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राफेल से बदल सकती है रणनीति, मुकम्मल सुरक्षा का दोतरफा इंतजाम
Sat, 12 Oct 2019 06:07 AM IST
मारूफ रजा
मारूफ रजा
मारूफ रजा
Published by: मारूफ रजा
Updated Sat, 12 Oct 2019 06:07 AM IST
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राफेल
- फोटो : a
बीते मंगलवार को जब केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह अत्याधुनिक तकनीक से लैस पहला राफेल विमान लेने फ्रांस पहुंचे, तो इसकी कोई खास आलोचना नहीं हुई। हालांकि लोकसभा चुनाव के दौरान मोदी सरकार को राफेल सौदे को लेकर काफी आलोचना झेलनी पड़ी थी, लेकिन अब एक आम राय यह है कि राफेल हमारी रक्षा जरूरतों के हिसाब से बेहद जरूरी है। अगले तीन-चार वर्षों में 36 राफेल विमान भारतीय वायुसेना के बेड़े में शामिल हो जाएंगे।
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राफेल को दुनिया का बेहतरीन लड़ाकू विमान माना जाता है। हालांकि लॉकहिड मार्टिन जैसी अमेरिकी कंपनियां वर्षों से दावा करती आई हैं कि एफ-16 इससे बेहतर है। लेकिन हर कंपनी ऐसा दावा करती है कि उसका सामान दूसरे से बेहतर है। देश की ऑपरेशनल जरूरत के मद्देनजर वायुसेना ने कई वर्षों तक हर तरह की परिस्थिति में परीक्षण करने के बाद राफेल का चुनाव किया। इस अत्याधुनिक विमान की अन्य विमानों से तुलना करें, तो यह देश के लिए बढ़िया सौदा साबित होगा। यूपीए सरकार के दौरान राफेल का समझौता दो-तीन बिंदुओं पर अटका हुआ था। पहली बात तो यह कि सरकार का कहना था कि राफेल के जो उपकरण भारत में बनने हैं, उनका निर्माण हिंदुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड (हाल) के साथ मिलकर करना होगा। जबकि फ्रांस का कहना था कि जिस तेजी के साथ दसौ कंपनी इसका निर्माण कर सकती है, उस तेजी से हाल इसका निर्माण नहीं कर सकती। चूंकि विलंब होने पर ज्यादा श्रम और समय लगने की वजह से दसौ द्वारा निर्धारित कीमत से इसकी कीमत बढ़ जाएगी, ऐसे में, जिस कीमत पर फ्रांस इसे देने वाला था, वह उससे महंगा पड़ता। दूसरी ओर कहते हैं कि तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व रक्षा मंत्री एके एंटनी पर इसकी कीमतों को लेकर दबाव बना हुआ था। उस दौरान कीमतों को लेकर मोलभाव जारी रहा। चूंकि सरकार मोदी ने बेसिक एयरक्राफ्ट की जगह हथियारों से लैस एयरक्राफ्ट खरीदने का सौदा किया है, इसके चलते इसकी कीमत अब प्रति विमान 1,670 करोड़ रुपये पड़ी। इसके अलावा इसकी खरीद का सौदा करते वक्त मेक इन इंडिया का भी ख्याल रखा गया है।
आम तौर पर कोई भी बुनियादी सौदा 18 विमानों का होता है। उसके बाद उसका विस्तार किया जाता है। लेकिन भारत ने 36 विमान विमानों का सौदा इसलिए किया, क्योंकि वायुसेना चीन और पाकिस्तान, दोनों सीमाओं को संवेदनशील मानती है। बहुत संभव है कि इस विमान को अंबाला के आसपास तैनात किया जाए, जो पाकिस्तान की सीमा के पास होगा। कुछ हद तक 18 राफेल विमान हमारी जरूरतें पूरी कर सकते हैं, इसके बावजूद हमें अतिरिक्त विमान चाहिए। राफेल अत्याधुनिक हथियारों से लैस है, जो चीन-पाकिस्तान के संयुक्त उत्पाद जेएफ-17 थंडर से बहुत आगे है। हवा में इसका मुकाबला करने के लिए दुश्मन को चार-पांच लड़ाकू विमानों का उपयोग करना पड़ेगा। राफेल में अति आधुनिक मिटिओर और स्काल्प मिसाइलें तैनात होंगी, जो दुश्मनों के लक्ष्य को काफी गहराई तक भेदने में