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सुलह और सहमतियों की ओर: गलतफहमियों को दरकिनार करके ही भारत-चीन सहयोग को आगे बढ़ाया जा सकता है

चिंतामणि महापात्र Updated Sun, 13 Oct 2019 01:28 AM IST
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और साथ में शी जिनपिंग
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और साथ में शी जिनपिंग - फोटो : Twitter
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संभवतः हर कोई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच चीन के वुहान में हुई पहली अनौपचापिक शिखर बैठक के नतीजे से वाकिफ है। दोनों नेताओं की उस मुलाकात से दोकलम में चीनी और भारतीय सेना के बीच करीब सत्तर दिनों से चले आ रहे ऐतिहासिक सैन्य टकराव का सौहार्दपूर्ण तरीके से समाधान निकालने में और 1962 के बाद भारत-चीन के बीच दूसरा युद्ध छिड़ने की आशंकाओं को लेकर जारी अनिश्चितता को खत्म करने में मदद मिली थी।
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एशिया के दो ताकतवर नेताओं की दूसरी अनौपचारिक शिखर बैठक इस बार भारत की मेजबानी में जम्मू-कश्मीर में हुए अप्रत्याशित घटनाक्रम की पृष्ठभूमि में हुई है। इस बात में जरा भी संदेह नहीं है कि कश्मीर मसले पर चीन की नजर है। बीजिंग ने जम्मू-कश्मीर में संविधान के अनुच्छेद 370 को निष्प्रभावी किए जाने और इस राज्य को दो भागों में विभाजित किए जाने के भारत के फैसले पर सार्वजनिक तौर पर असंतोष और असहमति जताई थी।

चीन की चिंता और उसकी बेचैनी की वजह निम्न कारणों से थी : पहला, चीन का सदाबहार दोस्त पाकिस्तान पूरी तरह से असहाय महूसस कर रहा था कि वह कैसे इस भारतीय नीति का सामना करे और बीजिंग संयुक्त राष्ट्र या अन्य तमाम अंतरराष्ट्रीय तथा बहुस्तरीय राजनयिक मंचों पर अपने सहयोगी पाकिस्तान को मदद करने में बुरी तरह नाकाम साबित हुआ। दूसरा, चीन ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (सीपीईसी) परियोजना में अच्छा खासा निवेश कर रखा है, चूंकि इस गलियारे को पाक अधिकृत कश्मीर (पीओके) से होकर गुजरना है, लिहाजा भारत के जम्मू-कश्मीर में उठाए गए ताजा कदम से इस परियोजना को लेकर कुछ अनिश्चितता पैदा हो गई है। अंत में, कश्मीर के मोर्चे पर भारत के मजबूत कदम ने लद्दाख क्षेत्र में भारत-चीन सीमा के गैरसीमांकित हिस्से को लेकर चीन को बेचैन कर दिया है।
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