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भारतीय भाषा का सम्मान
शिवकुमार गोयल
Updated Mon, 18 Feb 2013 11:33 PM IST
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हमारे धर्मग्रंथों में ही नहीं, इतिहास के पन्नों में भी कई ऐसी घटनाएं दर्ज हैं, जो हमें जीवन का सार बताती हैं। ऐसे प्रसंग हमें शिक्षा देते हैं कि धर्म, देश और समाज के प्रति हमेशा गर्व करना चाहिए। इसलिए कहा गया है, जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी। इसी से जुड़ा एक प्रसंग भगिनी निवेदिता का है।
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भारतीय संस्कृति तथा दर्शन से प्रभावित होकर उन्होंने अपनी मातृभूमि इंग्लैंड को छोड़कर भारत को कर्मभूमि बना लिया था। अपने गुरु स्वामी विवेकानंद की प्रेरणा से वह युवकों के बीच पहुंचतीं तथा उन्हें बतातीं कि सर्वोपरि धर्म दरिद्रनारायण (गरीबों) की सेवा है।
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भगिनी निवेदिता मिदनापुर (बंगाल) में छात्रों के समक्ष भाषण कर रही थीं। उनके भाषण से मंत्रमुग्ध हुए युवकों ने हिप-हिप हुर्रे का गगनभेदी उद्घोष किया। दूसरी बार भी हिप-हिप हुर्रे का शब्द सुनते ही भगिनी निवेदिता ने कहा, तुम युवकों को अपनी भारतीय भाषा के प्रति तनिक भी सम्मान नहीं है क्या? तुम सब बांग्ला या हिंदी में उद्घोष क्यों नहीं करते?
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एक अंग्रेज युवती के ये शब्द सुनकर छात्र स्तब्ध रह गए। भगिनी निवेदिता ने कहा, भाषण के दौरान सराहना करनी हो, तो बोला करो, सच्चिदानंद परमात्मा की जय, भारत माता की जय। विदेशी भाषा अंग्रेजी में उद्घोष करते हिचक होनी चाहिए। इसके बाद सभास्थल 'सच्चिदानंद परमात्मा की जय' के उद्घोष से गूंज उठा।