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जरा याद करो कुर्बानी
राजीव चंद्रशेखर
Updated Tue, 26 Jul 2016 01:39 PM IST
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राजीव चंद्रशेखर
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सत्तरह साल पहले आज ही के दिन हमारे सशस्त्र बलों ने पाकिस्तान के खिलाफ एक अप्रिय किंतु निर्णायक युद्ध जीता था। कारगिल के दुर्गम इलाके में लड़ते हमारे बहादुर एवं युवा जवानों की टेलीविजन पर दिखाई जाने वाली तस्वीरें कभी नहीं भुलाई जा सकतीं। इसी दिन ऑपरेशन विजय सफलतापूर्वक संपन्न हुआ था, जो पाकिस्तानी सत्ता प्रतिष्ठान के लिए शर्मिंदगी का एक और कारण बना कि वह न तो अतीत से और न ही अपनी विफलता के लंबे रिकॉर्ड से कुछ सीखता प्रतीत होता है।
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कारगिल विजय दिवस के सबके अपने-अपने मायने हैं, लेकिन ज्यादातर भारतीयों के लिए यह दैनिक जीवन में राष्ट्र की निःस्वार्थ और पेशेवर सेवा का उदाहरण है, जिसका प्रतिनिधित्व हमारे सशस्त्र बल और उनके परिवार करते हैं।
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अपनी जान कुर्बान कर देने वाले इन वीर शहीदों को आज जब हम श्रद्धांजलि अर्पित कर रहे हैं, तब हमारे लिए यह सोचने का अवसर है कि वर्दी में राष्ट्र की सेवा करने वाले इन बहादुरों के लिए हमारे पास क्या योजनाएं हैं। खासकर तब, जब जम्मू-कश्मीर में पाकिस्तान एक बार फिर मुश्किलें पैदा करने में लगा है और हमारे सशस्त्र बलों के जवान फिर उनसे निपटने में लगे हैं। ये सैनिक हमारी हर समस्याओं-आतंकवाद, घुसपैठ, प्राकृतिक आपदा और नागरिक अशांति-से जूझते हैं। हाल के दौर में उन्हें हर तरह की परिस्थितियों में नागरिक प्रशासन की सहायता के लिए बुलाया गया, चाहे वह जून, 2013 का ऑपरेशन राहत हो, जो उत्तराखंड भूस्खलन के दौरान दुनिया की किसी भी वायुसेना द्वारा हेलीकॉप्टर के जरिये चलाया गया सबसे बड़ा नागरिक बचाव अभियान था या चेन्नई, जम्मू-कश्मीर या असम की बाढ़ हो, उन्होंने अपनी जिंदगी दांव पर लगाकर लाखों लोगों की जान बचाई। हाल ही में हरियाणा में जाट आंदोलन के दौरान जब नागरिक प्रशासन पूरी तरह से विफल हो गया, तब हमारी सेना ने मोर्चा संभाला था।
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एक तरफ हम उनकी कोशिशों और सहायता के लिए उनकी सराहना करते हैं, वहीं उन्हें धिक्कारने और मानवाधिकार का उल्लंघन करने वाली ताकत बताने में भी देर नहीं लगाते। यह आम बात हो गई है कि जब भी नागरिक प्रशासन के सामने चुनौतीपूर्ण स्थिति आती है, वे सेना की मदद मांगते हैं। जैसा कि जाट आंदोलन के मामले में प्रकाश सिंह कमेटी ने नागरिक प्रशासन के अधिकारियों की भूमिका के बारे में तीखी टिप्पणी की है-'नागरिक प्रशासन की मदद के लिए सेना को बुलाए जाने के मौजूदा प्रावधानों को फिर से परिभाषित किए जाने की जरूरत है। जिला अधिकारियों और राज्य की राजधानियों में बैठे लोगों को अपने कर्तव्यों से मुंह मोड़ना और मदद के लिए सेना को बुलाना ज्यादा आसान लगता है। नागरिक प्रशासन और राज्य पुलिस को आम तौर पर कानून-व्यवस्था से जुड़ी चुनौतियों से निपटने में सक्षम होना चाहिए और सेना को केवल अंतिम उपाय के तौर पर बुलाया जाना चाहिए।'
