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अमेरिका के साथ रिश्ते का पेच, ट्रंप की भारत को फिर धमकी

Wed, 17 Jul 2019 07:21 AM IST
Raman Singh के एस तोमर
के एस तोमर Published by: Raman Singh Updated Wed, 17 Jul 2019 07:21 AM IST
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Relationship with America
Modi, Trump - फोटो : a

मोदी सरकार को विदेश नीति के मोर्चे पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है और इस बीच, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बीते मंगलवार को फिर से धमकी देते हुए कहा कि 'भारत लंबे समय से एक क्षेत्र पर टैरिफ बढ़ा रहा है, जो अब स्वीकार्य नहीं है।' यह धमकी इस बात का संकेत है कि अमेरिका नई दिल्ली में भारत और अमेरिका के बीच होने वाली आधिकारिक स्तर की बातचीत से पहले भारत पर दबाव बनाना चाह रहा है।


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मोदी सरकार को विदेश नीति के मोर्चे पर कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है और इस बीच, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बीते मंगलवार को फिर से धमकी देते हुए कहा कि 'भारत लंबे समय से एक क्षेत्र पर टैरिफ बढ़ा रहा है, जो अब स्वीकार्य नहीं है।' यह धमकी इस बात का संकेत है कि अमेरिका नई दिल्ली में भारत और अमेरिका के बीच होने वाली आधिकारिक स्तर की बातचीत से पहले भारत पर दबाव बनाना चाह रहा है।

भारत और अमेरिका, दोनों एक दूसरे का रणनीतिक साझेदार होने का दावा करते हैं, लेकिन पिछले दो दशकों से दोनों देशों के विवाद कई गुना बढ़ गए हैं, जिसमें रूस से 40 हजार करोड़ रुपये का एस-400 मिसाइल प्रणाली खरीदने और ईरान से तेल खरीदने का मामला शामिल है। इसका सीधा असर हमारी संप्रभुता पर पड़ा है।

भारत को अपने पड़ोस में भी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, क्योंकि पाकिस्तान के साथ तनाव अपने चरम पर है और नेपाल का झुकाव चीन की तरफ होता जा रहा है, जिसने 70 देशों में अपने वन बेल्ट वन रोड के माध्यम से 40 खरब डॉलर की पहल शुरू की है, जिससे भारत अनिश्चित स्थिति में है। भारत के परखे हुए मित्र रूस का चीन की तरफ बढ़ता झुकाव भारत के लिए अच्छा नहीं है, ऐसा मुख्यतः अमेरिका के प्रति हमारे बढ़ते झुकाव के कारण है।

अमेरिका से व्यापारिक रिश्ते - मोदी नीत राजग सरकार के पहले कार्यकाल के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के बीच अच्छी समझदारी थी, लेकिन अब हालात बिल्कुल बदल गए हैं, क्योंकि अमेरिका के हितों के नुकसान को ट्रंप बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं करेंगे। यह सर्वविदित तथ्य है कि अमेरिका कश्मीर में आतंकवादियों द्वारा की जाने वाली हत्याओं आदि की अनदेखी करता था और भारत के दर्द को उसने तब तक नहीं समझा, जब तक कि उसके अपने देश में 9/11 का आतंकी हमला नहीं हुआ।

उस आतंकी हमले ने आतंकवाद के प्रति अमेरिका की अवधारणा बदल दी। इसी तरह मनमोहन सिंह के शासनकाल में अमेरिका के साथ परमाणु समझौता उसके साथ मधुर संबंधों की परिणति था, जो बाद में और मजबूत हुआ, जब प्रधानमंत्री मोदी और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के बीच रिश्ते अपने चरम पर थे। जब ट्रंप राष्ट्रपति बने, तो प्रधानमंत्री मोदी ने उनके साथ भी अच्छे रिश्ते बनाने की पहल की, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति का अप्रत्याशित व्यवहार भारत सरकार के लिए चिंता का कारण बन गया है।

अमेरिका ने भारत से सामान्यीकृत वरीयता प्रणाली (जीएसपी) को वापस ले लिया, जिससे भारतीय निर्यातकों को शुल्क में छह अरब डॉलर का लाभ मिलता था। ऐसा उसने यह कहकर किया कि मोदी सरकार अपने बाजारों में अमेरिकी कंपनियों को न्यायसंगत और उचित पहुंच प्रदान करने में विफल रही है। इसकी प्रतिक्रिया में भारत ने बादाम और सेब सहित 28 अमेरिकी उत्पादों पर प्रतिशोधात्मक शुल्क लगा दिया।

