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मौलाना का मजहबी कार्ड
Thu, 07 Nov 2019 07:00 PM IST
Raman Singh
मरिआना बाबर, पाकिस्तानी पत्रकार
मरिआना बाबर, पाकिस्तानी पत्रकार
Published by: Raman Singh
Updated Thu, 07 Nov 2019 07:00 PM IST
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मरिआना बाबर, पाकिस्तानी पत्रकार
- फोटो : a
धर्म और राजनीति का मिलाना गलत है, लेकिन इस उपमहाद्वीप में हम धर्म और राजनीति को मिलाते हुए देखते रहते हैं। अगर भारत में हिंदुत्व के लिए आवाज उठ रही है, तो पाकिस्तान में राजनीतिक बहस इस पर है कि सच्चा मुस्लिम कौन है। जमीयत उलेमा-ए-पाकिस्तान के मुखिया मौलाना फजलुर रहमान ने इस सप्ताह अपने समर्थकों को इकट्ठा कर जिस तरीके से इमरान खान की सरकार के खिलाफ भड़काया, लोग उसकी आलोचना कर रहे हैं। पाकिस्तान के लोग तो मौलाना को रोज ही टेलीविजन पर देखते हैं। मौलाना तो रात को इस्लामाबाद के पास अपने शानदार बंगले में सोने के लिए चले जाते हैं, जबकि उनके समर्थक और अनुयायी बारिश में भीगते और ठंड में कांपते रहते हैं।
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पाकिस्तान में इस्लाम कोई मुद्दा नहीं है। संविधान में पाकिस्तान को इस्लामी गणतंत्र और मोहम्मद साहब को आखिरी पैगंबर कहा गया है। पाकिस्तान में कोई गैर मुस्लिम प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति नहीं बन सकता। सेना के नियम में हालांकि गैर मुस्लिम के सेनाध्यक्ष बनने पर कोई पाबंदी नहीं है। लेकिन वरिष्ठ सैन्य कमांडर के पद पर कोई गैर मुस्लिम पहुंचता ही नहीं है। जब पाकिस्तान में इस्लाम कोई मुद्दा नहीं है, तो मौलाना अपने भाषणों में यह क्यों कहते हैं कि वह और उनके समर्थक इस्लाम को बचाने का काम कर रहे हैं? इससे कौन इनकार कर रहा है? हालांकि कभी-कभी ईशनिंदा के मामले सामने आते हैं, लेकिन ईशनिंदा का कानून बेहद सख्त है और उसका उल्लंघन करने पर ही सजा-ए-मौत दी जाती है। मौलाना के पास कहने के लिए नया कुछ नहीं है। इसके बावजूद वह धरने पर हैं और इस्लामाबाद छोड़ने से इनकार कर रहे हैं तथा इमरान खान के इस्तीफे और नए चुनाव की मांग कर रहे हैं। उन्होंने अहमदिया का मामला उठाया और सरकार पर उन्हें बचाने का आरोप लगाया। लेकिन अहमदिया पाकिस्तान के नागरिक हैं और सरकार को उन्हें बचाना ही चाहिए। यह भी तथ्य है कि दशकों पहले जुल्फीकार भुट्टो के दौर में अहमदिया को गैर मुस्लिम करार दिया गया था।
मौलाना हमेशा और बार-बार मजहबी कार्ड का इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने ईसाई महिला आसिया बीबी का, जो विदेश में निर्वासित जीवन बिता रही हैं, मुद्दा उठाकर बेवकूफी ही की। मौलाना को मालूम होना चाहिए कि इमरान खान ने नहीं, बल्कि सुप्रीम कोर्ट ने आसिया बीबी को बेकसूर बताया था। लेकिन मौलाना रोज अपने समर्थकों को यह समझाने की कोशिश करते हैं कि आसिया बीबी कसूरवार थीं और इमरान खान ने उनके विदेश भागने में मदद की। इमरान खान की पहली बीबी का जिक्र किए बगैर मौलाना इस सरकार पर यहूदी साजिश रचने का जो इल्जाम लगाते हैं, लोग उससे थक चुके हैं। मुसलमानों की भावनाएं भड़काने के लिए मौलाना यह तक कहते फिर रहे हैं कि यह सरकार इस्राइल को मान्यता देगी। मौलाना को यह एहसास नहीं है कि अनेक मुस्लिम देश इस्राइल को मान्यता दे चुके हैं।
