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भाषा: विलायत में हिंदी का सम्मान मामूली बात नहीं, क्या हिंदी विरोधी राजनीति स्कॉटलैंड से सबक लेगी?

Tue, 17 Dec 2024 05:50 AM IST
Umesh Chaturvedi उमेश चतुर्वेदी
Updated Tue, 17 Dec 2024 05:50 AM IST
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सार
जिस ब्रिटेन की वजह से हिंदी देसी धरती पर अपना वाजिब आसन नहीं हासिल कर पाई है, वहीं के एक प्रांत में हिंदी में सरकारी कामकाज की मांग उठी है।
 
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Respect for Hindi in foreign countries and politics of opposing hindi in india
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

इसे विडंबना ही कहेंगे कि राजभाषा का दर्जा हासिल होने के बावजूद अपनी हिंदी गैर हिंदीभाषी क्षेत्रों में राजनीतिक विरोध का जरिया बनी हुई है। संसद के मौजूदा शीत सत्र में पारित ‘भारतीय वायुयान विधेयक’ के विरोध में गैर हिंदीभाषी सांसद मुखर हो गए थे, क्योंकि विधेयक का नाम हिंदी में है। ऐसे माहौल में सात-साढ़े सात हजार किलोमीटर दूर विलायती धरती से हिंदी को लेकर सुखद खबर आई है। जिस ब्रिटेन ने भारत को करीब दो सौ साल तक गुलाम रखा, जिसके शासन की वजह से हिंदी देसी धरती पर अब तक अपना वाजिब आसन नहीं हासिल कर पाई है, उसी ब्रिटेन में हिंदी में सरकारी कामकाज किए जाने की मांग उठी है।



जिसे दुनिया ब्रिटेन के नाम से जानती है, उस यूनाइटेड किंगडम का स्कॉटलैंड द्वीपीय प्रांत है। इसी प्रांत की स्थानीय संसद के भारतीय मूल के सांसद ने सार्वजनिक संदेश भेजने के लिए हिंदी का भी इस्तेमाल किए जाने की मांग रखी है। स्कॉटलैंड की स्थानीय संसद में ग्लास्गो से डॉक्टर संदेश गुल्हाने सांसद हैं। उनका तर्क है कि चूंकि 2022 की जनगणना के लिहाज से स्कॉटलैंड में भारतीय मूल के लोगों की जनसंख्या दूसरे नंबर पर है, लिहाजा यहां के सार्वजनिक संदेश और स्वास्थ्य जानकारियां हिंदी में भी भेजे और प्रसारित किए जाने चाहिए। डॉक्टर गुल्हाने की मांग पर स्कॉटलैंड की सरकार की राय जानने से पहले हमें जानना चाहिए कि अगर भारत में ऐसी मांग किसी गैर हिंदीभाषी राज्य में उठी होती, तो वहां के राजनेताओं की प्रतिक्रिया क्या होती? निश्चित तौर पर उस गैर हिंदीभाषी इलाके की राजनीति का एक बड़ा हिस्सा इस मांग के खिलाफ उठ खड़ा होता। गैर हिंदीभाषी इलाकों के लोग इसे हिंदी का साम्राज्यवाद या वर्चस्ववाद बाद में बताते, हिंदीभाषी इलाकों की कुछ बौद्धिक और राजनीतिक ताकतें इसे वर्चस्ववादी मांग बताकर खारिज करने का सुझाव रख देतीं।


लेकिन स्कॉटलैंड में ऐसा कुछ नहीं हुआ। इसकी एक बड़ी वजह यह है कि स्कॉटलैंड या ऐसी दूसरी विदेशी जगहों पर न सिर्फ भारतीय मूल, बल्कि भारतीय उपमहाद्वीप, जिसमें बांग्लादेश, नेपाल, पाकिस्तान और कुछ हद तक अफगानिस्तान तक शामिल है, के लोग आपसी संवाद या संपर्क के लिए ज्यादातर हिंदी का ही प्रयोग करते हैं। वह हिंदी निश्चित तौर पर भारत की खड़ी बोली हिंदी नहीं होती। उसमें उन लोगों की स्थानीय भाषाओं के साथ ही अंग्रेजी या उस देश विशेष की भाषा का भी पुट शामिल होता है, जिस देश में वह समूह रहता या नौकरी करता है। इस लिहाज से कह सकते हैं कि भारत की सीमाओं के बाहर भारतीय उपमहाद्वीप के लोगों की सांस्कृतिक एकता का प्रतीक हिंदी ही है।

ब्रिटेन में छाया या शैडो कैबिनेट की परंपरा है। प्रमुख विपक्षी दल भी अपने नेताओं को मंत्रियों की तरह विभाग बांटता है और जिम्मेदारी प्राप्त लोग अपने-अपने विभागों पर नजर रखते हैं। सरकारी योजनाओं की कमियों को जाहिर करते हैं और उसी आधार पर उसकी आलोचना करते हैं। चुनावों में विपक्षी दल की जीत के बाद छाया मंत्रिमंडल के ही ज्यादातर सदस्य मंत्री बनते हैं और जिन विभागों का काम विपक्ष में रहते वक्त वे संभालते रहे हैं, उन्हीं विभागों और मंत्रालयों का दायित्व उन्हें मिलता है। डॉक्टर संदेश गुल्हाने स्कॉटलैंड के छाया मंत्रिमंडल के सदस्य भी हैं और स्वास्थ्य महकमे पर निगाह रखते हैं। स्कॉटलैंड की संसद एडिनबर्ग में है। उसकी बैठक में एक प्रश्न के जरिये डॉक्टर संदेश गुल्हाने ने स्कॉटलैंड की प्रथम उपमंत्री केट फोर्ब्स से अपील की।

गुल्हाने के मुताबिक, स्कॉटलैंड में हिंदी बोलने वालों की संख्या ऑस्ट्रेलियाई शहर पर्थ की जनसंख्या के बराबर है। उनके सवाल के जवाब में स्कॉटलैंड की प्रथम मंत्री फोर्ब्स का जवाब था कि सरकार गुल्हाने की मांग पर ‘विचार करेगी’, क्योंकि स्कॉटलैंड में हिंदीभाषियों का भी बहुत योगदान है। फोर्ब्स के जवाब की अगली पंक्ति देश की गैर हिंदीभाषी राजनीति को हैरत में डाल सकती है। फोर्ब्स का जवाब रहा, ‘यह बहुत महत्वपूर्ण है कि स्कॉटलैंड के भारतीय मूल के लोगों को लगे कि सभी सरकारी सूचनाएं उनकी अपनी भाषा में उपलब्ध हैं।’ जिस विलायत ने अपनी भाषा के जरिये हमारे यहां मानसिक उपनिवेशवाद की नींव को मजबूत किया है, उसी की धरती पर हिंदी का सम्मान होना मामूली बात नहीं है। बेहतर होता कि भारत की हिंदी विरोधी राजनीति भी इससे कुछ सीख लेती।

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