फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Reality of agricultural laws read VM Singh article

कृषि कानूनों की वास्तविकता, कैसे होगा किसानों को नुकसान, बता रहे हैं वीएम सिंह

Sun, 04 Oct 2020 01:12 AM IST
वी एम सिंह वी एम सिंह
वी एम सिंह Published by: वी एम सिंह Updated Sun, 04 Oct 2020 01:12 AM IST
विज्ञापन
Reality of agricultural laws read VM Singh article
किसान बिल के विरोध में प्रदर्शन करते किसान - फोटो : अमर उजाला

बीते दिनों संसद में कृषि से संबंधित दो विधेयक पारित किए गए हैं। साथ ही आवश्यक वस्तु अधिनियम, 1955 में संशोधन किया गया है, जिससे गेहूं, चावल, दलहन, तिलहन, प्याज और आलू अब आवश्यक वस्तु नहीं रह गए हैं, इसलिए जन वितरण प्रणाली (पीडीएस) के माध्यम से इनकी आपूर्ति होने की संभावना नहीं है, इस प्रकार इन गैर-आवश्यक वस्तुओं की खरीद की संभावना धूमिल है, जिसका अर्थ है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) घोषित होने पर भी उसका कोई मतलब नहीं रह जाएगा। यह कानून व्यापारियों को किसानों की स्थिति का फायदा उठाने का मौका देता है, जो अब जितना चाहे उतना अनाज और फल, सब्जियां जमा कर सकते हैं और कृत्रिम कमी दिखाकर बाजार को नियंत्रित कर सकते हैं, जिससे मूल्य में बढ़ोतरी होगी।


loader

दूसरा अधिनियम मुख्य रूप से 'एक राष्ट्र-एक बाजार' से संबंधित है और इसने व्यापारियों और एफपीओ (किसान उत्पादक संगठन) को एपीएमसी (कृषि उपज विपणन समिति) मंडी के बाहर से खरीद की अनुमति दी है। हैरानी की बात यह है कि एपीएमसी के बाहर खरीदने वाले व्यापारियों /एफपीओ को लाइसेंस की जरूरत नहीं है, उन्हें केवल एक पैन कार्ड की आवश्यकता है और तीन दिनों के भीतर उपज का पैसा देना पड़ेगा। लगता है कि सरकार ने गन्ना किसानों की दुर्दशा से कोई सबक नहीं लिया है, जिन्हें चौदह दिन के बजाय चौदह महीने में पैसा मिलता है, वह भी अदालत के हस्तक्षेप के बाद। लेकिन इस अधिनियम के तहत सिविल कोर्ट में अपील नहीं की जा सकती और मामले का निपटारा सुलह बोर्ड द्वारा किया जाएगा, जिसमें पहले एसडीएम के पास अपील की जाएगी और फिर डिस्ट्रिक्ट मजिस्ट्रेट द्वारा।

प्रधानमंत्री और उनकी टीम देश को बता रही है कि किसान अब स्वतंत्र हैं और उनकी बेड़ियां काट दी गई हैं तथा वे देश में कहीं भी, जहां उन्हें ज्यादा मूल्य मिले, अपनी उपज बेच सकते हैं। लेकिन यह सच नहीं है। किसान अपनी उपज को कहीं भी बेचने के लिए हमेशा से स्वतंत्र थे, लेकिन वास्तविकता यह है कि 86 फीसदी किसान दो हेक्टेयर से कम जोत वाले हैं और उनके पास तहसील मंडी से आगे जाने का अपना कोई साधन या संसाधन नहीं है। दो उदाहरण इस तर्क को सुलझा सकते हैं-(i) अगर यह सच था, तो मक्के की तैयारी और बिक्री जुलाई-अगस्त में हुई, यानी जून, 2020 में अध्यादेश लागू होने के बाद, फिर भी देश के किसानों को 600 से 900 रुपये प्रति क्विंटल के बीच मिला, जबकि एमएसपी 1,760 रुपये प्रति क्विंटल था। चूंकि सरकार ने मक्के का एक भी दाना नहीं खरीदा, इसलिए व्यापारियों ने कम कीमत पर उसे खरीदा और 200 फीसदी का मुनाफा कमाया। (ii) बेड़ियों को तोड़ने का मिथक भी इस तथ्य से उजागर होता है कि आजादी के बाद से महाराष्ट्र में बड़ी मात्रा में प्याज उगाया जाता है। सेब, चेरी, बेर, लीची, नारियल के साथ अनाज भी एक राज्य से दूसरे राज्य में बेचा जाता है। वर्षों से उत्तर प्रदेश के जिलों से हरियाणा ले में अनाज बेचा जाता है। अभी कुछ हफ्ते पहले सहारनपुर से यमुनानगर और शामली से करनाल तक धान की सैकड़ों ट्रैक्टर ट्रॉलियों को भाजपा शासित हरियाणा पुलिस ने जबरन उत्तर प्रदेश वापस भेज दिया था।

