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पाकिस्तान में नेताजी की याद

Thu, 28 Jan 2016 06:40 PM IST
मरिआना बाबर
मरिआना बाबर Updated Thu, 28 Jan 2016 06:40 PM IST
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Remembrance of Netaji in Pakistan

भारत में नेताजी सुभाष चंद्र बोस से संबंधित गोपनीय फाइलें सार्वजनिक होने से पाकिस्तान के एक गांव में भी खासा उत्साह है, जिसने फॉरवर्ड ब्लॉक के साथ नेताजी के जीवन और ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ उनके संघर्ष में अहम भूमिका निभाई थी। आम तौर पर उनींदा-सा रहने वाला गांव पीरपई इन दिनों यह जानने को बेचैन है कि नेताजी से संबंधित गोपनीय फाइलों का क्या खुलासा होगा, क्योंकि यहां के बुजुर्ग अपने परिवारों के उन लोगों को याद करते हैं, जो फॉरवर्ड ब्लॉक के साथ 1940 के दशक में जुड़े थे। पीरपई पेशावर से एक घंटे की दूरी पर है, जो शेरशाह सूरी, जनरल सर डगलस ग्रेसी और सर जर्ज रूज केपल द्वारा निर्मित ग्रैंड ट्रंक रोड पर स्थित है। उच्च शिक्षा दर और विकास के कारण पीरपई को तब छोटी विलायत कहा जाता था।अमर उजाला की पुरानी पीढ़ी को 1910 में जन्मे पख्तून अभिनेता गुल हामिद की शायद याद हो, जिनका जन्म पीरपई में ही हुआ था। उनकी कब्र भी यहीं है, जिस पर 'सितारा-ए-हिंद' उकेरा हुआ है। उन्होंने सफदरजंग, पेशावर के फनकार और आवारा रक्कासा (सभी मूक) फिल्मों में अभिनय किया था।

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मूल रूप से पीरपई इधर से गुजरने वाले यात्रियों के लिए एक व्यापारिक शहर था। यह गांव कई मोहल्लों में बंटा है। इन्हीं में से एक मोहल्ले में मेरी दादी के भाई रहते थे, जिनका नाम अबद खान था। वह ऑल इंडिया फॉरवर्ड ब्लॉक के पश्चिमोत्तर सीमांत चैप्टर के अध्यक्ष थे। खान अब्दुल गफ्फार खान भी इसी प्रांत में रहते थे। नेताजी जब गांव आए, तब वह भी उनसे मिलने गए थे। बचपन में जब हमें बताया गया था कि नेताजी बंगाली थे, तब हम सोचते थे कि वह जरूर पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) के होंगे, क्योंकि वहां हर कोई बंगाली था।
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मेरे वालिद बाबर मोहल्ले से थे। इस मोहल्ले के मर्द भारतीय सेना में शामिल हुए थे, जिन्होंने अंग्रेजों के साथ प्रथम एवं द्वितीय विश्वयुद्ध लड़ा था। मेरे वालिद ने बर्मा (म्यांमार) की लड़ाई भी लड़ी थी। उन्होंने देहरादून के प्रिंस ऑफ वेल्स कॉलेज से पढ़ाई की थी, जिसके बाद आम तौर पर लोग भारतीय सैन्य अकादमी में शामिल होते थे।
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पीरपई पाकिस्तान के उन कुछेक गांवों में से एक है, जिसके पास प्रथम विश्वयुद्ध में भागीदारी से संबंधित आधिकारिक पट्टिका है। लेकिन इतिहास तो रचा गया अबद खान के मोहल्ले में, जब नेताजी ने उन्हें तुरंत कोलकाता पहुंचने के लिए तलब किया।

नेताजी के करीबी साथियों द्वारा एक योजना तैयार की गई थी, जिसमें अबद खान भी शामिल थे। वह योजना तब बनी थी, जब नेताजी को तत्कालीन सोवियत संघ जाने के लिए अफगानिस्तान पहुंचना था। 15 जनवरी, 1941 को नेताजी कोलकाता से एक कार के जरिये धनबाद के गोमो रेलवे स्टेशन पहुंचे, जिसका नाम अब नेताजी के नाम पर है। वह कार उनके भाई शरतचंद्र बोस के बेटे चला रहे थे। उससे पहले जून, 1940 में कॉमरेड अच्छर सिंह छिना एवं कॉमरेड राम किशन पश्चिमोत्तर प्रांत में भगत राम तलवार से उनके गांव मिलने आए थे। तलवार भी फॉरवर्ड ब्लॉक के सदस्य थे और उन्होंने नेताजी से यह सुनिश्चित करने के लिए आग्रह किया था कि वह अपनी यात्रा में अफगानिस्तान से होकर गुजरें।

