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शोर मचाओ चिड़ियाओं

Sat, 11 Oct 2014 06:55 PM IST
राजकुमार कुम्भज
राजकुमार कुम्भज Updated Sat, 11 Oct 2014 06:55 PM IST
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rajkumar kumbhaj poem

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शोर मचाओ चिड़ियाओं
चिड़ियाओं के शोर मचाने से ही
शायद पराजित हो सकता है बहेलिया
पोस्टर-ब्वॉय बहेलिये को पहचानो
बहेलिया ही बाज है, जो रोकता है जन-जल
उम्मीद के आकाश में उड़ान भरने से पहले
मेरे हाथ छोटे हैं, किंतु हौसले बड़े हैं
सपना नहीं है और न ही कोई वादा
कि बनवा ही दूंगा हरेक सपने का ताजमहल
जरूरी है जिंदगी
जरूरी जिंदगी की जरूरी चीजों को
बचाना जरूरी है
भाड़ में जाए सरकार और सरकारी दलाल
शोर मचाओ चिड़ियाओं
चिड़ियाओं को शोर ही लोकतंत्र
में कुछ नहीं
__________________

उड़ानों का अंत नहीं होता है

उड़ानों का अंत नहीं होता है
अंत के बाद भी होती हैं, होती ही हैं उड़ानें
जिन उड़ानों में छोटा पड़ जाता है आकाश
आकाश का अंत नहीं होता है
अंत के बाद भी होता है आकाश
कि जिस आकाश में छोटी पड़ जाती है उड़ान
किंतु उस एक करिश्मे का कमाल भी देखिए
कि खत्म नहीं होती है हिम्मतें
हिम्मतों का होता नहीं है अंत
हिम्मतों के बाद भी होती हैं हिम्मतें
हिम्मतें होती हैं, होती रहें हिम्मतें
उड़ानें होती हैं, होती रहें हिम्मतें
आकाश होते हैं, होते रहें आकाश
बदल सकता है बाजार
बदल सकती है बाजार की ब्याज-दरें
उड़ानों का अंत नहीं होता है

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