दूसरा कानून अनुबंध खेती समझौते से संबंधित है। इसके बारे में कहा गया कि यह छोटे और सीमांत किसानों के जीवन को बदल देगा। उत्तर प्रदेश गन्ना अधिनियम, 1953 के तहत 25 से 50 हजार छोटे एवं सीमांत गन्ना किसान पिछले 67 वर्षों से गन्ना उत्पादक सहकारी समितियों के जरिये चीनी मिलों के साथ अनुबंध खेती कर रहे हैं। हालांकि यह वैधानिक समझौता दोनों पक्षों द्वारा स्वीकृत और हस्ताक्षरित है, फिर भी भुगतान आम तौर पर उच्च न्यायालय और सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद किया जाता है, लेकिन यह अधिनियम सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में नहीं है। यदि हजारों किसान सामूहिक रूप से चीनी मिल मालिकों से मुकाबला नहीं कर सकते हैं, तो हम कैसे उम्मीद कर सकते हैं कि एक किसान इस समझौते द्वारा संरक्षित होगा।

कृषि मंत्री ने कहा कि किसानों को फसल क्षति के कारण नुकसान नहीं होगा, लेकिन अधिनियम में ऐसा कुछ भी नहीं है, इसके विपरीत धारा 6 (2) स्पष्ट करती है कि उपज खरीदने से पहले प्रायोजक फसल का निरीक्षण करेगा। अगर प्रायोजक को नुकसान के बावजूद उपज खरीदना है, तो निरीक्षण का प्रावधान क्यों है। किसी भी कानून में एमएसपी का जिक्र नहीं है, जाहिर है इसे खत्म किया जाना है। एआईकेएससीसी मुख्य रूप से कॉरपोरेट से किसानों के हितों की रक्षा के लिए आंदोलन कर रही है, ताकि नियमित रूप से खरीद के लिए एमएसपी की घोषणा हो और अगर कोई एमएसपी से कम दर पर उपज खरीदे, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जाए।

प्रधानमंत्री और उनकी टीम बार-बार किसानों को आश्वासन दे रही है कि एमएसपी जारी रहेगा। लेकिन हम सरकार पर कैसे भरोसा कर सकते हैं, जब प्रधानमंत्री ने अपने पहले के वादों को पूरा नहीं किया है? अगर सरकार व्यापारियों / प्रायोजकों को कानूनी दर्जा दे सकती है, तो पीएम किसानों की सुरक्षा के लिए कानून लाने से क्यों कतरा रही है? किसान बिचौलियों से लड़ते रहे हैं लेकिन वे कॉरपोरेट की ताकत की बराबरी नहीं कर सकते, क्योंकि यह एक असमान लड़ाई है। दुर्भाग्य से सरकार कॉरपोरेट की मदद के लिए किसानों के कंधों पर बंदूक चलाना चाहती है। अगर सरकार वास्तव में किसानों की मदद करना चाहती है, तो उसे कॉरपोरेट समर्थक कानूनों को निरस्त करना होगा और एमएसपी के लिए कानून लाना होगा।

(लेखक अखिल भारतीय किसान संघर्ष समन्वय समिति के संयोजक हैं।)

 

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed