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भारत-नेपाल में भरोसे का रिश्ता, कौन बिगाड़ रहा भाईचारा?

Thu, 10 Dec 2020 07:56 AM IST
प्रशांत दीक्षित प्रशांत दीक्षित
प्रशांत दीक्षित Published by: प्रशांत दीक्षित Updated Thu, 10 Dec 2020 07:56 AM IST
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Relations of trust between India and Nepal for decades
भारत-नेपाल - फोटो : iStock

नेपाल एक स्वतंत्र राष्ट्र रहा है और यह भारत का एक विस्तृत परिवार है। किसी भी तरह का संदेह इसे नहीं बदल सकता। यह प्राचीन काल से ही ऐसा है। करीब 70 लाख नेपाली नागरिक भारत में रहते हैं और करीब छह लाख भारतीय नागरिक नेपाल में निवास करते हैं। वे न जाने कब से एक दूसरे के देश में आते-जाते और काम करते रहे हैं। यह सभ्यतागत रिश्ता है और इस रिश्ते को कुछ सौ वर्षों के अंतराल में रखना संकीर्णता होगी। अंग्रेजों ने नेपाल को एक सीमावर्ती और बफर स्टेट के रूप में इस्तेमाल किया, लेकिन स्वतंत्रता के बाद भारत और नेपाल ने उन सब चीजों को बदल दिया, जब इन दोनों ने 1950 के दशक में शांति और दोस्ती का समझौता किया, जो दोनों देशों के नागरिकों को एक दूसरे की भौगोलिक सीमाओं से परे मुक्त आवाजाही की सुविधा प्रदान करने के साथ-साथ कई अन्य पारस्परिक लाभ देता है। और कुछ क्षेत्रों में बेहद नकारात्मक धारणा के विपरीत यह संधि न तो भारत द्वारा कोई दान कार्य था और न ही इस समझौते को स्वीकार करने वाला नेपाल कोई अधीनस्थ देश था। 


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हालांकि सबसे चिंताजनक बात है कि नेपाल में कुछ ऐसे लोग हैं, जो इसे अपनी संप्रभुता पर अतिक्रमण और भारतीय प्रभाव का अवांछित विस्तार बताते हैं। दोनों देशों के बीच अभी तनाव का मुख्य कारण भारत-चीन सीमा पर लिपुलेख दर्रे के पास की जमीन है, जो कि सीमा व्यापार के लिए एक स्वीकृत बिंदु है और तिब्बत स्थित कैलास-मानसरोवर यात्रा का मार्ग है। सौभाग्य से तब से इस तीखी बहस पर दोनों सरकारों ने ध्यान दिया है। इसी के फलस्वरूप भारत के विदेश सचिव हर्षवर्धन सिंह शृंगला 26 नवंबर को दो दिवसीय यात्रा पर काठमांडू गए थे, ताकि नेपाल की चिंताओं को दूर करने के लिए भावी कदम उठाए जा सकें, जिनमें से एक भारत के विदेशी खुफिया विभाग के प्रमुख की यात्रा भी थी। हालांकि यह यात्रा नेपाल के खुफिया प्रतिष्ठान की मंजूरी से हुई थी। फिर भी नेपाल की सत्तारूढ़ पार्टी के सदस्यों ने इस पर सवाल उठाए, जिनका नेतृत्व पूर्व प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ कर रहे थे। 

लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि यह प्रधानमंत्री ओली को चीनी दूत को हिदायत देने से नहीं रोक सका कि वह नेपाल के घरेलू मामले में हस्तक्षेप न करें। यह नेपाल की सत्तारूढ़ पार्टी की अंतर्कलह हो सकती है, लेकिन ध्यान देने योग्य बात है कि प्रचंड ने माओवादी विद्रोह का नेतृत्व किया था, जिसने नेपाल में राजशाही खत्म की और वह लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना की ओर अग्रसर हुआ। नेपाली विद्रोह के दौरान नेपाली माओवादी और भारतीय नक्सलियों के बीच एक मजबूत साठगांठ उभरी थी, जो भारत की आतंरिक सुरक्षा के लिए एक गंभीर खतरा बन गई थी, खासकर पांच राज्यों-उत्तर प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, पश्चिम बंगाल और सिक्किम के साथ लगी 1,751 किलीमीटर की सीमा के साथ। नेपाली माओवादियों और भारतीय नक्सलियों के बीच लोगों और सामग्रियों का नियमित आदान-प्रदान देखा गया था और प्रचंड पर भारतीय खुफिया एजेंसियों की बहुत करीबी नजर थी, जिसे दोनों देशों के सुरक्षा तंत्र का समर्थन प्राप्त था।