मौलाना की कट्टरता की राजनीति से लोग तंग आ गए हैं। बल्कि जब उन्होंने यह बताने की कोशिश की कि अच्छा मुसलमान कैसा होता है, तो धार्मिक मामलों के मंत्री पीर नुरुल हक कादरी ने उन्हें फटकार लगाते हुए उनसे थोड़ा विवेकवान होने की गुजारिश की। उन्होंने मौलाना को संबोधित करते हुए कहा, 'आपकी तरह मैंने भी धार्मिक ज्ञान हासिल किया है। आप यह कैसे कह सकते हो कि आपका मजहब और विश्वास हमारी तुलना में ज्यादा ठोस और ज्यादा ताकतवर है?' राजनीति को धर्म से मिलाकर और लोगों को गुमराह कर मौलाना यह समझ नहीं पा रहे कि ऐसे में लोकतंत्र कमजोर होता है, क्योंकि गैर लोकतांत्रिक ताकतें मजबूत हो जाती हैं। मुल्क के मौजूदा हालात पर एक राजनीतिक विश्लेषक की टिप्पणी गौरतलब है, 'ऐसे हालत के कारण गैरनिर्वाचित संस्थाएं मजबूत हो रही हैं। लोकतंत्र की जगह लगातार सिकुड़ती जा रही है, और पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (पीटीआई) की बदले की राजनीति लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया को बरकरार रखने के लिए चल रहे संघर्ष को मजबूत करना और तानाशाही की बढ़ती कोशिशों को रोकना समय की मांग है। लेकिन इसके लिए गैरलोकतांत्रिक तरीका अपनाना और सियासत को मजहब से जोड़ना तो कहीं ज्यादा नुकसानदेह है।'
इस्लामाबाद में पिछले कई दिनों से मौलाना और उनके समर्थकों का धरना चल रहा है। लेकिन लोगों और मीडिया ने इस पर रुचि दिखाना बंद कर दिया है। तेज हवा और बारिश ने मौलाना के समर्थकों को भिगो दिया, जिसने प्रधानमंत्री इमरान खान को भी प्रदर्शनकारियों के प्रति सहानुभूति से भर दिया। इमरान खान ने जब राजधानी विकास प्राधिकरण (सीडीए) के प्रमुख को तुरंत धरना स्थल का दौरा करने और जरूरी राहत कार्य करने का निर्देश दिया, तो उसकी लोगों में बहुत अच्छी प्रतिक्रिया हुई।
राजनीतिक रूप से मौलाना गलत विकेट पर खेल रहे हैं। लोगों द्वारा नकार दिए जाने, अपनी सीट पर चुनाव हारने तथा उनके सदस्यों द्वारा कुछ ही सीट जीतने के कारण मौलाना बखूबी जानते हैं कि संसदीय व्यवस्था में एक चुनी हुई सरकार को धरना-प्रदर्शन के जरिये नही हटाया जा सकता। संसद में अविश्वास प्रस्ताव लाया गया है, लेकिन उसके पारित होने के लिए दो तिहाई बहुमत की जरूरत है। दिलचस्प बात यह है कि देश की राजधानी में मौलाना का सर्कस चलते रहने के बावजूद कोई भी राजनीतिक पार्टी उनके साथ खड़ा नहीं है। धरना देने वालों में मौलाना की पार्टी के सदस्य और मदरसे के छात्र हैं। दो मुख्य राजनीतिक पार्टी पीपीपी और पीएमएल (नवाज) के नेता थोड़ी देर के लिए धरना स्थल पर आए और उन्होंने सरकार की नीतियों की आलोचना भी की, लेकिन किसी ने धरने में मौलाना का साथ नहीं दिया।
दोनों विपक्षी पार्टियों के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि मौलाना जो मजहबी कार्ड खेल रहे हैं, हमें उसका हिस्सा नहीं होना। हालांकि लेखक और विश्लेषक जाहिद हुसैन कहते हैं, 'विपक्ष के प्रदर्शन ने कई कमजोरियों को जाहिर किया है। इमरान खान का अहंकार, उनके तानाशाही तौर-तरीके और उनकी सरकार की विफलता के कारण ही विपक्ष सड़क पर है। संसद बेअसर है, जिस कारण विपक्ष को गैर लोकतांत्रिक तौर-तरीका अपनाना पड़ रहा है, तो इसके लिए पीटीआई सरकार ही जिम्मेदार है।'