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ठंड से मौत के जिम्मेदार
तवलीन सिंह
Updated Sun, 14 Jan 2018 08:36 PM IST
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तवलीन सिंह
इस देश का हर राजनेता यही कहकर राजनीति में आता है कि देश के आम आदमी का जीवन सुधारने के लिए ही वह राजनीति में आया है। लेकिन एक ही राजनीतिक दल है, जिसने आम आदमी को अपने नाम में बिठा लिया है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि यह राजनीतिक दल सिर्फ आम आदमी के लिए बना है। इसलिए पिछले सप्ताह मिली यह खबर बेहद दुखद थी कि दिसंबर और जनवरी के महीनों में दिल्ली के फुटपाथों पर चवालीस बेघर लोग ठंड से मर गए हैं। मीडिया ने इन बेनाम, बेघर दिल्लीवासियों के ठंड से मरने की खबर सुर्खियों में छापने की आवश्यकता नहीं समझी।
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हम पत्रकारों से अधिक अगर किसी को शर्मिंदा होने की जरूरत है, तो वह हैं दिल्ली के आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल। याद कीजिए, जब वह नए-नए दिल्ली के मुख्यमंत्री बने थे, तब यह साबित करने के लिए, कि आम आदमी की कठिनाइयां न सिर्फ वही समझते हैं, बल्कि झेलने की क्षमता भी रखते हैं, किस तरह उन्होंने स्वयं दिल्ली की सड़कों पर नौटंकी भरे अंदाज में रात गुजारी थी। सो क्यों इतने सारे लोगों की असमय मौतें हुई हैं उनके कार्यकाल में? क्यों नहीं बने हैं वे रैन बसेरे, जिनके अभाव में इतने लोग बेमौत मर गए हैं देश की राजधानी में? पंजाब और गुजरात के विधानसभा चुनाव में अगर लड़ने के लिए आम आदमी पार्टी के पास काफी पैसे थे, तो दिल्ली के आम आदमी की सबसे महत्वपूर्ण जरूरत के लिए मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल थोड़े से पैसे क्यों नहीं खर्च कर सके?
यहां मैं यह स्पष्ट करना जरूरी समझती हूं कि मैंने शुरू से ही अरविंद केजरीवाल की बातों पर भरोसा नहीं किया। जब उनकी लोकप्रियता आसमान छू रही थी, तब भी मुझे उनकी बातों, उनके वायदों और उनकी राजनीतिक ईमानदारी पर विश्वास नहीं हुआ। लेकिन मैंने यह कभी नहीं सोचा था कि आम, बेघर लोगों के मरने पर उनकी आंखों में दो बूंद आंसू भी नहीं आएंगे, उनके मुंह से सहानुभूति के दो शब्द भी नहीं निकलेंगे। शब्द जब निकले उनके मुंह से, तब सिर्फ यह कहने के लिए कि इसमें दोष उनका नहीं, बल्कि उपराज्यपाल का है। कितने नादान थे दिल्ली के लोग कि उन्होंने अरविंद केजरीवाल को इतनी बड़ी बहुमत देकर सत्ता दी कि वह अपने आपको मसीहा समझने लग गए।
अपने पुराने साथियों को उन्होंने पार्टी से बाहर निकाल दिया। योगेंद्र यादव और प्रशांत भूषण के निकाले जाने के बाद आप में एक ही कद्दावर, ईमानदार और लोकप्रिय चेहरा रह गया था। और वह था कुमार विश्वास का। सो तय था कि जब राज्यसभा के लिए चयन करेंगे दिल्ली के मुख्यमंत्री, तब सबसे ऊपर नाम उनके इस पुराने साथी का ही होगा। लेकिन यहां भी धोखा हुआ। आम आदमी पार्टी से दो अनजान लोगों को राज्यसभा में भेजने का निर्णय लिया गया पिछले सप्ताह, जिनमें एक अभी-अभी कांग्रेस छोड़कर आया है। धोखा सिर्फ कुमार विश्वास के साथ नहीं हुआ है, बल्कि धोखा उन सब लोगों के साथ हुआ है, जिन्होंने यह सोचा था कि अरविंद केजरीवाल को समर्थन करना चाहिए, क्योंकि वह विकल्प की राजनीति करेंगे।
आज स्थिति यह है कि दिल्ली शहर में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति मिलेगा, जिसकी आंखों से धोखे की पट्टी पूरी तरह से न उतर गई हो। लेकिन दिल्ली की जनता को और दो साल इस सरकार को बर्दाश्त करना पड़ेगा। दिल्ली के गरीबों को जाड़े के दो और मौसम ठंड में ठिठुर-ठिठुरकर गुजारने होंगे।