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इस जीत की गूंज को समझें: महाराष्ट्र प्रति व्यक्ति GDP के लिहाज से सबसे अमीर, राष्ट्रीय राजनीति पर दिखेगा असर

Sun, 24 Nov 2024 05:20 AM IST
दीपक कुमार शर्मा आरती आर जेरथ, राजनीतिक विश्लेषक
आरती आर जेरथ, राजनीतिक विश्लेषक Published by: दीपक कुमार शर्मा Updated Sun, 24 Nov 2024 05:20 AM IST
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सार
महाराष्ट्र में भाजपा की अगुवाई में महायुति की जीत की गूंज पूरे देश में सुनाई दे रही है, क्योंकि इसका असर निश्चित रूप से राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ेगा। राजनीतिक दृष्टि से उत्तर प्रदेश के बाद देश का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण राज्य महाराष्ट्र प्रति व्यक्ति जीडीपी के लिहाज से भी सबसे अमीर राज्य है। जाहिर है कि जो पार्टी यहां राज करती है, उसका राजनीतिक कद बहुत बढ़ जाता है।
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Resonance of victory in Maharashtra richest state in terms of per capita GDP impact on national politics
जीत के बाद एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर जश्न मनाते देवेंद्र फडणवीस, एकनाथ शिंदे और अजित पवार - फोटो : एजेंसी/अमर उजाला

विस्तार

झारखंड में इंडिया गठबंधन को जीत भले मिली हो, लेकिन नतीजे स्पष्ट करते हैं कि इस जीत का पूरा श्रेय हेमंत सोरेन और उनके झारखंड मुक्ति मोर्चा को जाता है। हेमंत सोरेन ने अपनी गिरफ्तारी के बाद उठी सहानुभूति की लहर और आदिवासी वोटों के एकीकरण के दम पर अपने लिए दूसरा कार्यकाल जीत लिया।



पहली नजर में देखें, तो महाराष्ट्र और झारखंड विधानसभा चुनावों के नतीजों का स्कोर कार्ड बराबरी पर रहा है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की अगुवाई वाले महायुति ने महाराष्ट्र में सूपड़ा साफ किया है, तो झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) और कांग्रेस वाला इंडिया गठबंधन झारखंड में अपनी सत्ता बरकरार रखने में सफल रहा। हालांकि महाराष्ट्र में भाजपा द्वारा संचालित महायुति की जीत की गूंज पूरे देश में सुनाई दे रही है, क्योंकि इसका असर निश्चित रूप से राष्ट्रीय राजनीति पर पड़ेगा। राजनीतिक दृष्टि से उत्तर प्रदेश के बाद महाराष्ट्र देश का दूसरा सबसे महत्वपूर्ण राज्य है, जिसमें 48 लोकसभा सीटें हैं। महाराष्ट्र प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के लिहाज से देश का सबसे अमीर राज्य है। सबसे खास बात यह है कि यह देश की वित्तीय राजधानी यानी मुंबई का घर भी है। जाहिर तौर पर जो पार्टी महाराष्ट्र पर राज करती है, उसका राजनीतिक कद बहुत बढ़ जाता है।