फिर सशस्त्र बल विशेषाधिकार अधिनियम भी है। सेना को गालियां देना आसान हो सकता है, लेकिन इसे आसानी से भुला दिया जाता है कि यह प्रावधान सशस्त्र बल ने नहीं बनाया है। मणिपुर में फर्जी मुठभेड़ से संबंधित सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले में कहा गया कि सशस्त्र बल ने ठीक से काम नहीं किया। ऐसा नहीं है कि वे इसी तरह काम करते हैं। ऐसी स्थितियों से नागरिक प्रशासन को निपटना चाहिए। निश्चित रूप से नागरिक प्रशासन और पुलिस की जवाबदेही तय करने और इन अशांत क्षेत्रों में आंतरिक सुरक्षा प्रबंधन से सशस्त्र बल को अलग करने की जरूरत है। मीडिया में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कुछ चुनींदा अंशों को ही प्रमुखता से प्रकाशित किया गया, इस तथ्य को नहीं छापा गया कि सुप्रीम कोर्ट ने लंबी अवधि के लिए सेना की तैनाती पर भी सवाल उठाया। न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर और न्यायमूर्ति उदय यू ललित ने कहा कि 'ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए सशस्त्र बल की तैनाती उन्हें अपने ही देशवासियों के साथ टकराव के लिए मजबूर करती है। ऐसी परिस्थितियों से निपटने के लिए सशस्त्र बलों की लंबे समय तक या लगातार तैनाती से लोगों में देश की रक्षा के लिए बलिदान देकर लोगों के दिलों में जगह बनाने वाले सशस्त्र बलों के खिलाफ अलगाव की भावना पैदा होने की आशंका रहती है। इसका सशस्त्र बलों के जवानों के मनोबल और अनुशासन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।'
जल्दबाजी में हम उन जवानों को भूल जाते हैं, जिन्होंने देश की सरहदों की रक्षा के लिए अपना जीवन और अंग बलिदान कर दिया। वे प्रतिकूल परिस्थितियों और उपकरणों की कमी तथा अन्य परेशानियों के बीच अपनी सेवाएं एवं बलिदान देते हैं। सातवें वेतन आयोग ने सशस्त्र बलों के अनुरोध को संवेदनहीन ढंग से निपटाया। इसमें इस पर साफ-साफ कुछ नहीं कहा गया कि तीनों सेना के प्रमुखों द्वारा संयुक्त सेवा ज्ञापन के प्रस्तावों को क्यों खारिज किया गया। हमारे चारों ओर उभरते सुरक्षा खतरों को देखते हुए राष्ट्र को निश्चित तौर पर सशस्त्र बलों पर निवेश करना चाहिए, ताकि उनका मनोबल ऊंचा रहे। हमें सशस्त्र बलों पर भरोसा करना होगा। उन्हें हमारी प्रेरणा और समर्थन की जरूरत है। उन्हें उनका देय जरूर मिलना चाहिए।
हमारे जवानों द्वारा किए गए अद्भुत बलिदानों के लिए न सिर्फ वर्षगांठ मनाने और छावनियों और रेजिमेंटल युद्ध स्मारकों में उनका सम्मान करने की जरूरत है, बल्कि हमारी सामूहिक राष्ट्रीय चेतना में उन्हें याद रखने की जरूरत है। एक राष्ट्रीय स्मृति दिवस न केवल राष्ट्र रक्षा में जान गंवाने वाले जवानों की याद और सम्मान के लिए समर्पित होगा, बल्कि उनका भी सम्मान होगा, जो आज निःस्वार्थ भाव से राष्ट्र की सेवा कर रहे हैं। इसलिए इस कारगिल विजय दिवस पर हम उन परिवारों को याद करें, जिन्होंने अपने किसी प्रिय को सिर्फ इसलिए खोया है, क्योंकि वे राष्ट्र सेवा में यकीन रखते हैं और हमारी रक्षा के लिए प्रतिबद्ध हैं। उनके बारे में सोचें और उन्हें तथा उनके परिवार को वह सम्मान दें, जिसके वे हकदार हैं।
-लेखक राज्यसभा सांसद हैं