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1971 भारत-इंग्लैंड टेस्ट सीरीज: पचास साल पहले की वह यादगार शृंखला

Sun, 29 Aug 2021 04:22 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 29 Aug 2021 04:22 AM IST
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सार
1971 में पहली बार भारतीय क्रिकेट टीम ने इंग्लैंड को उसकी घरेलू टेस्ट शृंखला में पराजित किया था। 1959 और 1967 के हमारे अंतिम दो दौरों में हम सारे टेस्ट हार चुके थे और तब इंग्लैंड को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टीम का दर्जा हासिल था।
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Ramchandra Guha: 1971 India England test series and India historic win
अजित वाडेकर - फोटो : social media

विस्तार

भारत से बाहर जिस किसी शहर को मैं ठीक से जानता हूं, वह है लंदन, और लंदन में मेरी सबसे जानी-पहचानी जगह है ब्रिटिश लाइब्रेरी, जहां पिछले तीस वर्षों से मैं औपनिवेशिक भारत के इतिहास से जुड़े विशाल संग्रह को खंगालता आ रहा हूं। मैंने वहां हमेशा एक ही दिनचर्या का पालन करते हुए कम से कम एक हजार दिनों तक काम किया होगा : सदस्यता कार्ड दिखाने से पहले तहखाने में स्थित लॉकर में अपना सामान जमा करवाना और फिर चार मंजिल ऊपर वाचनालय में जाकर साम्राज्य के समय के 'इंडिया ऑफिस' से संबंधित रिकॉर्ड्स पलटना।


ब्रिटिश लाइब्रेरी के लॉकर खोलने और बंद करने के लिए चार अंकों वाला डिजिटल कोड होता है। हममें से अधिकांश लोगों से जब इस तरह का कोड बनाने के लिए कहा जाता है, तो हम अक्सर या तो अपनी जन्मतिथि या विवाह की तिथि या फिर अपने अभिभावकों की जन्मतिथियों को चुनते हैं। इन सारे वर्षों में ब्रिटिश लाइब्रेरी में काम करते हुए मैंने हमेशा जो अंक चुना वह है, 1971। मैं 1971 में तेरह वर्ष का था और उसके तेरह वर्ष बाद मेरा विवाह हुआ। लेकिन इस अस्वाभाविक साम्य के कारण मैंने अपने लॉकर के लिए यह अंक नहीं चुना था। इसके बजाय 1971 वह वर्ष था, जब क्रिकेट के मामले में हमने अपने पूर्व औपनिवेशक शासकों पर जबर्दस्त तरीके से प्रहार किया था, जिनकी हम कभी प्रजा हुआ करते थे। साम्राज्य से जुड़े ऐतिहासिक शोध कार्य करने वाले एक क्रिकेट प्रशंसक के रूप में यह अंक मेरे पेशे और मेरी दीवानगी, दोनों से मेल खाता है।


कुछ दिनों पहले ही हमने इंग्लैंड के खिलाफ भारत की पहली टेस्ट शृंखला की जीत की पचासवीं वर्षगांठ मनाई थी। मैं उस पर आता हूं, लेकिन जरा हम याद कर लें कि 1971 में इससे पहले हमने पहली बार वेस्ट इंडीज में कोई टेस्ट शृंखला जीती थी। वह भी एक उल्लेखनीय उपलब्धि थी। इससे पहले 1962 में हमने कैरेबियाई दौरा किया था और वहां हम पांचों टेस्ट हार गए थे। नौ साल बाद वेस्ट इंडीज के उन महान खिलाड़ियों में से कुछ रिटायर हो चुके थे या उनकी उम्र अधिक हो चुकी थी, जिन्होंने अतीत में हमें बुरी तरह से पराजित किया था। हालांकि गैरी सोबर्स उनके कप्तान बने हुए थे और उनके साथ कन्हाई, लॉयड और गिब्स जैसे शानदार क्रिकेटर खेल रहे थे। किसी ने भी कल्पना तक नहीं की थी कि भारत वेस्ट इंडीज को उनके घर पर पराजित कर देगा। फिर भी हमने एक टेस्ट जीतकर और बाकी चार को ड्रॉ करवाकर ऐसा कर दिखाया।

वेस्ट इंडीज की वह शृंखला फरवरी से अप्रैल, 1971 के बीच संपन्न हुई थी। तब मैं देहरादून के बोर्डिंग स्कूल में था। मैं द टाइम्स ऑफ इंडिया के स्पोर्ट्स पेज में उन टेस्टों के बारे में पढ़ता था, जिसकी रिपोर्ट शानदार लेखक के एन प्रभु खेल की गहरी समझ के साथ अपनी लयात्मक भाषा में कर रहे थे। मेरे छात्रावास के करीब सौ विद्यार्थियों के लिए एक अखबार आता था, वह भी द टाइम्स ऑफ इंडिया का डाक संस्करण। भोजनवाकाश के बाद जब हमारी कक्षाएं हो जाती थीं और खेल के पीरियड के लिए घंटे भर बचे होते थे, और जब मेरे सहपाठी गप लगाने में मस्त रहते थे, मैं अखबार लेकर एक बेंच में बैठ जाता था और प्रभु द्वारा लिखी गई रिपोर्ट्स पढ़ता था कि कैसे विकेट लिए गए और कैसे साझेदारियां खड़ी की गईं।

वेस्ट इंडीज में मैच भारतीय समयानुसार शाम को 7.30 बजे शुरू होते थे। अगली सुबह अखबार के संभवतः दिल्ली संस्करण में भोजनावकाश तक की रिपोर्टिंग होती थी; लेकिन डाक संस्करण कुछ घंटे पहले रवाना हो जाते थे, तो उनमें वह भी नहीं होती थी। लिहाजा, मैं खेल की रिपोर्ट दो दिन बाद ही पढ़ पाता था। देरी से मेरी उत्सुकता बढ़ने के साथ ही के एन प्रभु के लिखने के अंदाज ने उनमें मेरी दिलचस्पी और बढ़ा दी। आज की पीढ़ी को हर चीज को लाइव देखने में संतुष्टि मिलती है। मैं जिस तरह बड़ा हुआ, उसके लिए मैं आभारी हूं। मुझे लगता है कि पचास साल पहले वेस्ट इंडीज में गावस्कर और सरदेसाई की बल्लेबाजी, बेदी, प्रसन्ना तथा वेंटकराघवन की गेंदबाजी और वाडेकर की पूरी टीम ने जो किया था, उसके प्रति मेरे मन में जो प्रशंसा का भाव है, वह शायद यह सब स्क्रीन पर देखते हुए नहीं होता।

हालांकि वाडेकर की टीम ने वसंत में वेस्ट इंडीज में जीत हासिल की थी, लेकिन उस साल गर्मियों में इंग्लैंड के दौरे के समय यह बेहद कमजोर ही थी। चालीस साल की कोशिशों के बावजूद उस देश में हम तब तक कोई टेस्ट नहीं जीत सके थे। 1959 और 1967 के हमारे अंतिम दो दौरों में हम सारे टेस्ट हार चुके थे। इसके अलावा गैरी सोबर्स और उनकी टीम ढलान पर थी, जबकि रे इलिंगवर्थ की अगुवाई में इंग्लैंड को दुनिया की सर्वश्रेष्ठ टीम का दर्जा हासिल था। पिछली सर्दियों में ही उन्होंने मजबूत ऑस्ट्रेलियाई टीम को आराम से हराया था।

इंग्लैंड की शृंखला शुरू होते होते गर्मियों की छुट्टियां शुरू हो गईं। घर पर ही मैंने रेडियो पर इंग्लैंड-पाकिस्तान शृंखला के आखिरी दिनों को सुना, और घर पर ही मैंने रेडियो पर लॉर्ड्स में खेले गए इंग्लैंड और भारत के पहले टेस्ट मैच के दौरान एक-एक गेंद के बारे में सुना। यह एक मनोरंजक मुकाबला था, हर तरह से कड़ा मुकाबला। चौथी पारी में 183 रनों का पीछा करते हुए भारत एक समय सौ पर तीन था, लेकिन अचानक तेजी से विकेट गिरने लगे। मैच खत्म होने से घंटे भर पहले बादल छा गए और मैच को ड्रॉ घोषित करना पड़ा। तब भारत को जीतने के लिए चालीस रन चाहिए थे और उसके पास दो ही विकेट बचे हुए थे। 

