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पहुंचे हुए सिद्ध की पहचान
शिवकुमार गोयल
Updated Thu, 25 Jul 2013 07:50 PM IST
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रानी रासमणि ने भट्टाचार्य महाशय (स्वामी रामकृष्ण परमहंस) को उनकी प्रारंभिक अवस्था में मां काली की सेवा के लिए अपने मंदिर में पुजारी नियुक्त किया। अपने निश्छल हृदय तथा कठोर साधना से परमहंस जी ने काली मां का आशीर्वाद प्राप्त करने में इतनी सफलता प्राप्त कर ली कि वह घंटों उनकी स्मृति में समाधिस्थ हो जाते थे।
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रानी रासमणि समझ गईं कि वह सिद्ध और त्रिकालदर्शी महात्मा हैं। वह प्रेम और विनय की साक्षात मूर्ति हैं। इसलिए वह प्रायः मंदिर पहुंचा करतीं और उनका सत्संग करने को तत्पर रहतीं। स्वामी जी के मुख से मां काली की भक्ति के गीत सुनकर उन्हें अनूठा रस मिलता था।
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मंदिर के अन्य कर्मचारी भट्टाचार्य जी को साधारण पुजारी मानते थे। वे सभी रानी को ही मालिक मानकर उनके पैर छूकर प्रणाम किया करते थे।
एक दिन रानी मंदिर पहुंचीं। उन्होंने स्वामी जी से मां काली का भजन सुनाने की प्रार्थना की। स्वामी जी ने भजन सुनाना शुरू किया। थोड़ी देर में ही वह समझ गए कि रानी का मन किसी सांसारिक मामले में उलझा हुआ है। उन्होंने तपाक से उनके मुंह पर तमाचा जड़ दिया और बोले, काली मां के सामने एकाग्रचित्त होकर बैठना चाहिए।
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रानी उनके चरणों में झुककर बोलीं, वास्तव में आज के मुकदमे पर ध्यान चला गया था। क्षमा करें। मंदिर के कर्मचारी पहली बार स्वामी जी की महानता समझकर हतप्रभ थे।