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चीन की बराबरी के लिए सुधार जरूरी

Sun, 22 Jan 2017 06:15 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 22 Jan 2017 06:15 PM IST
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Reforms is must for china equipollence
तवलीन सिंह

शुरू में स्पष्ट कर देना चाहती हूं कि न मैं चीन को भारत से ज्यादा महान देश समझती हूं और न ही मैं शी जिनपिंग की फैन हूं। मेरी राय में भारत का लोकतंत्र चीन की आर्थिक उपलब्धियों से कहीं ज्यादा महत्व रखता है। पर पिछले हफ्ते दावोस में एकत्रित विश्व के धनवान उद्योगपतियों ने जिस शान से चीन के राष्ट्रपति का स्वागत किया, उसे देखकर मैं दंग रह गई।

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एक भारतीय होने के नाते मुझे यह देखकर तकलीफ तो हुई कि हमारे पुराने दुश्मन देश के राजनेता का इस अंदाज में स्वागत हुआ, लेकिन चीन के राष्ट्रपति का भाषण सुनकर यह भी स्वीकार करना पड़ा कि उन्होंने ऐसे मुद्दे उठाए, जो सारी दुनिया को प्रभावित करने वाले थे। उन्होंने इस अंदाज में वैश्वीकरण के गुण गाए, जिससे स्पष्ट हुआ कि उनके निशाने पर अमरीका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप थे। डोनाल्ड ट्रंप ने कई बार चीन पर यह आरोप लगाया है कि व्यापार के मामलों में हेराफेरी करके वह अमेरिका से नौकरियां खींचकर ले गया है। फिर शी जिनपिंग ने चीन की आर्थिक उपलब्धियां गिनाते हुए यह साबित करने की कोशिश की कि चीन वैश्विक अर्थव्यवस्था की रीढ़ की हड्डी है और इसका लाभ सारी दुनिया को मिल रहा है। यहां यह भी बताना चाहती हूं कि शी ने अपना भाषण अपनी भाषा में गर्व से दिया।
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शी ने अपने देश की उपलब्धियां गिनाते हुए कुछ झूठ भी बोले, लेकिन उन्होंने शब्दों से ऐसा जादू किया कि श्रोता कुछ क्षणों के लिए भूल गए कि चीन की अर्थव्यवस्था पर फिलहाल मंदी के आसार दिख रहे हैं। यह भी भूल गए कि चीन की विदेश नीति आक्रामक और खतरनाक है और वह पाकिस्तान और उत्तर कोरिया जैसे देशों को अपना खास दोस्त मानता है। यह सब इसलिए हो रहा है, क्योंकि चीन का आर्थिक महत्व इतना है कि उसकी हर बुराई को विश्व के ज्यादातर देश बर्दाश्त करने को तयार हैं।
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ये सब बातें मैं इसलिए साझा कर रही हूं, क्योंकि मुझे विश्वास है कि अगले कुछ महीनों में अगर मोदी उन आर्थिक और प्रशासनिक सुधारों को लाकर दिखा दें और भारत की गाड़ी तेजी से आगे बढ़ने लगे, तो फिर विश्व में नरेंद्र मोदी की भी वह जगह बन जाएगी, जो आज चीन के राष्ट्रपति की है। नोटबंदी के बाद और भी जरूरी है कि अर्थव्यवस्था का जो हिस्सा तबाह हो गया है, वहां रोजगार पैदा करने के लिए सड़कों, बंदरगाहों और रेल सेवाओं में निवेश शुरू हो जाए, जिनके बिना विदेशी निवेशक भारत में निवेश करने से कतराते हैं। इससे रोजगार के वे तमाम अवसर वापिस आ जाएंगे, जो नोटबंदी के कारण गायब हो गए हैं। आम आदमी अब तक इस उम्मीद में नोटबंदी का समर्थन कर रहा है कि अब उनके जीवन में संपन्नता आ जाएगी।


यदि प्रधानमंत्री मोदी गंभीरता से प्रशासनिक सुधार करते हैं, तो लाल फीताशाही कम हो जाएगी और इसका लाभ विदेशी निवेशकों को ही नहीं, देश के आम लोगों को भी मिलेगा। कौन-सा भारतवासी है, जो निजी अनुभव से नहीं जानता कि सरकारी विभागों से अपना काम करवाना कितना कठिन है? सो प्रधानमंत्री को विदेशी निवेशकों के लिए न सही, देश के आम लोगों के लिए सुधार लाकर दिखाना होगा। यहां यह याद दिलाना जरूरी है कि विदेशी निवेशकों के बिना चीन आज इस मुकाम पर नहीं पहुंचा होता। भारत की तरह चीन के पास भी विकास के लिए पैसा नहीं था। इतने दिनों से मेक इन इंडिया की बातें हो रही है, लेकिन आज तक कोई बड़ा निवेशक नहीं आया है, तो मोदी जी को पूछना चाहिए कि क्यों।

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