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सच के अस्वीकार का आनंद
यशवंत व्यास
Updated Thu, 20 Dec 2012 10:33 PM IST
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एक नदी के किनारे बैठे एक सज्जन स्टीमर को देख रहे थे। कुछ लोग कोशिश कर रहे थे कि स्टीमर को पार उतरने के लिए तैयार किया जाए। उन्होंने बैठे-बैठे कहा, 'मुझे मालूम है, इंजन तक स्टार्ट नहीं होगा। बेकार लगे हुए हैं।' कुछ देर बाद इंजन ने आवाज की। सज्जन ने अब कहा, 'अभी चलने तो दो। मुझे पक्का भरोसा है कि चार फुट भी आगे नहीं बढ़ सकेगा।'
स्टीमर बीच में पहुंचा। उन्होंने निराशा की ज्योतिषशास्त्रीय भविष्यवाणी में गोता लगाते हुए कहा, 'पक्की बात है, किनारे पहुंच ही नहीं पाएंगे।'
वे उतर गए और उधर उत्सव भी मनाने लगे, तो इस ज्योतिष ने फरमाया, 'तो क्या हुआ? अब जरा लौटकर बताएं। मेरा दावा है कि ये जीवन में कभी भी उस किनारे से इधर नहीं आ सकेंगे।'
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इस सज्जन की कहानी को संभवतः केशु-कांग्रेसवादी और कुछ खास किस्म के विश्लेषक निश्चित ही प्रेम से पढ़ेंगे और चाहेंगे कि सज्जन सही हों, लेकिन दिल्ली के मीडिया की प्रेस ब्रीफिंग से सच के अस्वीकार का आनंद तो उठाया जा सकता है, सच को बदला नहीं जा सकता।
अगर ऐसा होता है जो आप चाहते हैं, वही मानते हैं। और जो मानते हैं, वही चाहने लगते हैं। धीरे-धीरे पता लगता है कि जो कुछ हो रहा है, वह अगर आपका चाहा हुआ नहीं है, तो वह हो ही नहीं रहा है।
नरेंद्र मोदी के सिलसिले में गुजरात विधानसभा चुनाव के पहले जो कहा जाता था, वह चुनाव के बाद भी कहा जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि एक एसएमएस घूम रहा है, जो बताता है कि राहुल गांधी जहां-जहां गए, वहां तो कांग्रेस ने सीटें जीत ली हैं।
यह अस्वीकार के आनंद का अद्भुत उदाहरण है। यदि उत्तर प्रदेश, बिहार और गुजरात के पिछले चुनावों में सोनिया गांधी या राहुल गांधी के दौरों की इसी तरह गिनती चलती रही, तो वास्तविक विश्लेषण खत्म ही हो जाएगा। इसे स्वीकार करने में क्या हर्ज है कि कांग्रेस, आएसएस से आशीर्वाद पाए केशुभाई पटेल के कंधों पर खड़े होकर चुनाव लड़ रही थी। कुछ विशेष समूह लगातार पुराने दंगों के पोस्टर जिंदा रखे हुए थे।
मोदी के लिए बाहर से ज्यादा भीतर की लड़ाई थी, क्योंकि बाहर भी भीतर वाले ही थे। ऐसे में यह ठीक है कि आप कामना करते रहें कि केशुभाई, पटेलों के वोट लेकर मोदी का हिसाब करने में सफल हो जाएंगे, लेकिन असफलता पर आप यह निष्कर्ष नहीं देते कि जातिवादी राजनीति की तलवार से तेजतर्रार राजनीति को काटने की चतुराई काम नहीं आ सकी।
यह समय उन लोगों को अफसोस का लग रहा होगा, जो यह मानते हैं कि नरेंद्र मोदी से घृणा ही समूचे विमर्श का आधार हो सकती है। और यहीं से उस अर्थ की शुरुआत होती है, जो मोदी स्वयं स्थापित करना चाहते हैं। जब आप कहते हैं कि मोदी की जीत लोकतंत्र और सकल भारत की मूल भावना को चुनौती दे रही है, तो आप मोदी का काम और आसान कर रहे होते हैं।
वे इतने दिनों के तौर-तरीकों से यह समझ गए हैं कि निरंतर दिल्ली से प्रक्षेपित वैचारिक फॉर्मूले को किस तरह अपनी शक्ति में तब्दील कर लेना चाहिए। उनके ब्रांड की कोर वैल्यू ही इस बात पर टिकी है कि दुनिया भर के दुश्मन एक व्यक्ति के विरुद्ध हर नीति-अनीति अपनाने में जुटे हैं- यह न सिर्फ प्रदर्शित होने लगे, बल्कि स्थापित होता हुआ भी जान पड़े।
वे बार-बार इस धारणा को अपने समर्थकों में मजबूत करते जाते हैं कि उनकी विशिष्टता उनके विरोधियों को चिढ़ाती है। इसलिए विरोधियों को उत्तर देना, इस विशिष्टता की रक्षा के लिए आवश्यक है। कहना बेकार है कि इसीलिए सांप्रदायिकता के शैतान, ढपोरशंख और झूठे जैसे विशेषणों को उछालकर मोदी को समाप्त करना संभव नहीं हो सकता।
यह दिलचस्प है कि गुजरात में सत्ता के लिए परेशान कुछ भाजपाई नेता ही मोदी को दिल्ली का रास्ता दिखाने की जुगत में थे। जाहिर है, महत्वाकांक्षा के पेट्रोल से आग बुझाने की तकनीक कारगर नहीं होती। इससे जाहिर हुआ कि नरेंद्र मोदी ब्रांड से भाजपा के भीतर ही भय पैदा हो गया है।
चूंकि जनाधार विहीन नेतृत्व या कृपा पर निर्भर बिंब एक जैसे होते हैं, इसलिए भय जल्दी ही शौर्य के चित्र रचने की मुद्रा अपनाना शुरू कर देता है। इस रचना-प्रक्रिया में खुद का कद बना लेने वाले व्यक्ति की जगह कहीं न हो, इसे सुनिश्चित करने में सारी ऊर्जा लग जाती है।
फिलहाल, और उसके बाद भी मोदी दिल्ली में पीएम के उम्मीदवार होंगे या नहीं, इसकी प्रतीक्षा भाजपा की बेचैन आत्माओं को उतनी ही है, जितनी कांग्रेस को। माना जा रहा है कि यदि मोदी नेतृत्व करते हैं, तो कांग्रेस को सांप्रदायिकता का मुद्दा लेकर अपने बाकी रिकॉर्ड से ध्यान हटाने की सुविधा हो जाएगी और तब भाजपा की बेचैन आत्माएं भी शायद त्राण पा सकेंगी। इसके उलट भाजपा के पास समस्याओं का अंबार लगाने की आंतरिक मशीन है जो अनवरत चल रही है।
यह बार-बार साबित होता रहा है कि चीखते प्रवक्ताओं या भीतर से दुखी किंतु बाहर से मुदित नेताओं से पूछना समूचे लोकतांत्रिक निष्कर्ष का आधार नहीं होता। बेहतर होगा कि मोदित्व से मुकाबला करने वाले निष्कर्षों के लिए वास्तविक राजनीतिमत्ता के आधार लिए जाएं।
बहुमत और विचार के सत्य परस्पर पर्यायवाची नहीं होते। इसीलिए एक खरी तार्किकता बहुमत के परे जाकर आती है। मौजूदा राजनीतिक प्रहसन के बीच कितनी और कैसी संभावनाएं मौजूद हैं, उन्हें कांग्रेस के आत्ममंथन, शेष राजनीतिक विकल्पों की बेताबी और लोकतंत्र के मूलभूत नैतिक प्रश्नों से ही परखा और जाना जा सकता है।
क्या इसके लिए भी हमें उधार के पारंपरिक सिद्धांत शास्त्र की जरूरत होगी?
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उनकी सिगरेट का छल्ला खत्म होता, इससे पहले ही उन्होंने देखा कि स्टीमर चल पड़ा है। उन्होंने फिर कहा, 'बीच नदी तक भी पहुंच जाए, तो बहुत है। इन्हें ये बात क्यों समझ में नहीं आती!'
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स्टीमर बीच में पहुंचा। उन्होंने निराशा की ज्योतिषशास्त्रीय भविष्यवाणी में गोता लगाते हुए कहा, 'पक्की बात है, किनारे पहुंच ही नहीं पाएंगे।'
वे उतर गए और उधर उत्सव भी मनाने लगे, तो इस ज्योतिष ने फरमाया, 'तो क्या हुआ? अब जरा लौटकर बताएं। मेरा दावा है कि ये जीवन में कभी भी उस किनारे से इधर नहीं आ सकेंगे।'
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इस सज्जन की कहानी को संभवतः केशु-कांग्रेसवादी और कुछ खास किस्म के विश्लेषक निश्चित ही प्रेम से पढ़ेंगे और चाहेंगे कि सज्जन सही हों, लेकिन दिल्ली के मीडिया की प्रेस ब्रीफिंग से सच के अस्वीकार का आनंद तो उठाया जा सकता है, सच को बदला नहीं जा सकता।
अगर ऐसा होता है जो आप चाहते हैं, वही मानते हैं। और जो मानते हैं, वही चाहने लगते हैं। धीरे-धीरे पता लगता है कि जो कुछ हो रहा है, वह अगर आपका चाहा हुआ नहीं है, तो वह हो ही नहीं रहा है।
नरेंद्र मोदी के सिलसिले में गुजरात विधानसभा चुनाव के पहले जो कहा जाता था, वह चुनाव के बाद भी कहा जा रहा है। दिलचस्प बात यह है कि एक एसएमएस घूम रहा है, जो बताता है कि राहुल गांधी जहां-जहां गए, वहां तो कांग्रेस ने सीटें जीत ली हैं।
यह अस्वीकार के आनंद का अद्भुत उदाहरण है। यदि उत्तर प्रदेश, बिहार और गुजरात के पिछले चुनावों में सोनिया गांधी या राहुल गांधी के दौरों की इसी तरह गिनती चलती रही, तो वास्तविक विश्लेषण खत्म ही हो जाएगा। इसे स्वीकार करने में क्या हर्ज है कि कांग्रेस, आएसएस से आशीर्वाद पाए केशुभाई पटेल के कंधों पर खड़े होकर चुनाव लड़ रही थी। कुछ विशेष समूह लगातार पुराने दंगों के पोस्टर जिंदा रखे हुए थे।
मोदी के लिए बाहर से ज्यादा भीतर की लड़ाई थी, क्योंकि बाहर भी भीतर वाले ही थे। ऐसे में यह ठीक है कि आप कामना करते रहें कि केशुभाई, पटेलों के वोट लेकर मोदी का हिसाब करने में सफल हो जाएंगे, लेकिन असफलता पर आप यह निष्कर्ष नहीं देते कि जातिवादी राजनीति की तलवार से तेजतर्रार राजनीति को काटने की चतुराई काम नहीं आ सकी।
यह समय उन लोगों को अफसोस का लग रहा होगा, जो यह मानते हैं कि नरेंद्र मोदी से घृणा ही समूचे विमर्श का आधार हो सकती है। और यहीं से उस अर्थ की शुरुआत होती है, जो मोदी स्वयं स्थापित करना चाहते हैं। जब आप कहते हैं कि मोदी की जीत लोकतंत्र और सकल भारत की मूल भावना को चुनौती दे रही है, तो आप मोदी का काम और आसान कर रहे होते हैं।