हरियाणा में कांग्रेस की चुनौती को धूल चटाने के एक महीने बाद भारतीय जनता पार्टी ने महाराष्ट्र में भी जबरदस्त प्रदर्शन किया है। इतना ही नहीं उसने महायुति के अपने सहयोगियों के दमदार प्रदर्शन की बदौलत गिरावट के उस आख्यान को भी पलट दिया, जो लोकसभा चुनाव में बहुमत के आंकड़े को छूने में हुई विफलता के साथ शुरू हुआ था। यह जीत इस बात का स्पष्ट संदेश देती है कि भारतीय जनता पार्टी किसी एक हार से अपना और कार्यकर्ताओं का मनोबल गिराने वाली पार्टी नहीं है। कुछ भी हो जाए, एक चुनावी हार के बाद भाजपा खेल में वापस आने के लिए और विरोधियों को पस्त करने लिए अपनी जीत की जमीन व रणनीति तैयार करने में जुट जाती है और इस बार भी उसने ठीक यही किया। अपने सहयोगियों एकनाथ शिंदे की शिवसेना और अजीत पवार की राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) के साथ महायुति ने राज्य के सभी छह क्षेत्रों में निर्णायक रूप से जीत हासिल की और राज्य विधानसभा में दो-तिहाई बहुमत हासिल किया। महाराष्ट्र में चार दशक से भी अधिक समय पहले कांग्रेस के उत्कर्ष काल के बाद से किसी भी सत्तारूढ़ गठबंधन ने इस आंकड़े को नहीं छुआ है। लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन से मिली करारी हार (महाराष्ट्र की 48 में से महायुति को 17 सीटें ही मिली थीं) से आहत महायुति ने अपने गठबंधन में सुधार करने के साथ ही अपनी छवि को बदलने के लिए कड़ी मेहनत की। तमाम प्रयासों का ही नतीजा है कि विधानसभा चुनाव में महायुति को एकतरफा जनादेश मिला है।

महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाले गठबंधन यानी महायुति को मिली प्रचंड जीत का श्रेय कई कारकों को जाता है। लोकप्रिय लाडकी बहिन योजना के जरिये महिलाओं के खाते में सीधी धनराशि भेजी गई, विदर्भ और मराठवाड़ा में किसानों के असंतोष को शांत करने के लिए कई कल्याणकारी लाभ दिए गए, मराठा आरक्षण के नेता मनोज जरांगे पाटिल को अपना आंदोलन वापस लेने के लिए मनाया गया और मोदी के करिश्माई नारे ‘एक हैं तो सेफ हैं’ ने हिंदू मतदाताओं को महायुति के पक्ष में एकजुट करने का काम किया। और सबसे महत्वपूर्ण बात, लोकसभा चुनाव के दौरान नदारद रहने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के स्वयंसेवकों ने शांतिपूर्ण ढंग से जमीनी स्तर पर अभियान चलाया।

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के नतीजों के कुछ महत्वपूर्ण निष्कर्ष भी हैं। इनमें एक है स्थानीय नेताओं का बढ़ता महत्व। हरियाणा और महाराष्ट्र, दोनों ही राज्यों में भाजपा ने सिर्फ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करिश्मे पर ही निर्भर न रहते हुए, अपने राज्य के नेतृत्व को भी आगे रखा। दूसरी बात यह कि इस जीत से इस बात की भी पुष्टि होती है कि कांग्रेस सीधे तौर पर अब भाजपा का मुकाबला करने में असमर्थ है। देश की सबसे सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस महाराष्ट्र में अपने अब तक के सबसे कम स्कोर के साथ सीटों की संख्या के मामले में सबसे निचले पायदान पर पहुंच गई है। कांग्रेस ने जिन सौ सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे, उनमें करीब सत्तर सीटों पर भाजपा के साथ आमने-सामने की लड़ाई थी। इनमें से कांग्रेस बीस सीटें भी नहीं जीत पाई। तीसरा निष्कर्ष यह है कि ये नतीजे शिंदे सेना और उद्धव ठाकरे सेना के साथ-साथ अजीत पवार की राकांपा और चाचा शरद पवार के गुट के बीच विरासत की लड़ाई का भी समाधान करते हैं। एकनाथ शिंदे और अजीत पवार, दोनों ही अपनी पार्टियों के नेतृत्व का दावा करने के लिए विजेता बनकर उभरे हैं।