दिलचस्प है कि वर्ष 2005 में शिशिर बोस की पत्नी प्रो. कृष्णा बोस पाकिस्तान आई थीं और उन्होंने पेशावर का भी दौरा किया था, क्योंकि वह उन सभी जगहों को देखना चाहती थीं, जहां-जहां नेताजी गए थे। शिशिर बोस नेताजी के बड़े भाई शरतचंद्र बोस के बेटे थे।

अपने बेटे सिराज खान के साथ पीरपई में रह रहे अबद खान के मुताबिक, नेताजी धनबाद में फ्रंटियर मेल ट्रेन पकड़कर पेशावर केन्टोन्मेंट स्टेशन पर उतरे, जो अब एक व्यस्त रेलवे स्टेशन और एक महान इतिहास का साक्षी है। नेताजी अपने साथियों से मिले, जिनमें अबद खान भी थे, और होटल ताजमहल में ठहरे। कृष्णा बोस भी इस होटल को देखने गई थीं। बाद में वह पीरपई में अबद खान के घर में रुकने गए, जहां नेताजी के काबुल जाने की योजना बनी। चूंकि नेताजी पश्तो नहीं बोल सकते थे, इसलिए यह तय किया गया कि वह मूक-बधिर का अभिनय करेंगे और भगत राम तलवार उनके छोटे भाई के रूप में उन्हें अफगानिस्तान में पवित्र धर्मस्थल पर ले जाने का अभिनय करेंगे।

मई, 2005 में एक संसदीय शिष्टमंडल के साथ पाकिस्तान आने के बाद कृष्णा बोस ने इतिहास रच दिया था। वह पेशावर में मेरे चचेरे भाई जनरल नसीरुद्दीन बाबर के घर भी गई थीं, जो जुल्फीकार अली भुट्टो के विश्वस्त रहे हैं। उनका अबद खान के साथ पारिवारिक रिश्ता भी था, जिन्होंने उनके बेटे सिराज खान को भी कृष्णा बोस से मिलने के लिए बुलाया था। कृष्णा ने बताया, वह एक गुप्त मिशन था और कोई भी नेताजी के बारे में नहीं जानता था। उन्होंने याद किया कि दो अफरीदी कबीलाइयों ने 45 रुपये लेकर नेताजी को भागने में मदद की और उन्हें अफगानिस्तान के एक बुजुर्ग हाजी मोहम्मद अमीन के भेष में तैयार किया। जब मैंने उनसे अटक-अटक कर बांग्ला में बात करने की कोशिश की, तो उन्होंने कहा कि सिराज बहुत पहले उनके कोलकाता के घर में आए थे, लेकिन यहां आते वक्त उनका फोन नंबर लाना भूल गई, इसलिए उच्चायोग की मदद से यहां पहुंची हैं।

जब वह आजाद हिंद फौज के पूर्व सदस्य से मिलीं, तो कहा कि वह अपने साथ अपने ससुर की लिखी वह पुस्तक भी लाई है, जिसमें इस बात का जिक्र है कि उनके भाई कैसे अफगानिस्तान पहुंचे थे।


पीरपई के पुस्तकालय में आज मुझे एक किताब मिली-आजादी के परवाने, जो स्वतंत्रता संघर्ष पर केंद्रित है और जिसमें एक अध्याय पख्तून स्वतंत्रता सेनानी अबद खान पर भी है। पीरपई की आने वाली पीढ़ियां जब एक बंगाली के अपने साथियों के साथ धूल भरे गांव पीरपई से भागने की कहानी पढ़ेंगीं, तो उन्हें बार-बार नेताजी सुभाष चंद्र बोस का नाम सुनने को मिलेगा।

-लेखिका पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार हैं

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