रेशमा, मेहदी हसन और चुनावी ऊंट
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राजस्थान में हो रहे विधानसभा चुनावों में लोहा और लूणा दो ऐसे गांव हैं, जिनकी आबादी इतनी कम है कि किसी उम्मीदवार की हार-जीत पर इसका असर नहीं पड़ता। लेकिन सौ किलोमीटर के फासले पर बसे ये दोनों गांव अपने आप में बड़ा खजाना लिए हुए हैं। चुरू जिले के रतनगढ़ कस्बे में लोहा गांव है, जहां रेशमी आवाज वाली रेशमा का जन्म हुआ था। झुंझुनू जिले में अल्सीसर कस्बे में लूणा गांव है, जहां शहद जैसी मीठी आवाज के धनी मेहदी हसन का जन्म हुआ था। दोनों फनकार विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए थे। दोनों को गांव बहुत याद आता था। मगर आंख मूंदने से पहले अपने गांव में आने की इन दोनों फनकारों की इच्छा पूरी न हो सकी। दोनों गांवों में लोग भले ही इन दिनों भाजपा या कांग्रेस की बात कर रहे हों, लेकिन वे जानते हैं कि उनकी मांगों को चुनाव जीतने के बाद नेता उसी तरह भुला देंगे, जिस तरह रेशमा और मेहदी हसन को नई पीढ़ी भूलने लगी है।
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लूणा गांव पहुंचने पर पक्की सड़क ने स्वागत किया। गांव में पुराने कुएं भी दिखे और नई सरकारी टंकियां भी। गांव के बाहर ही एक बुजुर्ग मिल गए। उनसे मेहदी हसन के बारे में पूछा, तो सीधे ले गए नारायण सिंह शेखावत के यहां। सुबह की कच्ची धूप में 98 साल के नारायण सिंह मोटे चश्मे से अखबार पढ़ते नजर आए। उनसे उनके बचपन के दोस्त मेहदी हसन के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने अपने परपोते को एक किताब लाने का इशारा किया। इस पतली-सी किताब में नारायण सिंह ने यार मेहदी हसन को 'धरती धोरां री' का सबसे कीमती रत्न बताते हुए दोहे लिखे हैं। (किताब मेहदी हसन की मौत से बहुत पहले लिखी गई थी। मेहदी हसन का इंतकाल 2012 में हुआ) नारायण सिंह ने किताब में लिखा है कि उनका यार कभी लूणा गांव आए, क्योंकि उससे मिलने को दिल तरसता है। वह बताने लगे कि बकरी के गोश्त के शौकीन मेहदी हसन बचपन में अखाड़े में कुश्ती के दांव-पेच सीखा करते थे। अपने पिता, चाचा और दादा की संगत में संगीत की तरफ रुझान हुआ और ध्रुपद गाने लगे। उनके दादा की मजार आज भी गांव में मौजूद है। आजादी के समय मेहदी हसन का परिवार स्थानीय रियासत के ठिकानेदार के कहने पर पाकिस्तान जाने को मजबूर हो गया।
गांव में नारायण सिंह शेखावत के अलावा अर्जुन राम जांगिड़, उमाशंकर और सागरमल पंडित भी मेहदी हसन के बाल-सखा हुआ करते थे। अब इनमें से नारायण सिंह और उमाशंकर ही बचे हैं। मेहदी हसन जब रियाज करते थे, तो दादा किसी को घर में घुसने नहीं दिया करते थे। सिर्फ इन चार दोस्तों को ही अंदर जाने और मेहदी हसन का रियाज सुनने की इजाजत थी। नारायण सिंह याद करते हैं कि वर्ष 1977 में मेहदी हसन राजस्थान सरकार के एक सांस्कृतिक कार्यक्रम में भाग लेने जयपुर आए, तो उनका लूणा गांव भी आना हुआ था। यहां की रेत से लिपट कर वह रोने लगे थे और बाजरे की रोटी लाल मिर्च की चटनी के साथ खाई थी। झुंझुनू के राणी सती मंदिर परिसर में उन्होंने गजलें गाईं और श्रोताओं से जो कुछ इनाम में मिला, उससे गांव की सड़क बनवाई।