जाहिर है, वह उन चीजों को आज भी ढो रहे हैं। विद्रोह की परिणति के बाद और प्रधानमंत्री के रूप में सत्ता में आने के बाद वह नेपाल के सेना प्रमुख को लगभग 20,000 पूर्व माओवादियों को नेपाली सेना में शामिल करने के लिए मनाने में असमर्थ रहे। इससे भी बुरी बात यह कि वह अपनी बात न मानने वाले सेना प्रमुख को हटा भी नहीं सकते थे। तब उन्हें प्रधानमंत्री पद छोड़ना पड़ा था। जाहिर है, जल्दबाजी में कदम उठाने से कुछ हद तक अनुभवहीन सत्ता प्रतिष्ठान में समझ पैदा होने से भारत और नेपाल के बीच के गहरे संस्थागत संबंध बच गए। एक बार फिर इस रिश्ते के लिए परीक्षा की घड़ी आई, जब नेपाल के रक्षा मंत्री ने भारत के सेना प्रमुख जनरल नरवणे की नेपाल यात्रा पर आपत्ति जताई, जिसे पद से हटाकर खुद प्रधानमंत्री ओली ने रक्षा मंत्रालय का पदभार संभाला। जनरल नरवणे को बेहतर ढंग से स्थापित परंपरा के अनुसार नेपाली सेना के मानद जनरल का रैंक प्रदान किया गया। पिछले साल इसी तरह की परंपरा के तहत नेपाली सेना प्रमुख जनरल पूर्णचंद्र थापा को राष्ट्रपति रामनाथ कोविद द्वारा मानद जनरल बनाया गया था। 

ऐसा अनुमान है कि भारतीय सेना और अर्धसैनिक संगठनों में गोरखा ब्रिगेड की सात गोरखा रेजिमेंटों की 39 बटालियन में लगभग 50 हजार नेपाली नागरिक सेवा करते हैं। इनमें से छह रेजिमेंटों को तत्कालीन ब्रिटिश सेना से स्थानांतरित किया गया था, जबकि एक रेजिमेंट स्वतंत्रता के बाद बनाई गई थी। यह संबंध वर्ष 1815 से शुरू हुआ, जब नेपाल के गोरखाओं ने भारत में ब्रिटिश सैनिकों का हिस्सा बनना शुरू किया था। सैन्य इतिहास के दस्तावेजों में इन रेजिमेंटों की अनुकरणीय सैन्य उपलब्धियां दर्ज हैं। द्वितीय विश्व युद्ध में भारतीय सेना को मिले 26 विक्टोरिया क्रॉस में से 10 गोरखाओं ने प्राप्त किए। स्वतंत्र भारत में वीरता के लिए सर्वोच्च पुरस्कार, परमवीर चक्र तीन गोरखाओं को प्रदान किए गए और सभी सात गोरखा रेजिमेंटों को 1971 के युद्ध के लिए युद्ध सम्मान मिला। 

लगभग 30 गोरखा कैडेट हर साल सैन्य अकादमियों के अधिकारियों के रूप में स्नातक होते हैं। उन्हें भारत के राष्ट्रीय रक्षा अकादमी, रक्षा सेवा स्टाफ कॉलेज और कॉम्बैट कॉलेज में प्रशिक्षित किया जाता है। भारत और नेपाल के बीच परियोजनाओं की देखरेख के लिए कई तंत्र कार्य कर रहे हैं और हमें विभिन्न तरह के असंतोष और निराशा का सामना करना पड़ सकता है, जो हमारे अविश्वास को बढ़ा सकता है। इन कठिन परिस्थितियों के दौरान केवल संवेदनशील धारणा और एक दूसरे की मुश्किलों को समझने से मदद मिल सकती है। और अगर इस संधि की समीक्षा करने की मांग है, तो हमें इसे शिष्टतापूर्वक करना चाहिए, जैसा कि अतीत में किया गया। 

( लेखक रणनीतिक मामलों के जानकार हैं।) 

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