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फेरीवालों को सम्मान का हक

Thu, 19 Sep 2013 08:20 PM IST
सुधांशु रंजन
सुधांशु रंजन Updated Thu, 19 Sep 2013 08:20 PM IST
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Right of street vender

रेहड़ी और फेरीवालों की समस्याओं से पिछले कई दशकों से देश के बड़े शहर जूझ रहे हैं। कोलकाता में 1990 के दशक के मध्य में सड़कों से फेरीवालों को हटाने के लिए 'ऑपरेशन सनशाइन’ चलाया गया, परंतु शीघ्र ही वे फुटपाथ पर वापस आ गए। फेरीवालों को जीविका अर्जित करने के लिए व्यवसाय का अधिकार है, किंतु राहगीरों की सुविधा का भी खयाल रखा जाना उतना ही जरूरी है।

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भारत में 90 फीसदी से अधिक लोग असंगठित क्षेत्रों में काम करते हैं। उनकी कोई सामाजिक सुरक्षा नहीं होती। इनमें एक बड़ा वर्ग फेरीवालों का है, जो सड़कों पर और गलियों में ठेले लगाकर या घूम-घूमकर सामान बेचते हैं। दो जून की रोटी प्राप्त करने के लिए उन्हें जी-तोड़ मशक्कत तो करनी ही पड़ती है, साथ ही पुलिस वालों के हाथों उन्हें अपमान भी झेलना पड़ता है, जो उनका दोहन करते हैं। बाजार की जरूरत हर व्यक्ति को होती है, परंतु लोगों को उनकी दैनिक जरूरत की वस्तुएं उनके घर के निकट उपलब्ध कराने वाले इन मेहनतकशों का हर दिन असुरक्षा, अपमान तथा अनिश्चितता के बीच बीतता है।
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मगर अब उनके दुख-दर्द की ओर ध्यान गया है। संसद के बीते मानसून सत्र में बहुमत से फेरीवालों के अधिकारों को सुनिश्चित करने वाला पथ विक्रेता (जीविका का संरक्षण और पथ विक्रय का विनियमन) विधेयक, 2012 पारित किया गया। देर से ही सही, उनके हक में संसद ने एक बड़ा कदम उठाया है और सदस्यों ने माना कि फेरीवाले समाज के सबसे गरीब उद्यमी हैं। यह सवाल भी उठा कि बड़ी कंपनियों के लिए बड़ी-बड़ी सरकारी योजनाएं हैं, लेकिन गरीब फेरीवालों के लिए कुछ नहीं। बहस में ही यह बात भी सामने आई कि फेरीवाले 10 से 25 फीसदी के ब्याज पर कर्ज लेते हैं और अपनी आमदनी का 30 से 40 फीसदी हिस्सा घूस देने में गंवा देते हैं और अंत में उनके पास जो बचता है, वह दुर्भाग्यवश अकुशल मजदूरों की न्यूनतम मजदूरी से भी कम होता है।
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फेरीवालों को आवास के साथ ही पीने के पानी से लेकर शौचालय तक उपलब्ध नहीं होते हैं। इस कानून में प्रावधान है कि हर पांच वर्ष में सर्वेक्षण कराकर फेरीवालों को पहचान पत्र एवं लाइसेंस दिए जाएंगे। इसमें उनका बीमा कराने तथा उन्हें कर्ज देने के लिए भी व्यवस्था की गई है। राष्ट्रीय शहरी आजीविका मिशन के अंतर्गत राशि का एक हिस्सा उनके लिए निर्धारित किया जाएगा और यह भी पक्का किया जाएगा कि बैकों से भी उन्हें ऋण मिल सके। विधेयक में शहर वेंडिंग कमिटी की नई अवधारणा का प्रतिपादन किया गया है, जिसमें बाजार, फेरीवालों, नगरपालिका, पुलिस, रेजिडेंट वेलफेयर एसोसिएशन तथा गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधि होंगे। यह कमेटी लाइसेंस एवं प्रमाण-पत्र जारी करेगी।

एक ओर जहां यह निर्विवाद है कि फेरीवालों के अधिकारों को कानूनी शक्ल मिलनी चाहिए, वहीं इसके दूसरे पक्ष को नजरंदाज करना भी अहितकर होगा। विधेयक में 14 वर्ष से ऊपर के बच्चों को लाइसेंस देने की व्यवस्था है। इसका सामंजस्य बालश्रम कानून तथा शिक्षा का अधिकार से भी किया जाना चाहिए। बालश्रम (निरोधक एवं नियमन) अधिनियम, 1986 के अनुसार, 14 वर्ष तक किसी श्रम की इजाजत नहीं है। उसके ऊपर का बच्चा काम कर सकता है, जिसका नियमन होगा। परंतु कुछ ऐसे खतरनाक काम हैं, जिनमें 14 वर्ष के ऊपर भी काम करने की इजाजत नहीं है। इसलिए इसे बालश्रम (निरोधक एवं नियमन) कानून कहा जाता है। इस कानून में संशोधन कर आयु को 14 से बढ़ाकर 18 वर्ष किया जा रहा है। ये संशोधन आने ही वाला है।


इसके अलावा किशोर न्याय अधिनियम में सड़कों पर काम करने वालों की उम्र भी 18 वर्ष है। इसलिए 14 वर्ष के बच्चे को लाइसेंस देना पूरी तरह गलत होगा। वैसे भी छह से 14 वर्ष तक के बच्चे तो शिक्षा का अधिकार कानून के तहत आते हैं। इसलिए 14 वर्ष के बाद ऐसा लाइसेंस देना उचित नहीं होगा। फेरीवालों के साथ संवेदना, सहानुभूति की जरूरत है, वहीं यह भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि पैदल चलने वालों तथा स्थायी दुकानदारों को परेशानी न हो और न ट्रैफिक जाम की समस्या उत्पन्न हो।

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