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मानसून की तरह इस्तीफा
राजेंद्र शर्मा
Updated Mon, 29 Jun 2015 08:11 PM IST
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ललित मोदी का मुद्दा सामने आने के बाद थोक में इस्तीफे की मांग की जा रही थी। ऐसा लग रहा था कि मानसून की तरह इस्तीफा अब हुआ। पर जैसे मानसून के नाम पर राजधानी में अब तक छिटपुट बारिश हुई है, वैसे ही इस्तीफे के नाम पर सिर्फ दिल्ली के शिक्षा मंत्री तोमर साहब का इस्तीफा हुआ है। बारिश की बाट जोहते दिल्ली के किसानों की तरह विपक्षी नेता भी इस्तीफों की बाट ही जोह रहे हैं।
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पब्लिक की हम नहीं जानते, पर सरकार को मौसम की यह दगाबाजी पसंद नहीं आई है। बेशक, मानसून में देरी की भविष्यवाणी मौसम विभाग ने पहले से कर रखी थी। पर इस्तीफों का मौसम आ रहा है, ऐसा तो मौसम विभाग ने भी नहीं कहा था। सरकार का पूरा खुफिया तंत्र भी फेल हो गया। आसमान बिल्कुल साफ था। ललित गेट अचानक ऐसा खुला कि अब इस्तीफों की मांग की बारिश थमने का नाम ही नहीं ले रही। पहले सुषमा। फिर वसुंधरा। फिर स्मृति। अब पंकजा। इस्तीफों की मांग है या खाकी परिवार की गद्दीधारी बहनों की सूची।
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किसने सोचा था कि इस्तीफों की मांग का सीजन भी इतना नारी विरोधी निकलेगा! खैर! राजनाथ बाबू ने ठीक किया। साफ-साफ कह दिया कि यह यूपीए की नहीं, एनडीए की सरकार है। इस्तीफों की मांग का सीजन कितना ही जोर लगाए, पर एनडीए के राज में इस्तीफा कोई नहीं देगा। बात भी ठीक है। मांगने वालों को तो बहाना चाहिए। इंसानियत दिखाने से लेकर, अपनी पढ़ाई भूल जाने तक, किसी भी बात के लिए इस्तीफा मांग लेते हैं। चटाई-चिक्की की खरीद के लिए भी। ऐसे मामलों में सिद्धांत पर चलना ही अच्छा रहता है। कह दिया कि हमारे राज में इस्तीफा नहीं होगा, बस बात खत्म। सच-झूठ के चक्करों में पड़ने की गलती ही क्यों करें? जो सुबूतों के चक्कर में पड़ेगा, वह यूपीए की राह लगेगा।
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खैर! कोई इस्तीफा दे न दे, इस्तीफों का सीजन जोरों पर है। इसकी बाढ़ में संसद का मानसून सत्र डूबेगा ही डूबेगा। पर लोग यह क्यों भूलते हैं कि ईमानदारी के दावों में इस्तीफे का कोई जिक्र नहीं है।