनपी जैसी पार्टियों के सामने मुशर्रफ की उस पार्टी के लिए जगह बनाना मुश्किल है, जिसका कोई संगठन नहीं है। वस्तुतः मुशर्रफ जिस रास्ते पर लौटे हैं, उस पर कांटे ही कांटे है। वह पाकिस्तान में ऐसे समय लौटे हैं, जब सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है। कराची पहुंचने पर उनका वैसा स्वागत भी नहीं किया गया, जिसकी उन्हें उम्मीद थी।

अंतरराष्ट्रीय संस्था ह्यूमन राइट्स वॉच ने इस्लामाबाद को कहा है कि वह मुशर्रफ को न सिर्फ मानवाधिकारों के हनन के लिए जवाबदेह ठहराए, बल्कि किसी भी सूरत में कानूनी प्रक्रिया से बचने का अवसर उन्हें नहीं मिलना चाहिए। गौरतलब है कि सेना प्रमुख रहते हुए मुशर्रफ ने कई राजनीतिक प्रतिनिधियों को निर्वासन या जेल भेज दिया था, जबकि कुछ की हत्या करवा दी गई थी।

अब मुख्य सवाल यह है कि क्या मुशर्रफ को चुनाव लड़ने की अनुमति मिलेगी। क्या पाक फौज अपने पूर्व सेना प्रमुख को अदालत के चक्करों से बचा लेगी? मुशर्रफ ने अपने कार्यकाल में जो कुछ किया, और फिर इस समय पाकिस्तान का जो माहौल है, उसमें उनके लौटने का कोई बहुत अर्थ नहीं है। बल्कि पाकिस्तान लौटकर उन्होंने मुश्किलों को ही न्योता दिया है।
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