सरकारी शिकंजे से मुक्ति में है रेलवे का उद्धार
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पिछले दिनों उत्तर प्रदेश में बस्ती के पास हुई गोरखधाम एक्सप्रेस की दुर्घटना की जांच तो बिठा दी गई, लेकिन इस जांच से कुछ निकलकर भी आएगा! हर ट्रेन दुर्घटना की जांच बैठती है और हर बार किसी सिग्नलमैन या ड्राइवर की नींद को बहाना बनाकर छुट्टी पा ली जाती है। रेल दुर्घटनाओं से कोई सबक नहीं सीखा जाता। रेलवे में बोर्ड की क्या भूमिका है तथा मंत्रालय बोर्ड को किस तरह लेता है, यह कभी पारिभाषित नहीं किया गया। मंत्री भले रेल भवन में बैठते हों, पर ट्रेनों का सारा कामकाज रेलवे बोर्ड के अधीन ही चलता है। रेल भवन और ट्रेन के संचालन में मंत्री सिर्फ मूक दर्शक होता है। रेलवे की यह माया उसे अन्य विभागों से अलग करती है। यही वजह है कि जांच में कभी रेलवे का कोई अधिकारी नहीं नपता। सारा दारोमदार सरकार या मंत्री पर आ गिरता है। जब तक रेल दुर्घटनाओं के लिए बोर्ड को जिम्मेदार नहीं बनाया जाता, तब तक कुछ होने वाला नहीं है। रेलवे का राजनीतिकरण इतना अधिक हो गया है कि मंत्री अपने क्षेत्र को ट्रेनों का तोहफा देने के अलावा कुछ नहीं करने की सोचता।
ट्रेन दुर्घटना की एक वजह ट्रैक पर जरूरत से अधिक भार भी है। इस हड़बड़ी में ट्रेन रूट और सिग्नल सिस्टम का आधुनिकीकरण नहीं किया गया। आज तक हम ऐसे उपकरण नहीं मंगा सके, जिसके जरिये इंजन 500 मीटर दूर खड़ी गाड़ी को चिह्नित कर काम करना स्वतः बंद कर दे। कंप्यूटरीकृत सिग्नल व्यवस्था अब भी सभी जगह नहीं हो पाई है, और जहां हुई है, वहां उसके प्रशिक्षण की पूरी व्यवस्था नहीं है। ऑपरेटिंग सिस्टम सीखने के बहाने रेलवे अधिकारी विदेश घूम आते हैं, पर उस कर्मचारी को नहीं भेजते, जो उस सिस्टम को संचालित करता है। आजादी के इतने साल में सरकारों ने देश को सिर्फ कुछ हजार किलोमीटर की रेलवे लाइनें दी हैं, पर गाड़ियों की संख्या उस तुलना में अत्यधिक बढ़ा दी हैं।
पिछली एनडीए सरकार ने रेल दुर्घटनाओं से निजात दिलाने तथा रेलवे के इंफ्रास्ट्रक्चर का विकास करने के लिए कुछ योजनाएं बनाई थीं, पर उन पर काम होता, इसके पहले ही सरकार चली गई। लालू यादव ने एनडीए राज में बनाई योजनाओं में से सबको नष्ट कर दिया और रेलवे के प्रयोग में न आने वाली चीजों को मिट्टी के भाव बेचकर फालतू की तालियां बटोरी। रेलवे का अर्थतंत्र किराया बढ़ाने-न बढ़ाने से नहीं, बल्कि मालगाड़ियों की आवाजाही कम करने और उन्हें लगातार लेट करने से गड़बड़ाता है। क्योंकि माल ढुलाई के भाड़े से ही रेलवे अपना घाटा पूरा करता है। पर यह सरलीकरण पूरे रेलवे का नुकसान कर रहा है।
जब तक अतिरिक्त रेलवे मार्ग नहीं बनाए जाएंगे, हम किराये को लेकर खींचतान करते रहेंगे। कुछ मुख्य मार्गों पर अप-डाउन ट्रैक हैं, पर उनमें से अधिकतर का विस्तार अंग्रेज कर गए थे। तब रेलवे अलग-अलग खंडों में बंटा हुआ था और कोई न कोई कंपनी इसे चला रही थी, इसलिए उसका सारा ध्यान मुनाफे की तरफ रहता था। तब मालगाड़ियों को यात्री गाड़ी पर तरजीह मिला करती थी, क्योंकि माल समय से पहुंचने की गारंटी रेलवे कंपनियां लेती थीं। मगर अब मालगाड़ियां जंगलों में खड़ी करवा ली जाती हैं और उनसे माल तड़ीपार कर लिया जाता है। अब ढुलाई की जाने वाली अधिकांश चीजें सरकारी हैं और रेलवे भी सरकारी, ऐसे में, कौन किससे हर्जाना मांगे?
अत्यधिक सवारी गाड़ियां चलाना भी ट्रेन दुर्घटनाओं के बढ़ने की वजह है। आज तक किसी रेल मंत्री ने नई रेलगाड़ी की जगह डब्बे बढ़ाने के विकल्प पर गौर नहीं किया। इससे तमाम कोच कारखाने खुलते तथा लोगों को रोजगार भी मिलता। मगर रेलवे को सरकारी शिकंजे से आजाद न करने वाले नेताओं और रेलवे बोर्ड में बैठे अधिकारियों ने इसे कभी सिरे नहीं चढ़ने दिया।