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अफ्रीकी देशों की अगवानी

Sun, 25 Oct 2015 06:34 PM IST
सुरेंद्र कुमार
सुरेंद्र कुमार Updated Sun, 25 Oct 2015 06:34 PM IST
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receiving of African leaders

तो अब प्रधानमंत्री मोदी अफ्रीका पर ध्यान केंद्रित करना चाहते हैं, जिसके साथ महात्मा गांधी और वहां भारतवंशियों की मौजूदगी के अलावा भी हम बहुत कुछ साझा करते हैं। तीसरे भारत-अफ्रीका शिखर सम्मेलन की तैयारियां जोरों पर है, बिल्कुल मोदी की खास शैली में। अफ्रीकी देशों की मेजबानी को तैयार भारत की नजर व्यापार, कारोबार और निवेश पर गंभीर बातचीत के साथ ही उन वैश्विक मुद्दों पर भी होगी, जिनमें सहयोग की संभावनाएं हैं। यह दावा करना, कि इसका प्राथमिक उद्देश्य अफ्रीका को अपनी आर्थिक गतिविधियों में तेजी लाने में मदद करना है, शिष्टाचार के नाते ठीक नहीं लगता।

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वैसे यह कोई छिपी बात नहीं है कि 1.1 अरब आबादी और 3.7 खरब डॉलर जीडीपी वाला अफ्रीका संसाधनों से समृद्ध महाद्वीप है, जहां आर्थिक विकास में विविधता दिखाई देती है। यहां के कुछ देश तेजी से आर्थिक विकास कर रहे हैं और उन्होंने लोकतांत्रिक प्रक्रिया भी अपनाई है। वहीं ऐसे देश भी यहां हैं, जो खूनी संघर्षों के गवाह रहे हैं और आर्थिक बर्बादी का सामना कर रहे हैं। सिर्फ चीन ही नहीं, अमेरिका और यूरोपीय संघ भी बरसों से अफ्रीका में संभावनाएं तलाशते रहे हैं। जबकि भारत की यहां पहलकदमी कुछ कमतर दिखती है।
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चीन के साथ 220 अरब डॉलर के द्विपक्षीय व्यापार की तुलना में भारत का अफ्रीका के साथ सिर्फ 72 अरब डॉलर का व्यापार है। वैसे भारतीय उद्योग जगत ने अफ्रीका में 30-35 अरब डॉलर का निवेश किया है। इसके अलावा भारत ने कनेक्टिविटी के लिए ई-नेट, टेली मेडिसिन और टेली एजुकेशन जैसी पहल के साथ ही एचआईवी और एड्स जैसी बीमारी से लड़ने में भी अफ्रीका की मदद की है। भारत ने कुछ अफ्रीकी देशों में प्रौद्योगिकी और आईटी से जुड़े केंद्र भी स्थापित किए हैं, और 24,000 छात्रवृत्तियां शुरू की हैं।
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ऐसे समय जब चीन की अर्थव्यवस्था उतार पर है और यूरो जोन संकट से पूरी तरह उबर नहीं सका है, इस सम्मेलन के बहाने भारत के पास अफ्रीका के साथ अपने संबंधों को परस्पर लाभ के लिए मजबूत करने का सुनहरा मौका है। आज से शुरू हो रहे इस चार दिवसीय भव्य शिखर सम्मेलन में उम्मीद करनी चाहिए कि अफ्रीकी देशों की इस शिकायत को दूर करने का मौका मिलेगा कि भारत उन्हें गंभीरता से नहीं लेता है, और बहुत कम राष्ट्राध्यक्षों को ही उसने अब तक अपने यहां आमंत्रित किया है।

