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रुपया तू काहे न धीर धरे
शंकर अय्यर
Updated Tue, 04 Sep 2018 06:45 PM IST
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रुपया
एडम स्मिथ ने कहा था कि सभी धन विश्वास की वस्तु है। और इसलिए ऐसा लगता है कि रुपये का मूल्य है। हर कुछ साल में रुपया खबरों में रहता है, क्योंकि यह स्थिरता से अस्थिरता की ओर लुढ़क जाता है। एक जनवरी, 2018 को एक डॉलर की कीमत 63.37 रुपये थी। तीन सितंबर को एक डॉलर की कीमत 71.08 रुपये हो गई। भारत का आर्थिक इतिहास अक्सर अनुक्रमों में सामने आता है। व्यवस्थागत नींद से अचानक जागकर व्यक्त की जाने वाली कथित 'चिंता' अस्थिरता और घटनाओं की गति पर निर्भर करती है।
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भारत में हर दशक में एक या दो प्रमुख संकट सामने आए हैं और उनमें से लगभग सभी आंतरिक कमजोरी और बाह्य झटके की भेद्यता तक पहुंचे हैं। आम तौर पर कहानी जानने के कोरस से शुरू होती है, रुपये के बारे में दावे का अधिमूल्यांकित किया जाता है, सुधार की सख्त आवश्यकता होती है। इसके बाद लाभ के सिद्धांत को बढ़ावा दिया जाता है-निर्यातकों को प्रोत्साहन और आयात पर दबाव। रुपये पर भारत में किसी भी राजनीतिक दल का रुख इस बात निर्भर करता है कि वह कहां बैठा है। जब कोई पार्टी सत्ता में होती है, तो उसके लिए रुपये में गिरावट का कारण कभी घरेलू परिस्थितियां नहीं होतीं, बल्कि वह वैश्विक कारणों का नतीजा होती है। मगर जब कोई पार्टी विपक्ष में होती है, तो रुपये की गिरावट का कारण घरेलू होता है। एक विद्वान व्यक्ति ने यह निष्कर्ष निकाला कि 'यह डॉलर का उन्नयन है, रुपये का अवमूल्यन नहीं।' हर बार कहानी वही रहती है, बस पात्र अपनी भूमिकाएं और संवाद बदल लेते हैं। राजनीतिक परिदृश्य पिछले बयानों के पुनर्जीवित मलबों से भरा हुआ है।
सोशल मीडिया पर स्याह हास्य की कोई कमी नहीं है। लोगों की राय केवल व्याख्याएं हो सकती हैं, वे तथ्यों को बदल नहीं सकतीं। अगस्त, 2017 (एक डॉलर की कीमत 63.24 रुपये) से अगस्त, 2018 के बीच रुपये में दस फीसदी से ज्यादा की गिरावट आई है। निश्चित रूप से अन्य मुद्राओं पर भी संकट है। लेकिन कुछ अन्य मुद्राएं भी हैं, जो इस तूफान का सामना कर रही हैं। बांग्लादेश के टका में चार फीसदी से भी कम की गिरावट आई है और वियतनामी मुद्रा डोंग में 2.5 फीसदी की गिरावट है। ब्रिक्स देशों में ब्राजील की रियाल में 30 फीसदी, रूस की रुबल में 20 फीसदी, भारतीय रुपया में दस फीसदी और चीन की मुद्रा युआन में करीब 6.8 फीसदी की गिरावट आई है।
यह छिपी हुई बात नहीं है कि कमजोर मुद्रा के कारण ईंधन और अन्य चीजों का आयात महंगा हो जाता है और अंततः मुद्रास्फीति बढ़ती है। 1974, 1980, 1991, 2013 में सभी संकट अंतर्निहित कमजोरी के कारण पैदा हुए थे। मानव शरीर के साथ अर्थव्यवस्था की भी प्रतिरक्षा शक्ति आर्थिक सेहत पर निर्भर करती है। निश्चित रूप से भारत ने सात फीसदी से ज्यादा विकास दर के कारण अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की रिपोर्ट में जगह बनाई है। उच्च वृद्धि-और वास्तव में 8.2 फीसदी सकल मूल्य वर्धन (जीवीए) दर्ज की गई पिछले वर्ष के 5.6 फीसदी सकल मूल्य वर्धन की तुलना में।
यूपीए-एक में भारत की दोहरे अंकों में जीडीपी विकास दर 2003 में वृहत आर्थिक कारकों के मजबूत होने के कारण थी और वैश्विक विकास पर सवार थी। 2004 से 2007 के बीच इन चार कैलेंडर वर्ष में वैश्विक निर्यात का औसत 8.1 फीसदी था और भारत का औसत निर्यात 19.9 फीसदी था। बाद में इस उछाल में कमी आई और 2008 में वैश्विक आर्थिक संकट पैदा हुआ। वर्ष 2014 से 2017 के कैलेंडर वर्ष में वैश्विक व्यापार की औसत दर 3.7 फीसदी रही, जबकि इस अवधि में भारत का निर्यात दयनीय रूप से 1.7 फीसदी रहा। लोकप्रिय धारणा है कि एक कमजोर मुद्रा निर्यात को बढ़ाती है। क्या इसकी जांच हुई है?