चौथा और यह शायद सबसे अधिक चौंकाने वाला निष्कर्ष, महाराष्ट्र की राजनीति के सबसे बुजुर्ग नेता शरद पवार की चमक का फीका पड़ना है। उन्होंने अपने राजनीतिक कौशल से चार दशकों तक राज्य की राजनीति पर प्रभुत्व जमाकर रखा, जिसके दम पर उन्होंने कई सरकारें बनाई और गिराई भी हैं। लेकिन इस बार वह पूरी तरह विफल हो गए और अपने गढ़ पश्चिमी महाराष्ट्र को भी नहीं बचा सके। इस क्षेत्र में उनके भतीजे अजीत पवार के गुट ने राकांपा बनाम राकांपा की लड़ाई में ज्यादा सीटें जीतने में कामयाबी हासिल की। शरद पवार ने खुद घोषणा की थी कि यह उनका अंतिम चुनाव है। इस दिग्गज के लिए यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि 84 साल की उम्र में और कमजोर स्वास्थ्य के बावजूद वह अपने लिए राजनीति से एक सम्मानजनक विदाई की पटकथा लिखने में विफल रहे।

हालांकि झारखंड में मिली जीत इंडिया गठबंधन के लिए एक आशा की किरण है। कांग्रेस इसका सही उपयोग भाजपा को जवाब देने के लिए कर सकती है, लेकिन नतीजे स्पष्ट करते हैं कि इस जीत का पूरा श्रेय हेमंत सोरेन और उनके झारखंड मुक्ति मोर्चा को जाता है। हेमंत सोरेन ने अपनी गिरफ्तारी के बाद सहानुभूति की लहर और आदिवासी वोटों के एकीकरण के दम पर अपने लिए दूसरा कार्यकाल जीतने के लिए कांग्रेस का बोझ अपने कंधों पर उठा लिया था। सोरेन के अभियान का मुख्य मुद्दा-आदिवासी पहचान का संरक्षण और आदिवासियों के सरना कोड के लिए सांविधानिक दर्जा रहा, जो भाजपा के बांग्लादेशी घुसपैठ के मुद्दे पर भारी पड़ता दिखा। चूंकि सांविधानिक आवश्यकताओं के अनुसार, महाराष्ट्र में अगली सरकार 26 नवंबर तक बननी है, इसलिए महायुति इस जटिल प्रश्न को निपटाने के लिए तेजी से कदम उठाएगा कि अगला मुख्यमंत्री कौन होगा? एकनाथ शिंदे या भाजपा के देवेंद्र फडणवीस या फिर कोई और? खैर, इस बहस के जवाब पर अटकलें लगाने का अब कोई मतलब नहीं है। आगे देखते हुए 25 नवंबर से शुरू होने वाले संसद के शीतकालीन सत्र में, महाराष्ट्र में मिली जीत के साथ उत्तर प्रदेश विधानसभा के उपचुनावों में अपनी पांच सीटों को बरकरार रखने के अलावा समाजवादी पार्टी से दो सीटें छीनने में भी कामयाब रही भाजपा के अधिक आक्रामक दिखने की उम्मीद है।

विपक्ष के नेता राहुल गांधी अब वायनाड लोकसभा उपचुनाव जीतने वाली बहन प्रियंका गांधी वाड्रा के रूप में अपने शस्त्रागार में एक अतिरिक्त तीर से जरूर युक्त हुए हैं। उम्मीद है कि वह उद्योगपति गौतम अदाणी के खिलाफ जारी अमेरिकी गिरफ्तारी वारंट को लेकर मोदी सरकार पर अपने सभी शस्त्र चलाएंगे, लेकिन उनकी पार्टी का हरियाणा के विधानसभा चुनाव के बाद से जिस तरह का प्रदर्शन रहा है, वह उनकी धार को कुंद ही करेगा। फिलहाल यह भी तय नहीं है कि प्रमुख व्यवसायी पर हमला करने के लिए राहुल गांधी को इंडिया गठबंधन के ही उनके साझेदारों से कितना समर्थन मिलेगा, क्योंकि अदाणी का न केवल कई राज्यों में भारी निवेश है, बल्कि मोदी सरकार के साथ भी उनके करीबी संबंध हैं। महाराष्ट्र में मिली प्रचंड जीत भारतीय जनता पार्टी के लिए गेम चेंजर साबित होगी, जिसकी उसे लोकसभा चुनाव में पूर्ण बहुमत न मिलने के बाद से तलाश थी।

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