फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Rahul emerge from his old image

पुरानी छवि से निकलते राहुल

Wed, 12 Dec 2018 07:06 PM IST
सुरेंद्र कुमार
सुरेंद्र कुमार Updated Wed, 12 Dec 2018 07:06 PM IST
विज्ञापन
Rahul emerge from his old image
राहुल गांधी

एक दशक लंबी मांग के बाद 16 दिसंबर, 2017 को जब राहुल गांधी की कांग्रेस के 60वें अध्यक्ष रूप में ताजपोशी हुई, तब भाजपा बहुत खुश हुई थी। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और पार्टी के प्रवक्ताओं ने सार्वजनिक रूप से दावा किया कि राहुल गांधी उनकी पार्टी की जीत सुनिश्चित करने के लिए उपयोगी हैं। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभाओं के नतीजे के बाद (जो इन राज्यों की जनता की मनोदशा को दर्शाते हैं) संघ परिवार कांग्रेस के इस युवा अध्यक्ष को लेकर अपने आकलन की समीक्षा कर सकता है और अगले वर्ष होने वाले संसदीय चुनाव के लिए अपनी रणनीति में सुधार कर सकता है।


loader

राहुल गांधी ने पिछले दस वर्षों में कठोर आलोचना, उपहास, सोशल मीडिया पर निरंतर ट्रोलिंग और अपने में नेतृत्व के गुणों के न होने का अपमान बर्दाश्त किया है। उन्हें शहजादा कहा गया, जो अनिच्छुक राजनेता और गलाकाट प्रतिस्पर्धी राजनीति में नौसिखुआ थे, जिनकी पार्टी कल्पना से परे सिकुड़ गई थी। उन्हें पप्पू कहा गया, जो नाच नहीं सकता और जिन्हें परिवार के कारण पार्टी अध्यक्ष का पद मिला। जो पार्टी कभी पूरे देश में शासन करती थी, वह महज कुछ राज्यों तक सिमट गई। हालांकि तब वह पार्टी प्रमुख नहीं थे, लेकिन पार्टी के स्टार प्रचारक के रूप में संसदीय व विधानसभा चुनावों में एक के बाद एक हार के लिए अपनी जिम्मेदारी से वह इनकार नहीं कर सकते। उन पर 135 वर्ष पुरानी उस पार्टी को पुनर्जीवित करने की जिम्मेदारी है, जिसके कार्यकर्ताओं में हाल के चुनावों तक दुश्मन खेमे से लड़ने के लिए प्रेरणा, उत्साह और ऊर्जा की कमी थी। पिछले कुछ वर्षों में पार्टी सुस्त, मुकाबले से डरने वाली, चापलूस और मसखरे नेताओं की भीड़ बन गई थी, जिसने जनता के साथ संपर्क खो दिया था। राहुल अपने उस परिवार की विरासत को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी निभाने में भी कमजोर पड़ते दिखे, जिसने नेताओं की पांच पीढ़ियां देश को दी, लेकिन उसका करिश्मा और अपील खत्म हो गई।

इसके अलावा मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के रूप में राहुल के सामने एक विकट प्रतिद्वंद्वी हैं। मोदी एक आत्मनिर्भर, चतुर, कठिन संघर्ष करने वाले, मीडिया और उद्योग जगत को साधने वाले, सफल मुख्यमंत्री रहे हैं, जो अपनी पार्टी के दिग्गज नेताओं को परास्त और किनारे कर शीर्ष पर पहुंचे हैं, जिन्होंने सावधानीपूर्वक व्यापक रूप से वक्तृत्व कला और संवाद की अपनी शैली के जरिये छवि बनाई व भव्य राष्ट्रीय दृष्टि पेश की और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रशिक्षित, प्रेरित, अनुशासित जमीनी कार्यकर्ताओं द्वारा समर्थित सौ से ज्यादा नीतियों और लोकोन्मुखी योजनाओं की घोषणा की। मंत्रमुग्ध करने वाले वायदे और ऊर्जा, आत्मविश्वास तथा विचारों के साथ चौबीसों घंटे काम करने वाले प्रधानमंत्री की छवि पेश कर वह लाखों भारतीयों, खासकर युवाओं को यह विश्वास दिलाने में सक्षम हैं कि 21वीं सदी में बेहतरी के लिए वह अकेले भारत को बदल सकते हैं।


दूसरी ओर दिसंबर, 2017 से पहले राहुल गांधी ने अपने आचरण से सकारात्मक छवि नहीं बनाई थी, जिस कारण मीडिया में यह संदेश गया कि वह राजनति के लिए नहीं हैं और प्रधानमंत्री बनने लायक नहीं हैं! लेकिन कंबोडिया, म्यांमार और वियतनाम की यात्रा तथा कैलिफोर्निया व बर्केले जैसे प्रतिष्ठित अमेरिकी विश्वविद्यालयों में उन्होंने प्रभावी व्याख्यान दिया, जिससे उन्हें यह आत्मविश्वास हासिल हुआ कि वह अजेय समझे जाने वाले नरेंद्र मोदी से मुकाबला कर सकते हैं और उन्हें पराजित कर सकते हैं।

 
लगता है, उन्होंने यह निष्कर्ष निकाल लिया कि दिन-ब-दिन प्रधानमंत्री पर सीधे आक्रमण कर वह अपनी आक्रामक छवि गढ़ लेंगे। अपने भाषणों में उन्होंने मोदी का अनुकरण करना शुरू किया। वह अपने कुर्ते की बाहें चढ़ाकर मोदी की तरह सरल और सीधी भाषा में पूछते हैं, भैया, आपके बैंक खाते में पंद्रह लाख रुपये आए? आपको नौकरी मिली? आपको अपनी फसल की कीमत मिली? आपका कर्ज माफ हुआ? वन रैंक-वन पेंशन पर अमल हुआ? फिर खुद ही उसका जवाब देते हुए वह कहते हैं, नहीं, क्योंकि मोदी जी के पास आपके लिए पैसा नहीं था, परंतु अनिल अंबानी के लिए है, अडानी के लिए है! यह सहज प्रतिक्रिया आज लाखों असंतुष्ट मतदाताओं के जेहन में गूंजती है।


'सूट बूट की सरकार' के बाद 'चौकीदार बन गया चोर' की टिप्पणी ने भाजपा और सरकार को झटका दिया है, इसने मोदी के प्रसिद्ध बयान 'न खाऊंगा, न खाने दूंगा' पर धब्बा लगाया है। तथ्यों और दावों के विपरीत राहुल गांधी ने राफेल सौदे का उपयोग कम से कम शहरी आबादी में यह धारणा बनाने के लिए किया कि दाल में कुछ तो काला है।

 
विगत 20 जुलाई को संसद में चालीस मिनट का उनका भाषण ऐतिहासिक क्षण था, जब उन्होंने मोदी को परेशान होने के लिए मजबूर कर दिया। पिछले तीन महीनों में वह एक उत्साही, ऊर्जावान और आत्मविश्वास से भरे प्रतिस्पर्धी प्रचारक के रूप में उभरे हैं, जो कहीं भी समस्या पैदा होने पर स्थानीय मुद्दे उठाते हैं, सहानुभूति के साथ उन्हें व्यक्त करते हैं और इस तरह लोगों के साथ जुड़ते हैं, जो वह पहले नहीं कर पा रहे थे।


राजग सरकार से मोहभंग और मोदी के बड़े-बड़े वायदों पर अमल न होने की विसंगति ने तीन भाजपा मुख्यमंत्रियों के खिलाफ सत्ता विरोधी रुझान को मजबूत करने में मदद की और राहुल के पार्टी अध्यक्ष बनने के बाद पहली बार मतदाताओं ने फिर से कांग्रेस की तरफ देखना शुरू किया। हालांकि एक गंभीर विकल्प के रूप में परिणाम उनकी अपेक्षाओं से कम रहे।

 
लगता है कि राहुल अपने व्यक्तिगत भय से उबर चुके हैं और पूर्णकालिक राजनेता के रूप में उन्होंने सियासत में डुबकी लगा दी है, जो उनकी पार्टी के लिए अच्छा होना चाहिए। वह समर्थन हासिल करने के लिए जवानों, किसानों, छात्रों, दलितों, मुसलमानों और क्षेत्रीय राजनेताओं तक पहुंचने के साथ मंदिरों की अनगिनत यात्राएं कर हर चाल चल रहे हैं। राहुल के सिर्फ एक साल के कायांतरण ने भाजपा को उन्हें पप्पू के रूप में खारिज करने के लिए मजबूर कर दिया है। अब पप्पू न केवल नाच सकता है, बल्कि दूसरों को नचा भी सकता है!

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed