क्षेत्रीय पत्रकारिता के जोखिम
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गौरी लंकेश की पिछले दिनों बंगलूरू में हुई हत्या से देश-दुनिया के लाखों लोगों को गहरी पीड़ा हुई है। वह मेरी मित्र थी। हम दिल्ली के भारतीय जनसंचार संस्थान में 1983-’84 में सहपाठी थे। हम उस युवा समूह का हिस्सा थे, जो इस शहर में कुछ पाने के लिए आए थे। हम सभी अकेले थे। हममें से कई यहां बिना सामाजिक संपर्क के थे और कई आर्थिक तंगी में थे। उन दिनों मेरा भी इस शहर में कोई रिश्तेदार या परिचित नहीं था। हम आपस में एक-दूसरे की मदद करते थे। जब उसकी बर्बर हत्या की खबर प्रकाश में आई, मैं देश से बाहर थी और मेरे लिए अब भी यह मानना मुश्किल है कि मजेदार, सीधी और बेबाक बोलने वाली तथा चमकती आंखों वाली गौरी, जिसे मैं जानती थी, अब नहीं है।
हालांकि कठोर सच्चाई यह है कि वह छोटी-सी, साहसी महिला, जो आरामदायक जीवन और आरामदायक नौकरी का आनंद ले सकती थी, जो मुख्यधारा की मीडिया में काम कर चुकी थी और अपने अच्छे संपर्कों का इस्तेमाल कर सकती थी, उसे उन लोगों के आदेश पर भाड़े के हत्यारों ने गोली मार दी, जो गौरी की आवाज को कुचलना चाहते थे। लेकिन जैसा कि पिछले हफ्ते जंतर-मंतर पर किसी ने कहा (जहां हम इकट्ठा हुए थे) था, हमें खुद को रुदाली नहीं बनने देना चाहिए। हमारा काफी कुछ दांव पर लगा है। गौरी की मौत ने हम सभी (जो उसे व्यक्तिगत रूप से जानते हैं और जो नहीं भी जानते हैं) के अंतर्मन को गहरे तक हिला दिया है। आज मैं उसी पत्रकार गौरी की चर्चा करना चाहती हूं, जो दिल्ली और बंगलूरू में अंग्रेजी मीडिया का हिस्सा थी, और जो इन सब को छोड़ने का फैसला कर अपनी मातृभाषा कन्नड़ में लंकेश पत्रिके का काम देखने लगी। उसने ऐसा अपने प्रसिद्ध पिता पी. लंकेश की विरासत को संरक्षित करने और उन लोगों से बेहतर ढंग से जुड़ने के लिए किया, जिनके सरोकारों के लिए वह लड़ती थी।
हम सभी लोग, जो खुलकर अपनी बात रखते हैं, जो सत्ता और राजनेताओं के निहित स्वार्थ का विरोध करते हैं, जोखिम में हैं। लेकिन हममें से, जो लोग पेशेवर रूप से अंग्रेजी मीडिया से जुड़े हैं, और जो अपेक्षाकृत विशेषाधिकार प्राप्त पृष्ठभूमि से ताल्लुक रखते हैं, वे संभवतः हिंदी या अन्य भारतीय भाषाओं में काम करने वाले क्षेत्रीय पत्रकारों की तुलना में कम असुरक्षित हैं। इसका सीधा कारण है कि हिंदी एवं अन्य भारतीय भाषाओं में काम करने वाले पत्रकार आम लोगों के एक विशाल हिस्से से जुड़ने में पूरी तरह से सक्षम हैं और वे जो कहते या लिखते हैं, वह जमीनी स्तर के व्यापक लोगों तक पहुंचता है।
उनकी असुविधाजनक सच्चाई संभावित रूप से ज्यादा प्रभाव डाल सकती है और यही वजह है कि उनकी आवाज को बेहद तत्परता से कुचल दिया जाता है। यह खतरा तब और बढ़ जाता है, जब कोई स्वतंत्र पत्रकारिता कर रहा हो या न्यूनतम संसाधनों वाले किसी छोटे प्रकाशन के साथ काम कर रहा हो।
निश्चित रूप से हमें एक मृत पत्रकार की तुलना किसी दूसरे पत्रकार से नहीं करनी चाहिए, लेकिन उन लोगों को याद करने के लिए ऐसा करना महत्वपूर्ण है, जो पत्रकारिता में अपना काम करते हुए मारे गए और जिनके मारे जाने का कारण और कुछ नहीं, बल्कि यही था कि उन्होंने सत्ता में बैठे लोगों की सच्चाई को उजागर करना चुना।
जून, 2015 में एक पत्रकार का कथित रूप से अपहरण कर लिया गया और मध्य प्रदेश में रेत खनन माफिया से जुड़े तीन लोगों ने बाद में उसे जलाकर मार दिया। उस पत्रकार का नाम था-संदीप कोठारी। वह मात्र चालीस साल के थे, जिन्हें अभी काफी कुछ करना था। वह एक क्षेत्रीय हिंदी भाषी दैनिक के लिए काम करते थे। उनकी हत्या से संबंधित एक एजेंसी की रिपोर्ट में बताया गया कि संभवतः उनकी हत्या इसलिए कर दी गई, क्योंकि उन्होंने खनन रैकेट से जुड़े लोगों के खिलाफ कोर्ट केस वापस लेने से इन्कार कर दिया था। कोठारी की लाश पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र में रेल पटरी पर पाई गई।
वर्ष 2015 में मैंने अपने एक कॉलम में उत्तर प्रदेश के शाहजहांपुर के एक अन्य पत्रकार जगेंद्र सिंह के बारे में लिखा था, जिनकी हत्या शरीर पर पेट्रोल छिड़क कर आग लगाकर कर दी गई थी। मीडिया में उसकी भयावह तस्वीर प्रकाशित हुई थी। सिंह ने अस्पताल के बिस्तर पर से अपने आखिरी बयान में तीखे शब्दों में कहा था, 'उन लोगों ने मुझे क्यों जलाया? अगर मंत्री और उसके गुंडों को मुझसे कोई शिकायत थी, तो वे जलाने के बजाय मुझे पीट सकते थे।'
शाहजहांपुर के अपने ठिकाने से सिंह जमीनी स्तर की जानकारियां, अत्यंत ज्वलंत कहानियां और विभिन्न मुद्दों से जुड़ी तस्वीरें उपलब्ध कराते थे, जो उनके समुदाय को गंभीर रूप से प्रभावित करती थीं-अपराध, भ्रष्टाचार, अन्याय, अपराधियों और राजनेताओं की मिलीभगत से कमजोर लोगों का शोषण।
इन सभी मौतों के बाद थोड़ी देर के लिए आक्रोश पैदा हुआ, आरोपियों की गिरफ्तारियां हुईं। लेकिन उन मामलों में आज क्या हो रहा, इस पर नजर कौन रख रहा है? पूरे देश में इस तरह की कई कहानियां हैं।
हम में से कई लोग गौरी को व्यक्तिगत रूप से जानते हैं और उससे प्यार करते हैं। लेकिन दुखी होने के बावजूद हमें गौरी की मौत को सिर्फ उसकी या अपने दोस्त की मौत ही नहीं माननी चाहिए। अगर हम वास्तव में गौरी का सम्मान करते हैं, तो हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि छोटे शहरों और महानगरों में उसकी तरह खुलकर अपनी बात रखने और जान जोखिम में डालकर काम करने वाले पत्रकारों की आवाज अनसुनी न जाए और उन्हें सुरक्षा मिल सके। किसी भी सभ्य समाज में ऐसे मुखर और स्वतंत्रचेता पत्रकार होंगे।