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आम आदमी को बहुत फायदा नहीं

Fri, 01 Feb 2013 09:38 PM IST
नई दिल्ली/कारोबार डेस्क
नई दिल्ली/कारोबार डेस्क Updated Fri, 01 Feb 2013 09:38 PM IST
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rbi cuts repo rate but not benefit common man

रिजर्व बैंक ने नौ महीने बाद रेपो दर में कटौती की, जिससे ब्याज दर घटने का सिलसिला शुरू हुआ है। इस मुद्दे पर वरिष्ठ अर्थशास्त्री प्रोफेसर जे. डी. अग्रवाल से अभिषेक सक्सेना ने बातचीत की-

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भारतीय रिजर्व बैंक ने नौ महीने बाद सीआरआर और रेपो दर में कटौती की है, क्या इसका महंगाई पर कोई स्थायी असर पड़ेगा?
बिल्कुल पड़ेगा। सीआरआर घटने से बाजार में 18,000 करोड़ रुपये आएंगे। इससे आपूर्ति बढ़ेगी और नकदी की कमी दूर होगी। इससे बैंकों को सस्ता कर्ज मिलेगा और वे रिजर्व बैंक के दिशा-निर्देशों के अनुरूप ब्याज दरें घटाएंगे। लेकिन यह भी समस्या का स्थायी हल नहीं है। महत्वपूर्ण यह है कि रिजर्व बैंक मुद्रास्फीति और संवृद्धि में संतुलन लाने, राजस्व घाटे को अधिक न होने देने और सरकारी उधार पर अंकुश लगाने के अपने कर्तव्यों को भी समझे। लेकिन यह होता दिख नहीं रहा है।
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तरलता की समस्या से निपटने के लिए अधिक अच्छा यह होता कि जमाओं के बाजार में प्रवाह पर अधिक ध्यान दिया जाता। हां, रेपो दर में कमी लाने के फैसले को जरूर सही ठहराया जा सकता है, क्योंकि भारत के वर्तमान आर्थिक हालात को देखते हुए इसे 6 से 6.5 प्रतिशत के बीच पहुंचना ही चाहिए।
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सीआरआर और रेपो दर में कटौती से आम आदमी किस तरह प्रभावित होगा?

अब आदमी के लिए घर, शिक्षा आदि के लिए कर्ज लेना आसान हो जाएगा। पर यह सिर्फ एक भुलावा है। आम आदमी घर तो तब लेगा, जब उसकी जेब में पैसा होगा। अगर घर के दाम भी आसमान छूने लगे, तो आदमी क्या करेगा। जरूरत इस बात की भी है कि उद्योग भी उत्पादों के दामों में कमी लाएं।

अगर सरकार ही गंभीर न हो, तो क्या रिजर्व बैंक की इस मौद्रिक कवायद से इच्छित उद्देश्यों की पूर्ति हो पाएगी?
कोई सरकार अगंभीर नहीं होती। पर जरूरत यह है कि सरकार की मौद्रिक, राजकोषीय, प्रशासकीय इत्यादि नीतियों में और इनका क्रियान्वयन करने वाली संस्थाओं में समन्वय हो। दिक्कत यह है कि हर संस्था फायदे की ही सोचती है। इस संदर्भ में भारत को संयुक्त राष्ट्र के चार्टर को अपनाना चाहिए। इसके अलावा हर क्षेत्र के लिए स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किए जाएं और इनके निष्पादन पर दृष्टि रखी जाए।

हमारी सरकार में दो धड़े दिखते हैं, पहला आर्थिक सुधार समर्थक है और दूसरा समाजवादी रुझान रखता है। क्या ऐसे में आर्थिक नीति से निरंतरता की उम्मीद की जा सकती है?
दरअसल, वैश्वीकरण की चुनौतियों के जवाब में हमने बाजार आधारित तंत्र को तो अपना लिया, लेकिन उसके मूल में अब भी अतिशय सरकारी नियंत्रण दिखता है। वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम में कुछ प्रभावशाली लोगों ने मिलकर लोगों को लूटने की एक ग्लोबल रेसिपी तैयार की और इसी को आर्थिक सुधार नाम दिया गया। आर्थिक सुधार भारत के लिए जरूरी हैं, लेकिन ये विकसित देशों को फायदा पहुंचाने वाले न होकर अपने देश की जरूरतों के मुताबिक होने चाहिए।


क्या यह कटौती बैकों के कामकाज में सार्थक तौर पर प्रतिबिंबित होगी?

एक हद तक यह माना जा सकता है। ब्याज दरों में कमी आने से, बैंक जमा दरों में भी कमी लाना प्रारंभ कर देंगे, ताकि कर्ज देना उनके लिए घाटे का सौदा साबित न हो। लेकिन बैंकों को समझना होगा कि उनके कुछ सामाजिक दायित्व भी होते हैं। आईसीआईसीआई बैंक कहता है कि उसने पिछले वर्ष लगभग 30 प्रतिशत फायदा कमाया। लगभग ऐसे ही आंकड़े अन्य बैंकों के भी हैं। इससे यह संकेत भी मिलता है कि ये बैंक रिजर्व बैंक पर अपने फायदे के लिए दबाव बनाते रहते हैं।

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