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प्रशासन: वक्त है कि पुलिस खुद को फिर से गढ़े... समय के अनुरूप और प्रभावी बनाना जरूरी
Mon, 21 Jul 2025 08:03 AM IST
ज्योति भास्कर
ओपी सिंह, पुलिस महानिदेशक
ओपी सिंह, पुलिस महानिदेशक
Published by: ज्योति भास्कर
Updated Mon, 21 Jul 2025 08:03 AM IST
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पुलिस में सुधार समय की मांग (प्रतीकात्मक)
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विस्तार
भारतीय पुलिस को लेकर आम जनमानस में मिश्रित धारणा है। जब कोई संकट आता है—दंगा हो, सड़क दुर्घटना, चोरी या प्राकृतिक आपदा हो, तो सबसे पहले जो संस्था पहुंचती है, वह पुलिस होती है। तमाम सीमाओं और दबावों के बीच पुलिस ने इस देश में व्यवस्था को संभाले रखा है। न उसकी ड्यूटी का समय तय है, न कार्य का स्वरूप...फिर भी वह हर परिस्थिति में तैयार खड़ी रहती है। सप्ताह के सातों दिन...साल के 365 दिन। भारतीय पुलिस को यह क्षमता किसी चमत्कार से नहीं मिली, बल्कि एक अनुशासित संस्कृति, परिणामोन्मुख सोच और स्थितियों से जूझने के अभ्यास ने यह बनाया है।
सवाल यह है कि क्या यही पर्याप्त है? क्या पुलिस केवल संकट से निपटने के लिए बनी है? क्या उसे केवल घटना के बाद कार्रवाई करने वाली व्यवस्था बने रहना चाहिए? इसका उत्तर अब ‘नहीं’ में है, क्योंकि देश बदल रहा है, अपराध बदल रहे हैं, नागरिकों की अपेक्षाएं और अधिकार-चेतना भी कहीं अधिक स्पष्ट और मुखर हो गई है। अब सिर्फ व्यवस्था बनाए रखना काफी नहीं है। अब पुलिस को नागरिकों के भीतर विश्वास जगाना होगा। यह विश्वास तभी बनेगा, जब पुलिस अपनी भूमिका को केवल बल प्रयोग करने वाली संस्था के बजाय समाज के साथ संवाद और सहयोग करने वाली संस्था के रूप में पुनर्परिभाषित करेगी।
आज भी अधिकतर नागरिक पुलिस से बचना पसंद करते हैं। यह दूरी किसी कानून की वजह से नहीं, बल्कि अनुभव और पूर्वाग्रह की वजह से है। अगर लोगों को लगे कि पुलिस उनकी बात सुनती है, मदद करती है और बिना भय के उनसे संवाद किया जा सकता है, तो यह रिश्ता बदलेगा। इसके लिए थानों से बदलाव की शुरुआत करनी होगी। थाने सिर्फ एफआईआर लिखने या गिरफ्तारी करने के स्थान नहीं होने चाहिए। उन्हें मोहल्ले का समस्या समाधान केंद्र बनना होगा। एक ऐसा स्थान, जहां कोई भी नागरिक बेहिचक जाकर मदद मांग सके।
पुलिस में एक और बुनियादी बदलाव जरूरी है, अपराध और अपराधियों को समझने के नजरिये में। हर अपराधी एक जैसा नहीं होता। बहुत से लोग परिस्थितियों से मजबूर होकर अपराध की ओर धकेले जाते हैं। कोई गरीबी में, कोई अशिक्षा में, तो कोई गलत संगति में। ऐसे मामलों में सुधार और पुनर्वास की नीति अपनाई जानी चाहिए, न कि जेल की। जो अपराधी सचमुच समाज के लिए खतरा हैं, उनके साथ कठोरता उचित है, लेकिन बाकी के लिए सुधार की संभावना को प्राथमिकता मिलनी चाहिए।
यह भी समझना होगा कि आज का अपराधी पुरानी सोच वाला नहीं है। वह तकनीक से लैस है, कानून की सीमाओं को जानता है और डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल करता है। आज साइबर क्राइम, वित्तीय धोखाधड़ी, सोशल मीडिया के जरिये उकसावों जैसी घटनाएं आम होती जा रही हैं। इनसे निपटने के लिए पुलिस को भी भविष्य की सोच और तकनीकी दक्षता से लैस होना होगा। हर जिले में अपराध विश्लेषण, डाटा आधारित फैसले और सोशल मीडिया मॉनिटरिंग जैसी व्यवस्थाएं अनिवार्य की जानी चाहिए।
एक और अहम पक्ष है संवाद का। अक्सर पुलिस अपने काम की जानकारी जनता तक पहुंचाने में पीछे रह जाती है। जहां अफवाहें तेजी से फैलती हैं, वहां चुप्पी नुकसान करती है। पुलिस को अब अपने पक्ष को स्पष्ट, संवेदनशील और समय पर जनता तक पहुंचाना आना चाहिए। इसके लिए हर जिले में प्रशिक्षित जनसंपर्क अधिकारी होने चाहिए, जो न केवल मीडिया से संवाद करें, बल्कि सोशल मीडिया और जन मंचों पर भी पुलिस की बात रख सकें।
सबसे जरूरी यह समझना है कि पुलिस सुधार की मांग इसलिए नहीं हो रही है कि पुलिस अपने कार्य में िवफल हो रही है, बल्कि यह इसलिए है कि पुलिस अब भी सफलतापूर्वक काम कर रही है, लेकिन उसे बदलते समय के साथ और भी प्रभावी बनाया जा सकता है। सुधार की प्रक्रिया संकट से नहीं, साहसिक सोच और दूरदृष्टि से शुरू होती है। जब कोई संस्था अब भी खड़ी हो, पर दबाव महसूस करने लगे, तभी सही समय होता है आत्ममंथन और नव निर्माण का।
आज जब देश एक नई सामाजिक और तकनीकी दिशा में आगे बढ़ रहा है, तो पुलिस को भी एक नई सोच और रणनीति के साथ चलना होगा। अगर पुलिस को नागरिकों की पहली प्रतिक्रिया बने रहना है, तो उसे नागरिकों का पहला भरोसा भी बनना होगा। और यह विश्वास ही उस पुल की नींव बनेगा, जो राज्य और समाज के बीच मजबूती से खड़ा रह सकेगा।
(लेखक पुलिस महानिदेशक एवं हरियाणा नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के प्रमुख हैं)