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मिलीभगत का नतीजा

Fri, 22 Nov 2013 04:16 AM IST
वी एम सिंह
वी एम सिंह Updated Fri, 22 Nov 2013 04:16 AM IST
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result of Nexus between govt. and mill owner

गन्ने का पेराई सत्र शुरू हुए तकरीबन एक महीने से ज्यादा हो चुका है पर उत्तर प्रदेश सरकार ने अब तक गन्ने का राज्य परामर्श मूल्य (एसएपी) तय नहीं किया है। दूसरी तरफ चीनी मिलों ने पेराई भी शुरू नहीं की है। इससे गन्ना किसानों के लिए मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। दरअसल, इस लेटलतीफी से पूरा फसल चक्र प्रभावित हो रहा है जिसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ता है। अब जिन किसानों को गन्ने की जगह गेहूं की बुवाई करनी है, उन्हें इसे औने-पौने दाम पर कोल्हू संचालकों को बेचना पड़ रहा है।

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मिलों की मनमानी का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उच्च न्यायालय के 4 जुलाई, 2013 के आदेश के बावजूद वे पिछले सत्र का करीब 2,300 करोड़ रुपये एवं ब्याज का बकाया नहीं चुका रही हैं। ऊपर से उनकी मांग है कि पिछले साल के एसएपी 280 रुपये को घटाकर 240 रुपये प्रति कुंतल कर दिया जाए। इसके पीछे तर्क है कि चीनी की कीमतें पिछले साल के 35 रुपये से घटकर 30 रुपये प्रति किलोग्राम रह गई हैं, जिससे उन्हें लगभग 3,000 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है। पूरे परिदृश्य पर नजर डालें, तो पता चलेगा कि यह सब राज्य सरकार और मिल मालिकों की मिलीभगत से हो रहा है।
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किसानों की तरफ से मैंने न्यायालय में हलफनामा देकर बताया कि चीनी की कीमतों में उतार-चढ़ाव से किसानों का कोई लेना-देना नहीं है। मसलन, 2004 से 2008 के दौरान इसकी कीमतें 14 रुपये प्रति किलोग्राम से बढ़कर 42 रुपये प्रति किलोग्राम तक पहुंच गईं थीं। इस भारी-भरकम मुनाफे से किसानों को कोई फायदा नहीं हुआ। ऐसे में वाजिब सवाल है कि जब किसान मिल मालिकों के मुनाफे में हिस्सेदार नहीं हैं, तो कीमतें कम होने के कारण होने वाले घाटे में हिस्सेदारी क्यों निभाएं?
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हलफनामे में मिलों की पोल भी खोली गई है। इसमें बताया गया है कि दरअसल मिल मालिकों को घाटा हो ही नहीं रहा है। अगर उन्हें प्रति किलोग्राम चीनी से 30 रुपये प्राप्त हो रहा है तब भी एक कुंतल गन्ने से मिलों को (9 किलोग्राम चीनी, खोई, शीरा और मैली) कुल मिलाकर 400 रुपये की आमदनी होती है। इसमें से 50 रुपये प्रति कुंतल का खर्च निकाल दिया जाए, तब भी करीब 350 रुपये गन्ना मूल्य देने के लिए बचता है। हलफनामे में मिलों के मुनाफे संबंधी दस्तावेज भी प्रस्तुत किए गए। इसके बाद राज्य सरकार ने न्यायालय में पांच अलग-अलग हलफनामे दिए, लेकिन एक बार भी इन आंकड़ों को गलत नहीं साबित कर पाई।

सवाल यह है कि घाटा न होने पर भी किसानों के सामने यह संकट क्यों खड़ा किया जा रहा है। वैसे ऐसा पहली बार नहीं हुआ है। पिछले 20 साल के दौरान ऐसा कई बार हुआ है। वर्ष 1996-97, 2002-03, 2003-04, और 2007-08 में भी मिल मालिकों ने पेराई न करने की धमकी देते हुए किसानों को अपनी मर्जी से दाम दिए।

यही नहीं, राज्य सरकार ने 1996-1997 और 2003-2004 में एसएपी निर्धारित नहीं किया। ऐसे में उच्च न्यायालय ने पिछले साल के एसएपी को अंतरिम रूप से गन्ना मूल्य मानते हुए इसे देने का आदेश जारी किया। इस साल भी अगर राज्य सरकार एसएपी निर्धारित नहीं करती है, तो पिछले आदेशों के तहत गत वर्ष का 280 रुपये प्रति कुंतल के दर से तो मूल्य देना ही पड़ेगा।

लेकिन यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि अगर मिल मालिक पेराई शुरू नहीं करते, तो क्या राज्य सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रहेगी। कानून ऐसा नहीं कहता। 1971 में भी ऐसी ही स्थिति थी। मिलों पर पुराना भुगतान बकाया था और मिल मालिक अगले साल मिल चलाने से इनकार कर रहे थे। ऐसे में उत्तर प्रदेश सरकार ने एक कानून बनाकर ऐसे मिलों के अधिग्रहण की प्रक्रिया शुरू कर दी थी। आज अगर इस कानून के तहत मिल मालिकों को नोटिस जारी कर दिया जाए, तो वे रास्ते पर आ जाएंगे। जाहिर है, कोई भी मिल मालिक 20 से 25 करोड़ रुपये बकाया न भुगतान करने के बदले 400-500 करोड़ रुपये की मिल छोड़ने के लिए क्यों तैयार होगा?

यही नहीं, केंद्र सरकार भी किसानों की सहायता के लिए आगे आ सकती है। केंद्र के पास अपना कानून है। नवंबर, 1978 में जब कुछ मिलों ने गन्ना किसानों का बकाया भुगतान नहीं किया था और पेराई सत्र शुरू होने के बावजूद मिलें नहीं चलाईं, तो केंद्र सरकार ने कानून बनाकर उन मिलों का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया था। पर आज केंद्र सरकार इस दिशा में उदासीन है।


वैसे उत्तर प्रदेश की तुलना अन्य राज्यों से करें, तो पता चलता है कि वहां के किसानों को गन्ने का ज्यादा मूल्य मिल रहा है। पिछले साल कर्नाटक, गुजरात, महाराष्ट्र और कई अन्य राज्यों के किसानों को 260 से 280 रुपये प्रति कुंतल का भाव मिला था। इसमें कटाई, छंटाई और ढुलाई भी मिल की ओर से दी गई थी। इस तरह इन राज्यों के किसानों को प्रति कुंतल 300 रुपये के हिसाब से मिला। समाजवादी पार्टी ने अपने घोषणा पत्र में 350 रुपये प्रति कुंतल का भाव देने की बात कही थी। अब अगर वह गन्ने का एसएपी 310-320 रुपये प्रति कुंतल भी घोषित कर देती है, तो उसी दिन कोल्हू वाले 50-60 रुपये प्रति कुंतल तक भाव बढ़ा देंगे, क्योंकि गुड़ के दाम आज भी 35 से 40 रुपये प्रति किलोग्राम है। चालू पेराई सत्र में गन्ना पिछले साल की तुलना में 30 से 35 फीसदी कम है, ऐसे में चीनी मिलें गन्ने के लिए तरस जाएंगी। पर यह तो साफ है कि यह संकट राज्य सरकार और मिल मालिकों की मिलीभगत का नतीजा है।

(संयोजक, राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन)

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