नारायण सिंह आज भी मेहदी हसन के जन्मदिन पर संगीत का कार्यक्रम रखते हैं। पोता कहने लगा कि वह अपनी जमीन भी सरकार को मुफ्त में देने को तैयार हैं, अगर वहां सरकार उनके यार मेहदिया का स्मारक बनवाने को राजी हो जाए। वैसे एक बात उस समय की राजनीति की अच्छी लगी। 1977 में भैरोंसिंह शेखावत राजस्थान के मुख्यमंत्री थे, जब उनकी सरकार ने राजस्थान दिवस पर पाकिस्तान से मेहदी हसन को बुलाया था। इसी तरह 2003 में अशोक गहलोत की सरकार थी, जब मेहदी हसन साहब जयपुर आए थे, लेकिन घुटनों में दर्द के कारण गांव नहीं जा पाए थे। अशोक गहलोत ने उनके इलाज के लिए चालीस लाख रुपये स्वीकृत किए थे। वह चाहते थे कि मेहदी हसन केरल जाकर इलाज करवाएं, लेकिन भारत-पाक राजनीति के चक्कर में यह सब हो नहीं सका था। मेहदी साहब के गांव से निकलते हुए अहमद फराज की गाई गजल बहुत याद आई-रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ/आ फिर से मुझे छोड़कर जाने के लिए आ।
रतनगढ़ पहुंचे, तो वहां पता चला कि लोहा गांव में ढोलनियों के परिवार में रेशमा जन्मी थीं। यहां रेतीले टीलों पर बकरियां चराकर बचपन बीता था। बहुत साल पहले जयपुर में रेशमा से हुई छोटी-सी मुलाकात याद आई, जिसमें उन्होंने मरने से पहले एक बार उन्हीं रेतीले टीलों को देखने और महसूस करने की ख्वाहिश जताई थी। यह ख्वाहिश उनकी बाद में पूरी भी हुई थी। लेकिन लगता है कि आम जनता रेशमा जैसी सौभाग्यशाली नहीं होती, जिनसे घोषणापत्र में किए गए वायदे आमतौर पर पूरे नहीं होते।
रतनगढ़ से आगे बीकानेर में ऊंटों पर शोध का राष्ट्रीय केंद्र है, वहां शाम को पहुंचे, तो ऊंटनी का दूध निकाला जा रहा था, जिसे विदेशी पर्यटक कैमरों से उतार रहे थे। हमें भी दूध दिया गया। बिल्कुल गाय या भैंस के दूध जैसा दूध। केंद्र के निदेशक बताने लगे कि जल्द ही ऊंटनी के दूध से बनी आइसक्रीम संसद की कैंटीन में रखी जाएगी। बताया गया कि एक वक्त भारत में दस लाख ऊंट हुआ करते थे, पर अब संख्या घटकर चार लाख ही रह गई है। संसद में आइसक्रीम रखने का एक मकसद यह भी है कि सांसदों को ऊंट की घटती संख्या से अवगत करवाया जाए।
एक सवाल ऊंट के करवट लेने पर जरूर करना था। दरअसल चुनाव कवर करने वाले पत्रकार अक्सर एक जुमले का जिक्र करते हैं, चुनावी ऊंट किस करवट बैठेगा! टीवी पत्रकार ऊंट पर बैठकर रिपोर्टिंग करना नहीं चूकते। हमें बताया गया कि यह अंदाज लगाना असंभव होता है कि ऊंट आखिर किस करवट बैठेगा। ऊंट को जब बिठाया जाता है, तो वह किस तरफ करवट लेकर बैठेगा, इसका एहसास वह रैबारी भी नहीं लगा पाते, जो बचपन से ही ऊंटों के साथ रहते हैं। शायद यही वजह है कि ऊंट की करवट को लेकर कहावत बनी। तो फिर कैसे कहें कि राजस्थान का चुनावी ऊंट किस करवट बैठेगा। संकेत तो कांग्रेस की तरफ हैं, लेकिन फिर वही बात, ऊंट तो ऊंट है।