वर्ष 2014 में एक डॉलर की कीमत 59 रुपये थी और 2018 में इसकी कीमत 71 रुपये है। कैलेंडर वर्ष 2014 में भारत का निर्यात 322 अरब डॉलर तक पहुंच गया और इसका सकल घरेलू उत्पाद करीब 18 खरब डॉलर था। वर्ष 2017 में, भारत की जीडीपी 26 खरब डॉलर के पार हो गई थी, लेकिन इसका निर्यात 300 अरब डॉलर से भी कम हो गया है। यह तर्क दिया जा सकता है कि वैश्विक स्थितियां चुनौतीपूर्ण हो गई हैं। तो अन्य देशों ने कैसे विकास किया? आंकड़े बताते हैं कि बांग्लादेश का निर्यात 30 अरब डॉलर से 35 अरब डॉलर पर पहुंच गया। चीन का औसत निर्यात 22 खरब डॉलर है और वियतनाम का निर्यात 150 अरब डॉलर से 214 अरब डॉलर पर पहुंच गया।
यह कोई रहस्य नहीं है कि भारत ने निर्यात की नीति तैयार करने के लिए संघर्ष किया है। 1990 में चीन का निर्यात 62 अरब डॉलर से थोड़ा ज्यादा था और भारत का 17.9 अरब डॉलर था। फिर चीन ने इतना विकास कैसे किया? 2017 में, भारत ने 298 अरब डॉलर के सामान निर्यात किए, जबकि चीन का निर्यात 22.4 खरब डॉलर से अधिक था। वहीं दक्षिण कोरिया का निर्यात 1990 से 2017 के बीच 65 अरब डॉलर से बढ़कर 573 अरब डॉलर से ज्यादा का हो गया। बांग्लादेश ने अपने निर्यात में बीस गुना की वृद्धि की। वियतनाम का निर्यात 2.4 अरब डॉलर से 214 अरब डॉलर पर पहुंच गया और उसकी प्रति व्यक्ति आय 130 डॉलर से बढ़कर 2,170 डॉलर हो गई है, जबकि भारत की प्रति व्यक्ति आय 380 डॉलर से 1,820 डॉलर पर ही पहुंची है।
भारत के खराब निर्यात प्रदर्शन का कारण इसके आयात और भारत की घरेलू प्रतिस्पर्धा में परिलक्षित होता है। यह परमिट राज को खत्म करने में असमर्थता, प्रतिस्पर्धा में बाधा डालने वाले विवरणों को हटाने, इंस्पेक्टर राज, कठोर श्रम कानूनों, लक्ष्य के पैमाने और रोजगार पर भ्रम, अनुसंधान की अपर्याप्तता, प्रौद्योगिकी और सर्वोत्तम प्रथाओं को शामिल करने के लिए एफडीआई खोलने के प्रति अनिच्छा से पैदा होती है। रुपये के मूल्य में गिरावट सीधे तौर पर भेद्यता और रुपये में कमाई और डॉलर में खर्च करने के जोखिम के कारण है। वृहत आर्थिक कारकों को मजबूत करने का भारत का दावा दागदार है और आगे और भी दागदार होगा। यह अच्छी तरह से पता है कि रुपये में गिरावट अल्पकालिक है, लेकिन अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति पर इसका दीर्घकालीन प्रभाव होता है। बुनियादी अधिकारों को पाने में विफलता भारत को रोक रही है और जो एक और संकट को आमंत्रण है।