मैंने मैनचेस्टर में हुए दूसरे टेस्ट का आंखों देखा हाल घर पर रेडियो पर सुना। इस बार भारत ने अपेक्षाकृत बेहतर खेला और बारिश ने उसे बचा लिया। ओवल में तीसरा टेस्ट जब शुरू हुआ, स्कूल शुरू हो चुके थे और मैं वापस छात्रावास में आ चुका था। वहां सिर्फ एक रेडियो था और सिर्फ वरिष्ठ छात्रों तक ही उसकी पहुंच थी। वे शाम को तब तक सुनते रहते थे, जब तक कि दस बजे रात को अनिवार्य रूप से बत्तियां बुझाने का समय नहीं हो जाता। हम जूनियर से अपेक्षा की जाती थी कि हम अपने क्यूबिकल्स में पढ़ाई करें। हमारा हाउस कैप्टन विवेक बामी खुशी-खुशी हमें थोड़ी-थोड़ी देर में स्कोर बता जाता था। ऐसी ही एक रात हमारे सोने के लिए निर्देश जारी होने से पहले बामी आया और उसने हमे सबसे ताजा नाटकीय जानकारी दी : इंग्लैंड की पारी 101 पर सिमटी। चंद्रशेखर 38 पर छह!

पचास साल बाद-लगभग आज तक- जब से मैंने अपने हाउस कैप्टन को ये शब्द बोलते हुए सुना है, यह मेरे सबसे पसंदीदा क्रिकेट पलों में से एक है। उसके बाद से मैंने अनगिनत बार रिप्ले देखा है कि इंग्लैंड की उस शाम चंद्रा ने वे सारे विकेट कैसे लिए थे, एडरिक को यॉर्कर से, इलिंगवर्थ और स्नो को कलात्मक ढंग से कॉट ऐंड बोल्ड करके, जॉन पेरिस को एलबीडब्ल्यू करके, फ्लेचर को सोलकर के हाथों लपकवाकर और वेंकट द्वारा लिए गए शानदार कैच के जरिये लखर्स्ट को।  इयान पीबल्स ने कभी लिखा था कि बारह बरस की उम्र में क्रिकेट देखने का जो अनुभव होता है, वैसा कभी नहीं होता। मैं खुद 1971 के अप्रैल के आखिरी हफ्ते में तेरह बरस का हुआ था, तब वेस्ट इंडीज की शृंखला खत्म ही हुई थी। अभी जब हम इंग्लैंड में जीते, तब भी मैं दिल से बारह साल का था। और उन दो शृंखलाओं के बारे में याद करते या लिखते समय मुझे लगता है कि मुझे अब भी बारह साल का होना चाहिए।

मैं जब यह लिख रहा हूं, तब भारत-इंग्लैंड शृंखला चल रही है। यदि भारत जीत जाता है और पटौदी ट्रॉफी पर कब्जा जमाए रखता है, तब भी मुझे संदेह है कि क्या '2021' का आंकड़ा आज के किशोर क्रिकेट प्रशंसकों से भावनात्मक रूप से जुड़ पाएगा। आईपीएल के प्रति जुनून का भी इससे संबंध है; इसके अलावा, हमारी टीम अब इतनी बार टेस्ट शृंखला जीतती है कि कोई विशेष जीत महत्वपूर्ण नहीं हो सकती। दूसरी ओर, मेरी पीढ़ी के क्रिकेट प्रशंसकों के लिए '1971' का आंकड़ा हमेशा विशेष बना रहेगा, क्योंकि उसी साल हमने वेस्ट इंडीज और इंग्लैंड में पहली बार सीरीज जीती थी। जिन कारणों से मैं चाहता हूं कि महामारी समाप्त हो जाए, उनमें एक बार फिर ब्रिटिश लाइब्रेरी में प्रवेश करना और ऊपर वाचनालय में फाइलें पलटने से पहले बेसमेंट में लॉकर खोलने के लिए उन चार अंकों को पंच करना भी शामिल है। मैं इसे विरोध और पुष्टि, दोनों के रूप में देखता हूं, औपनिवेशिक शासन की आलोचना के रूप में और हमारे क्रिकेटरों ने 1971 में उसके प्रेत को शांत करने के लिए जो कुछ किया था, उसके उत्सव के रूप में।

 
 
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