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दांव पर रिजर्व बैंक की साख

Sat, 09 Jul 2016 11:26 AM IST
एम के वेणु
एम के वेणु Updated Sat, 09 Jul 2016 11:26 AM IST
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Reserve bank credibility on stake
एम के वेणु

माकपा के महासचिव सीताराम येचुरी ने बड़ी व्यावसायिक कंपनियों पर बकाया कर्ज से जूझते सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को राहत देने के लिए रिजर्व बैंक के पूंजीगत आधार से तीन लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त निकासी की एनडीए सरकार की योजना पर तीखा विरोध जताया है। प्रधानमंत्री को लिखे अपने पत्र में येचुरी ने कहा है, 'यह खतरनाक योजना है, क्योंकि इससे आंतरिक एवं बाह्य झटकों से निपटने की रिजर्व बैंक की क्षमता को नुकसान पहुंच सकता है।' उन्होंने प्रधानमंत्री से कहा है कि इसके बजाय सरकार बड़े कर्जदारों के पास फंसे 8.55 लाख करोड़ रुपये के बकाये की वसूली पर ध्यान दे। इनमें से शीर्ष दस व्यावसायिक कर्जदारों के पास ही बैंकों के सात लाख करोड़ रुपये बकाया हैं। संसद के आगामी सत्र में कांग्रेस भी यह मुद्दा उठाएगी। हाल में कांग्रेस प्रवक्ता ने भी सरकार पर बड़े बकायेदारों को छोड़कर छोटी मछलियों पर शिकंजा कसने का आरोप लगाया है।

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सीताराम येचुरी ने कहा है कि बकाया कर्ज की वसूली से जुड़ी प्रभावी कार्ययोजना के बिना बैंकों को दोबारा पूंजी मुहैया कराने की योजना को कतई मंजूरी नहीं मिलनी चाहिए। उन्होंने प्रधानमंत्री को पत्र में लिखा है, 'आपकी सरकार ने बड़ी कंपनियों पर कर्ज वापसी के लिए कोई दबाव नहीं बनाया। उनके ठाठ-बाट वैसे ही हैं, और उनकी संपत्ति पर भी कोई असर नहीं पड़ा।' जदयू और तृणमूल कांग्रेस समेत दूसरे राजनीतिक दल भी इस मामले में सरकार से सवाल कर रहे हैं। सरकार पिछले कुछ सप्ताहों से रिजर्व बैंक के चार लाख करोड़ रुपये की विशाल राशि को चुपचाप और आश्चर्यजनक तरीके से बैंकों को देने की तैयारी में है, जो फिलहाल करीब दस हजार करोड़ रुपये के बुरे कर्ज के बोझ से जूझ रहे हैं। रघुराम राजन समेत केंद्रीय बैंक के शीर्ष अधिकारी भी देश की वित्तीय व्यवस्‍था के प्रमुख स्रोत रिजर्व बैंक के पूंजीगत आधार से छेड़छाड़ को इस संस्‍था को कमजोर करने से जुड़ा कदम मान रहे हैं, खासकर तब, जब दुनिया ब्रेग्जिट के असर से अछूती नहीं है।
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वित्तीय घाटे पर नियंत्रण दिखाने के लिए सरकार केंद्रीय बजट के बजाय रिजर्व बैंक के इक्विटी फंड से पैसा निकालना चाहती है, ताकि वित्तीय घाटा नियंत्रण में रहे। इसके लिए अगर बजट के जरिये धन आवंटित करेंगे, तो उससे जीडीपी में तीन प्रतिशत तक गिरावट हो सकती है। वैसे में वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों की नजर में भारत की साख गिरने का भी डर है। ऐसे में, सरकार को लगता है कि बैंकों का घाटा दूर करने के लिए रिजर्व बैंक के संसाधन का इस्तेमाल करना ही सबसे आसान है।
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राजनीतिक रूप से भी इस कदम पर सवाल उठेंगे, क्योंकि बैंकों का करीब साढ़े सात लाख करोड़ रुपये दबाए बैठे बडे़ कारोबारियों पर इससे दबाव कम हो जाएगा। इतनी बड़ी राशि की वसूली के लिए इन कारोबारियों की मुनाफे में चल रही परिसंपत्तियों को बेचने के लिए रिजर्व बैंक दबाव बना रहा था। लेकिन अब खुद उसकी पूंजी का इस्तेमाल सार्वजनिक बैंकों को घाटे से उबारने के लिए करने पर बकायेदार कारोबारियों पर नकेल ढीली होना तय है। सरकार की इस योजना का विरोध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आर्थिक थिंकटैंक स्वदेशी जागरण मंच के अश्विनी महाजन भी कर चुके हैं।

प्रधानमंत्री कार्यालय ने इस कदम को लेकर चतुराई भरा तर्क देने की कोशिश की है। एक अनौपचारिक नोट में कहा गया है कि कुल पूंजी के मामले में रिजर्व बैंक दुनिया में दूसरे स्‍थान पर है। इसका पूंजीगत का आधार इसकी बैलेंस शीट का 31 प्रतिशत है, जबकि दुनिया के अन्य केंद्रीय बैंकों का औसत पूंजीगत आधार उनकी बैंलेस शीट का 11 प्रतिशत ही है। ऐसे में, सरकार का तर्क है कि रिजर्व बैंक की मजबूती से समझौता किए बिना इसके पूंजीगत आधार को कुछ फीसदी तक कम किया जा सकता है। रिजर्व बैंक अगर चार लाख करोड़ रुपये की रियायत अपने पूंजीगत आधार से देता है, तो भी इसकी कुल परिसंपत्तियों का 19 प्रतिशत इसके पूंजीगत आधार में बचा रहेगा। पीएमओ का तर्क है कि रिजर्व बैंक का मौजूदा पूंजीगत आधार 31 प्रतिशत से कम होने पर भी यह 11 प्रतिशत के वैश्विक औसत से काफी अधिक होगा। लेकिन इस नोट में यह नहीं बताया गया कि निम्न पूंजीगत आधार वाले इन देशों में मजबूत मुद्रा वाली विकसित अर्थव्यवस्‍थाएं (अमेरिका, ब्रिटेन, जापान) हैं या फिर प्राकृतिक संसाधनों से संपन्न अर्थव्यवस्‍थाएं, जो वैश्विक आर्थिक झटकों के प्रति इतनी संवेदनशील नहीं हैं। भारत चूंकि ऐसा नहीं है, इसलिए यहां केंद्रीय बैंक के पूंजीगत आधार को ऊंचा बनाए रखा गया है।


कुछ वर्ष पहले वाईएच मालेगम समिति ने इस मुद्दे पर विस्तार से अध्ययन किया था। रिजर्व बैंक की संचित पूंजी के उपयोग पर समिति का तर्क था कि केंद्रीय बैंक के पूंजीगत आधार को नुकसान नहीं पहुंचाना चाहिए, क्योंकि यह भविष्य में आंतरिक एवं बाह्य आर्थिक झटकों से निपटने के लिए जरूरी है। खराब मानसून और सूखे जैसी स्थितियों के कारण मुद्रास्फीति बढ़ने से आंतरिक आर्थिक संकट पैदा होता है। जबकि ब्रेग्जिट जैसे घटनाक्रम या फिर चीन की अर्थव्यवस्‍था में मंदी बाहरी कारणों में गिनाए जा सकते हैं। मालेगम समिति की चेतावनी के बावजूद केंद्र सरकार सार्वजनिक बैंकों को घाटे से उबारने और कर्ज का भुगतान न करने वाली बड़ी व्यावसयिक कंपनियों को रियायत देने के लिए रिजर्व बैंक के पूंजीगत आधार में सेंध लगाना चाहती है, जिसमें आकस्‍मिक पूंजी भी शामिल है। रिजर्व बैंक का अगला गवर्नर कोई भी हो, इस कदम का विरोध तय है। केंद्र सरकार शायद मान रही है कि रघुराम राजन के जाने के बाद चीजें आसान हो जाएंगी। पर हकीकत यह है कि भारत के केंद्रीय बैंक की संस्‍थागत साख दांव पर लगी है।

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