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क्या राहुल 2014 के लिए तैयार हैं?

Tue, 03 Dec 2013 07:09 PM IST
रशीद किदवई
रशीद किदवई Updated Tue, 03 Dec 2013 07:09 PM IST
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Rahul ready for 2014?

राजस्थान और दिल्ली विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के लिए उम्मीदें धूमिल दिख रही हैं। वहीं मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ को भारतीय जनता पार्टी के हाथों से छीनने में भी उसे खासी कठिनाई हो रही है। ऐसे में राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर एक बार फिर सवाल उठने लगे हैं।

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इन पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के नतीजे राहुल गांधी और प्रधानमंत्री पद के लिए भाजपा के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी, दोनों को जनता के रुझान को समझने का मौका देंगे। हालांकि दोनों ही नेताओं की शैलियां अलग-अलग हैं। दिल्ली की सल्तनत पर नजर रखे मोदी ने तमाम हथकंडों को अपनाते हुए सघन अभियान छेड़ा हुआ है। दूसरी ओर 'शहजादे' राहुल ने कछुए और खरगोश की दौड़ की पौराणिक कहानी वाली नीति को अपनाए रखा। क्या इस कहानी की तरह बार-बार कछुआ ही जीतेगा, इसका फैसला तो आठ दिसंबर को ही होगा।
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प्रधानमंत्री पद के अघोषित उम्मीदवार राहुल के सामने कई चुनौतियां हैं। अगर राजस्थान में गहलोत सरकार की पराजय होती है, तो वहां अपने नजदीकी समझे जाने वाले सी पी जोशी को आगे बढ़ाने के राहुल के फैसले का सवालों के घेरे में आना तय है। दरअसल, जोशी और उनके समर्थक कहते आए हैं कि विधानसभा चुनाव में पार्टी के जीतने पर नवनिर्वाचित विधायक ही नए मुख्यमंत्री के नाम का निर्धारण करेंगे।
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ऑल इंडिया कांग्रेस कमेटी (एआईसीसी) के महासचिव की शह पर दिया जाने वाला यह तर्क गहलोत ओर कांग्रेस के हजारों समर्थकों के गले नहीं उतरा। खासकर तब, जबकि चुनाव से ऐन पहले गहलोत लोकलुभावन वायदों के जरिये मतदाताओं को रिझाने की कोशिशों में लगे थे। सारे हालात समझते हुए भी राहुल ने जोशी को रोकने के लिए कुछ नहीं किया।

कुछ ऐसी ही गलती राहुल ने मध्य प्रदेश में भी दोहराई। जब उज्जैन से कांग्रेसी सांसद प्रेम चंद गुड्डू ने चालाकी दिखाते हुए पार्टी द्वारा घोषित आधिकारिक प्रत्याशी की जगह अपने पुत्र का नाम लिखवा दिया। राहुल इस पर भी आंखे मूंदे रहे। राहुल सार्वजनिक जीवन में ईमानदारी बरतने की बात कहते रहे हैं, लेकिन खुले तौर पर उनकी अवहेलना करने वाले गुड्डू पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने की जरूरत तक नहीं समझी गई।

मध्य प्रदेश में राहुल की टीम में ज्योतिरादित्य सिंधिया, दिग्विजय सिंह, कमलनाथ और सुरेश पचौरी जैसे कई बड़े नाम शामिल हैं। जब होशंगाबाद से सांसद उदय प्रताप ने पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थामा, तो ये सभी दिग्गज मूकदर्शक ही बने रहे। दिल्ली कांग्रेस दरबार को अचंभित करने से एक दिन पहले उदय प्रताप अपना इस्तीफा देने के लिए निजी तौर पर लोकसभा सचिवालय पहुंचे। लेकिन संसदीय कार्य मंत्री कमलनाथ सहित किसी ने भी राहुल या सोनिया को सतर्क करने की जरूरत नहीं समझी। इसी के साथ समझा-बुझा कर उदय प्रताप को पार्टी में बनाए रखने की सारी उम्मीदें भी खत्म हो गईं।

2014 के लोकसभा चुनाव केवल छह महीने की दूरी पर हैं। वाड्रा, टू जी, कोलगेट जैसे घोटालों के बाद भ्रष्टाचार के मुद्दे पर उनका कुछ भी कहना अपने हाथ जलाने जैसा होगा। महंगाई के मुद्दे पर वह बोल सकते हैं। प्रधानमंत्री और वित्त मंत्री के समक्ष महंगाई को लेकर वह पहले ही पार्टी की चिंता जता चुके हैं। हालांकि यूपीए के वरिष्ठ मंत्रियों से बर्ताव करते समय इस युवा उपाध्यक्ष को शालीनता का साथ नहीं छोड़ना चाहिए। वैसे भी अध्यादेश के मुद्दे ने उन्हें नुकसान ही ज्यादा पहुंचाया है।

अगर महाराष्ट्र की बात करें, तो शायद राहुल के ही इशारे पर मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण तमाम औद्योगिक घरानों को यह समझाने में लगे हैं कि यूपीए सरकार ने अपने दोनों कार्यकालों में वैश्विक मंदी के बावजूद बेहतर आर्थिक माहौल की दिशा में काफी कुछ किया है। इसके बाद भी करीब 70 उद्योगपति यदि आज मोदी का समर्थन करते दिख रहे हैं, तो यह कांग्रेस की चिंताएं बढ़ाने के लिए काफी है।

राहुल के लिए असल चुनौती उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, बंगाल और महाराष्ट्र जैसे राज्य भी पेश कर रहे हैं, जहां से कांग्रेस को बड़ी तादाद में लोकसभा सीटों की जरूरत होगी। राहुल की टीम का मानना है कि अगर उत्तर प्रदेश से भाजपा चालीस से ज्यादा सीटें नहीं जीतती है, तो कांग्रेस खराब प्रदर्शन के बावजूद बसपा और सपा के साथ सहयोग करते हुए अपने राजनीतिक समीकरणों को दुरुस्त कर सकती है। वहीं बिहार में उसे जदयू और राजद के साथ गठजोड़ करने की उम्मीद है, जिसमें रामविलास पासवान मध्यस्थ की भूमिका में होंगे।


उम्मीदों की यह लड़ी उत्तर प्रदेश और बिहार में ही खत्म नहीं होती। धर्मनिरपेक्षता या मोदी विरोधी राजनीति नवीन पटनायक, जयललिता और ममता बनर्जी जैसों के साथ कांग्रेस के सहयोग की संभावनाओं को जिंदा रखे हुए है। चूंकि राहुल घोषित रूप से प्रधानमंत्री पद की होड़ में शामिल नहीं हैं, इसलिए मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को सत्ता से दूर रखने के लिए किसी संभावित गठबंधन सरकार में प्रधानमंत्री की कुर्सी का जुआ भी खेला जा सकता है। लेकिन समय की यह भी मांग है कि राहुल मोहरा बनने के बजाय पार्टी और सरकार का नियंत्रण सीधा अपने हाथ में लें। गुस्सा दिखाने या कुर्ते की बांह को ऊपर खिसकाने के बजाय वह मुस्कराहट, हाजिरजवाबी और तुरंत कार्रवाई करने की क्षमता के जरिये अपने समर्थकों और मतदाताओं का भरोसा ज्यादा अच्छी तरह जीत सकेंगे।

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