कारगर साबित होंगी। इसीलिए इसे भारतीय वायुसेना के लिए गेमचेंजर माना जा रहा है। यह दुश्मन के रडार की पकड़ में नहीं आ सकता है। जिन लड़ाकू विमानों का वायुसेना ने बालाकोट हमले में उपयोग किया था, वह एक-दो पीढ़ी पुराना है। ध्यान देने वाली बात यह है कि अगर उन विमानों ने बालाकोट हमले को सफलतापूर्वक अंजाम दिया, तो इसके आने के बाद हमारी मजबूती और बढ़ जाएगी। इसके मुकाबले का कोई लड़ाकू विमान भारत या उसके पड़ोसी देशों के पास नहीं है। इसके बेड़े में सत्तर प्रतिशत विमान हमेशा ऑपरेशन मोड में रह सकते हैं। अब सेना विमानों की संख्या के बजाय क्षमता और गुणवत्ता पर ज्यादा ध्यान दे रही है, यानी दुश्मन जिस लक्ष्य को पांच विमान लगाकर भेदता है, उसे हम एक विमान से भेद सकते हैं। चूंकि अभी वायुसेना में बड़ी संख्या में पुराने और जर्जर विमान मौजूद हंै, इसलिए वायुसेना ने 126 विमानों की मांग की थी। इसके लिए अमेरिका, रूस, ब्रिटेन जैसे देशों के लड़ाकू विमानों की बात चल रही थी। पिछले 17 वर्षों से विमान खरीदने की बात चल रही थी, पर बात बनी नहीं। मोदी सरकार के आने के बाद सरकार और सेना ने इस पर कदम आगे बढ़ाए गए। आने वाले दिनों में इन हथियारों की अहमियत बढ़ेगी। वायुसेना के वरिष्ठ अफसरों का कहना है कि इन विमानों के बिना वायुसेना, थल सेना जैसी बन जाती है। पिछले महीने सऊदी अरब में ईरान द्वारा किए गए ड्रोन हमले से यह साबित हो गया कि सऊदी अरब के पास इतनी क्षमता नहीं थी कि वह एक अत्याधुनिक ड्रोन के हमले से बच सके। इन विमानों के आने के बाद संभव है कि वायुसेना की रणनीति में बदलाव हो, क्योंकि लड़ाइयां केवल हवाई जहाजों से नहीं लड़ी जाती हैं।
अत्याधुनिक उपकरणों से लैस ऐसे विमान लड़ाइयों को रुकवाने का काम करते हैं। क्योंकि हमला करने से पहले दुश्मन सोचता है कि सामने वाले के पास कितने सशक्त हथियार मौजूद हैं। राफेल के अंदर एंटी-जैमिंग तकनीक है, यानी कोई और इसे जाम की कोशिश करेगा, तो यह उसका मुकाबला करेगा। अभी वायुसेना की स्थिति थोड़ी कमजोर है, उसे विमानों के अलावा अन्य अत्याधुनिक हथियारों की जरूरत है, जिससे वह और मजबूत हो सकें। अपने यहां बने लड़ाकू विमानों को भी अत्याधुनिक उपकरणों से लैस करने की जरूरत है, ताकि गुणवत्ता के साथ संख्या के मामले में भी हम शक्तिशाली बन सकें। मुझे नहीं लगता कि इन 36 विमानों की आपूर्ति होने के बाद वायुसेना को अगले पांच-दस वर्षों में अन्य लड़ाकू विमानों की जरूरत महसूस होगी।
फ्रांस ऐसा देश है, जो शुरू से ही भारत के हित में खड़ा रहा है। वैश्विक जगत में भारत के रणनीतिक साझेदार 20-22 देश हैं, इनमें पहला समझौता भारत ने फ्रांस के साथ किया था। अमेरिका अब भी भारत को ऐसा उपकरण नहीं देगा, जिससे वह किसी पर हमला कर सके। वह केवल बचाव करने वाले हथियार देगा। अमेरिका चाहता है कि उसकी तकनीक लेने के बाद आप उस पर निर्भर हो जाएं, जबकि फ्रांस ऐसा नहीं करता। फ्रांस के सहयोग से मुंबई की मझगांव गोदी में स्कारपीन पनडुब्बियां बनाने का काम चल रहा है। परमाणु ऊर्जा क्षेत्र में भी उसका सहयोग मिल रहा है। फ्रांस संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा समिति का स्थायी सदस्य है और कश्मीर जैसे कई मुद्दों पर वह भारत के पक्ष में खड़ा रहा है। कुछ समय से रूस से हमारे रिश्तों पर थोड़ा असर पड़ा है, ऐसे में अगर रूस हथियार देने से मना करता है, तो वे जरूरतें फ्रांस पूरी करेगा।