1970 और 80 के दशक में अफ्रीकी देशों में मारवाड़ी और गुजराती कारोबारियों को स्थानीय लोग पसंद नहीं करते थे। अब ऐसी भावनाएं चीनियों के प्रति नजर आती हैं, जिन्हें वहां शोषक के रूप में देखा जा रहा है। यदि भारत चीनी, अमेरिकी और यूरोपीय कंपनियों से प्रतिस्पर्धा कर खुद को अधिक विश्वसनीय और कम शोषक बताने में सफल हो और अपनी सेवाओं और उत्पादों को स्थानीय जरूरतों के अनुरूप उपलब्ध करा सके, तो वह अफ्रीका के साथ द्विपक्षीय व्यापार को अगले एक दशक में पांच गुना तक पहुंचा सकता है। वैसे भी दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया, सूडान, दक्षिणी सूडान, अंगोला, लीबिया, केन्या, मोजाम्बिक, मिस्र, तंजानिया, युगांडा, बोत्स्वाना और मोरक्को भारत के बड़े कारोबारी साझेदार हैं। रिलायंस इंडस्ट्रीज और एस्सार एनर्जी, दोनों ही जाम्बिया, मलावी, बोत्स्वाना, नामीबिया और तंजानिया में कारोबार कर रहे हैं। ओएनजीसी विदेश और आईओसी ने दक्षिणी सूडान, नाइजीरिया, लीबिया, मोजाम्बिक और मिस्र में निवेश किया है।

वाणिज्य और व्यापार राज्य मंत्री निर्मला सीतारमन महसूस करती हैं कि अफ्रीकी देशों के साथ ढांचागत क्षेत्र, ऊर्जा, कृषि और स्वास्थ्य के क्षेत्र में आर्थिक सहयोग की काफी संभावनाएं हैं। कुछ विशेषज्ञ उम्मीद करते हैं कि शिखर सम्मेलन में अरबों डॉलर के पांच सौ समझौतों पर हस्ताक्षर हो सकते हैं। मगर असल बात यह है कि सम्मेलन के बाद इनमें किस तरह की प्रगति होती है। यह तभी सफल हो सकता है, जब हमारे राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाह अपनी मानसिकता बदलें। भारतीय विदेश सेवा के अधिकांश अधिकारी अफ्रीका में पदस्थापना के प्रति अनमने होते हैं।

तीन वर्ष पूर्व एक विदेश सचिव ने स्वीकार किया था कि अफ्रीका में उच्चायुक्तों के 27 पद रिक्त थे, क्योंकि कोई वहां जाना ही नहीं चाहता था! इसी तरह कैबिनेट मंत्री भी यों तो दुनिया भर में जाते रहते हैं, लेकिन जब तक मजबूरी न हो, वे अफ्रीकी देशों में नहीं जाते। यही नहीं, हम अफ्रीकी राष्ट्रपतियों की मेजबानी के लिए भी बहुत उत्सुक नहीं दिखते। इस सम्मेलन से पूर्व भारत आने वाले केन्या के अंतिम राष्ट्रपति एरप मोई थे, जो 1981 में यहां आए थे। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी उस वर्ष केन्या गई थीं। अफ्रीकी देशों में एक सामान्य संशय इस बात को लेकर होता है कि भारत उन्हें तभी याद करता है, जब उसे संयुक्त राष्ट्र या किसी अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठन में अपनी दावेदारी के लिए उनके समर्थन की जरूरत होती है। उम्मीद करनी चाहिए कि इस सम्मेलन के बाद यह नजरिया बदलेगा।


यदि प्रधानमंत्री वाणिज्य, ऊर्जा, परिवहन, आईटी और दूरसंचार, स्वास्थ्य, कृषि और विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी मंत्रियों को निरंतर अफ्रीकी देश जाने का निर्देश दें, तो उन्हें वहां जाना होगा। इसी तरह यदि यह नियम बना दिया जाए कि किसी भी आईएफएस को तब तक अतिरिक्त सचिव या सचिव नहीं बनाया जाएगा, जब तक कि वह कम से कम एक बार किसी अफ्रीकी देश में सेवा दे, तो स्थिति बदल सकती है। अफ्रीका के साथ भारत की ऐतिहासिक और सांस्कृतिक साझेदारी है और अफ्रीका के स्वतंत्रता संघर्ष का भी भारत ने समर्थन किया था। अब भू-राजनीतिक और आर्थिक हितों को मजबूत करते हुए इस रिश्ते को नई ऊंचाइयां देने का वक्त आ गया है।

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