वे इतने दिनों के तौर-तरीकों से यह समझ गए हैं कि निरंतर दिल्ली से प्रक्षेपित वैचारिक फॉर्मूले को किस तरह अपनी शक्ति में तब्दील कर लेना चाहिए। उनके ब्रांड की कोर वैल्यू ही इस बात पर टिकी है कि दुनिया भर के दुश्मन एक व्यक्ति के विरुद्ध हर नीति-अनीति अपनाने में जुटे हैं- यह न सिर्फ प्रदर्शित होने लगे, बल्कि स्थापित होता हुआ भी जान पड़े।
वे बार-बार इस धारणा को अपने समर्थकों में मजबूत करते जाते हैं कि उनकी विशिष्टता उनके विरोधियों को चिढ़ाती है। इसलिए विरोधियों को उत्तर देना, इस विशिष्टता की रक्षा के लिए आवश्यक है। कहना बेकार है कि इसीलिए सांप्रदायिकता के शैतान, ढपोरशंख और झूठे जैसे विशेषणों को उछालकर मोदी को समाप्त करना संभव नहीं हो सकता।
यह दिलचस्प है कि गुजरात में सत्ता के लिए परेशान कुछ भाजपाई नेता ही मोदी को दिल्ली का रास्ता दिखाने की जुगत में थे। जाहिर है, महत्वाकांक्षा के पेट्रोल से आग बुझाने की तकनीक कारगर नहीं होती। इससे जाहिर हुआ कि नरेंद्र मोदी ब्रांड से भाजपा के भीतर ही भय पैदा हो गया है।
चूंकि जनाधार विहीन नेतृत्व या कृपा पर निर्भर बिंब एक जैसे होते हैं, इसलिए भय जल्दी ही शौर्य के चित्र रचने की मुद्रा अपनाना शुरू कर देता है। इस रचना-प्रक्रिया में खुद का कद बना लेने वाले व्यक्ति की जगह कहीं न हो, इसे सुनिश्चित करने में सारी ऊर्जा लग जाती है।
फिलहाल, और उसके बाद भी मोदी दिल्ली में पीएम के उम्मीदवार होंगे या नहीं, इसकी प्रतीक्षा भाजपा की बेचैन आत्माओं को उतनी ही है, जितनी कांग्रेस को। माना जा रहा है कि यदि मोदी नेतृत्व करते हैं, तो कांग्रेस को सांप्रदायिकता का मुद्दा लेकर अपने बाकी रिकॉर्ड से ध्यान हटाने की सुविधा हो जाएगी और तब भाजपा की बेचैन आत्माएं भी शायद त्राण पा सकेंगी। इसके उलट भाजपा के पास समस्याओं का अंबार लगाने की आंतरिक मशीन है जो अनवरत चल रही है।
यह बार-बार साबित होता रहा है कि चीखते प्रवक्ताओं या भीतर से दुखी किंतु बाहर से मुदित नेताओं से पूछना समूचे लोकतांत्रिक निष्कर्ष का आधार नहीं होता। बेहतर होगा कि मोदित्व से मुकाबला करने वाले निष्कर्षों के लिए वास्तविक राजनीतिमत्ता के आधार लिए जाएं।
बहुमत और विचार के सत्य परस्पर पर्यायवाची नहीं होते। इसीलिए एक खरी तार्किकता बहुमत के परे जाकर आती है। मौजूदा राजनीतिक प्रहसन के बीच कितनी और कैसी संभावनाएं मौजूद हैं, उन्हें कांग्रेस के आत्ममंथन, शेष राजनीतिक विकल्पों की बेताबी और लोकतंत्र के मूलभूत नैतिक प्रश्नों से ही परखा और जाना जा सकता है।
क्या इसके लिए भी हमें उधार के पारंपरिक सिद्धांत शास्त्र की जरूरत होगी?