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गर्भ में पलते भ्रूण के जीने का हक

Wed, 05 Apr 2017 07:22 PM IST
मनीषा सिंह
मनीषा सिंह Updated Wed, 05 Apr 2017 07:22 PM IST
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Right to live birth of a fetus
मनीषा सिंह

कानूनी प्रतिबंधों के बावजूद कन्या भ्रूण हत्याओं का सिलसिला लगातार जारी है। हाल ही में पुणे से ऐसी खबरें आई हैं कि वहां गांव-कस्बों तक में चीन में बनी पोर्टेबल अल्ट्रासाउंड मशीनों के जरिये क्लीनिक और नर्सिंग होम चला रहे लोग धड़ल्ले से गर्भ में मौजूद भ्रूण के लिंग की जांच कर रहे हैं। जांच के बाद भ्रूण यदि लड़की का हुआ, तो बताने की जरूरत नहीं कि उसके साथ क्या होता होगा। इधर, जब उत्तराखंड हाई कोर्ट गंगा-यमुना के बाद ग्लेशियरों, झीलों और घास के मैदानों तक को जीवित इकाई का दर्जा देकर उन्हें इंसानों जैसे हक दिलाने का फैसला कर रहा था, तो पुणे की घटनाओं के मद्देनजर यह सवाल जेहन में गूंजता है कि क्या गर्भस्थ भ्रूण को ऐसा कोई अधिकार नहीं मिल सकता है, ताकि उसकी हत्या होने पर मां-बाप और डॉक्टरों समेत इस अपराध में शामिल सभी लोगों पर हत्या के जुर्म की धाराएं लग सकें।

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इस बारे में सुप्रीम कोर्ट के हालिया आदेशों पर नजर दौड़ाएं तो पता चलता है कि इससे संबंधित एक कानून- मेडिकल टर्मिनेशन ऑफ प्रिगनेंसी ऐक्ट के तहत 20 हफ्ते से ज्यादा के गर्भ को गिराने यानी टर्मिनेट करने की इजाजत नहीं है। इसकी इजाजत तभी दी जा सकती है, जब चिकित्सकीय वजह से मां व बच्चे के जीवन को खतरा हो। अदालत ने यह टिप्पणी हाल में एक महिला की याचिका के संदर्भ में दी थी, जिसने 27 हफ्ते के भ्रूण को असामान्य शारीरिक समस्या के आधार पर टर्मिनेट कराने की इजाजत मांगी थी।
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इस फैसले की बारीकियों को समझें, तो पता चलेगा कि अगर भ्रूण 20 हफ्ते का है और कोई समस्या बताकर उसे गिराए जाने की इजाजत मांगी जाती है, तो अदालत को इससे परहेज नहीं होगा। सवाल है कि जब ग्लेशियर तक जीवित माने जा सकते हैं, तो किसी भी अवस्था वाले भ्रूण को जीवित मानने से इन्कार क्यों किया जाता है और उन्हें किसी भी चिकित्सकीय कारण से गर्भ से हटाने यानी गर्भपात की इजाजत देने से पहले मामलों की कठोर जांच और निगरानी क्यों नहीं होती?
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हमारे कथित तौर पर पढ़े-लिखे व संपन्न समाज ने आईवीएफ जैसी तकनीकों और अल्ट्रासाउंड जैसी मशीनों के बल पर बेटियों से तकरीबन छुटकारा पा लिया है। आज जो काम आईवीएफ और सरोगेसी से मुमकिन हो रहा है, आगे चलकर डीएनए तकनीकों के सहारे मुमकिन है कि लोग –बेटा ही चाहिए- अपनी इस सोच के मुताबिक बच्चे को डिजाइन भी करवा लें।


दस साल पहले वर्ष 2007 में राष्ट्रीय बाल विज्ञान कांग्रेस से जुड़े किशोरों ने उत्तर प्रदेश के 19 जिलों में गर्भवती महिलाओं, उनके परिजनों, डॉक्टरों से बातचीत करके अपना मकसद बताए बिना जानकारी लेकर एक रिपोर्ट तैयार की थी। इस रिपोर्ट में मुख्यत: लखनऊ, बदायूं, मेरठ, इलाहाबाद और गाजियाबाद की किशोरियों (बाल वैज्ञानिक) ने यह जानकार हैरानी जताई थी कि खुद उनके अपने घरों में कन्या भ्रूण की जांच के लिए अल्ट्रासाउंड मशीनों का सहारा लिया गया और कम से कम 27 मामलों में गर्भपात कराया गया। सरकार, समाज और अदालतों से अपेक्षा है कि वे गंगा-यमुना और झीलों-ग्लेशियरों की तरह गर्भ में पलते भ्रूण को शुरू से ही जीवित मानने की परंपरा स्थापित करें और उसकी हत्या होने पर गुनाह में शामिल लोगों पर हत्या के आरोप में मुकदमा चलाएं।

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