विश्व व्यापार संगठन में भारत के पूर्व राजदूत जयंत दासगुप्ता ने कहा कि यह व्यापार वार्ता शुरू होने से पहले भारत से कुछ और लाभ लेने की प्रत्याशा में ट्रंप की एक चाल हो सकती है। उन्होंने आगे कहा कि 'ट्रंप ने पिछले महीने भी प्रधानमंत्री मोदी के साथ बातचीत करने से पहले इसी तरह का ट्वीट किया था। यह अब उसी पैटर्न का अनुसरण है।'

रूस और पड़ोसी देशों के साथ संबंधों की रक्षा करना नए विदेश मंत्री एस. जयशंकर के लिए परीक्षा की घड़ी होगी। रूस से हथियार खरीदने पर ट्रंप की आपत्ति और ईरान से तेल खरीदने पर प्रतिबंध लगाने की धमकी अमेरिकी प्रशासन की मानसिकता को दर्शाता है, जो इस तरह के मुद्दों के बारे में स्वतंत्र निर्णय लेने की हमारी संप्रभुता पर सीधा हमला कर रहा है।

हमारे विदेश मंत्री को अमेरिका के साथ सावधानीपूर्वक निपटना होगा, क्योंकि भारतीय निर्यातकों को मिलने वाले लाभ को वापस लेना भी अतार्किक और अनुचित है। भारत ने रूस से हथियारों की खरीद पर अमेरिकी आपत्ति का विरोध किया है, लेकिन अमेरिका तेल निर्यात पर ईरान के प्रति नरम नहीं होगा, जिसका भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों पर असर पड़ेगा।

पाकिस्तान लगातार परेशानी का सबब -हालांकि भारत विभिन्न अंतरराष्ट्रीय मंचों पर पाकिस्तान को अलग-थलग करने में सफल रहा है। यहां तक कि नरेंद्र मोदी के दूसरे शपथ ग्रहण समारोह में बिम्सटेक देशों के नेताओं को आमंत्रित किया गया, लेकिन पाकिस्तान को आमंत्रित न करके उसे बड़ा झटका दिया गया।

पाकिस्तान द्वारा लगातार किए जाने वाले संघर्षविराम उल्लंघन ने ऐसा माहौल नहीं बनने दिया कि उस दुष्ट देश के साथ भारत की बातचीत शुरू हो सके। आंकड़े बताते हैं कि इस वर्ष संघर्षविराम के उल्लंघन की घटना खतरनाक स्तर तक पहुंच गई है। इस वर्ष जनवरी में 203, फरवरी में 215, मार्च में 267, अप्रैल में 234, मई में 234 और जून में 181 संघर्षविराम उल्लंघन की घटनाएं हुईं।

विदेशी संबंध के मोर्चे पर एक और चिंताजनक खबर नेपाल से संबंधित है, जिसने चीन के प्रति पूरा झुकाव दिखाया है, और इससे भारत सरकार के लिए चिंता और परेशानी पैदा हो गई है। नेपाल नमक, पेट्रोलियम पदार्थों सहित सैकड़ों उत्पादों के लिए भारत पर व्यापक रूप से निर्भर है, लेकिन वह चीन के प्रति वफादारी दिखा रहा है, जो कि प्रधानमंत्री और विदेश मंत्रालय के लिए एक बड़ी चुनौती है।

इस पृष्ठभूमि में भारत को अमेरिका, रूस, चीन और एशियाई देशों के साथ अपने विदेशी संबंध को सावधानीपूर्वक आगे बढ़ाना होगा, क्योंकि यहां समता की नीति काम नहीं कर सकती है। भारत और अमेरिका के रणनीतिक हितों के कारण भारत को अमेरिका के साथ जोड़कर देखा जाता है, जो चीन या रूस को स्वीकार्य नहीं हो सकता है, क्योंकि दोनों उभरते हुए महाशक्ति राष्ट्र हैं और दुनिया के सभी देशों में विदेश नीति को फिर से परिभाषित करने के लिए तैयार हैं।   
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