अमेरिकी समाज में नस्लीय हिंसा
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अमेरिका के कंसास में भारतीय इंजीनियर श्रीनिवास कुचिभोतला की निर्मम हत्या से केवल भारतीय या भारतीय मूल के अमेरिकी ही नहीं, अन्य देशों के प्रवासी भी डर गए हैं। अमेरिका में हिंसा और बंदूक की संस्कृति जिस कदर फैल चुकी है, उसमें सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है। हत्या तो हर हाल में घृणित है, किंतु नस्ल एवं रंग के नाम पर की जाने वाली हत्या समाज का वीभत्स चेहरा उजागर करती है। हैरानी की बात है कि इस घटना के पांच दिन बाद ट्रंप ने अपनी चुप्पी तोड़ी। संतोष की बात यह है कि एक अमेरिकी श्वेत इयान ग्रिलॉट ने भारतीयों को बचाने की पूरी जी-जान से कोशिश की, जिसमें उसे स्वयं भी गोली लगी।
जो हुआ, वह नया नहीं है। ऐसा वर्षों से हो रहा है। गत वर्ष जनवरी में बराक ओबामा भारत को धार्मिक सहिष्णुता का पाठ पढ़ाते हुए भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 की याद दिला रहे थे कि धार्मिक स्वतंत्रता हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है। लेकिन यह क्रूर विडंबना नहीं तो और क्या है कि ओबामा अपने ही देश में अश्वेतों पर हो रहे हमले को रोक पाने में नाकामयाब रहे, जबकि वह स्वयं अश्वेत हैं। 2015 में वहां अश्वेतों के चर्चों पर लगातार हमले होते रहे।
जनवरी, 2015 में उत्तरी अल्बामा में पुलिस द्वारा सुरेश भाई पटेल पर किए गए हमले से उपजा आक्रोश समाप्त भी नहीं हुआ था कि न्यूजर्सी में भारतीय-अमेरिकी व्यापारी अमित पटेल की हत्या कर दी गई। इस सबसे अश्वेतों की सुरक्षा के लेकर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। सुरेश भाई पर दो पुलिसकर्मियों ने हमला किया। ये घटनाएं अगस्त 2014 में 18 वर्षीय माइकल ब्राउन की एक गोरे पुलिस अधिकारी डैरेन विल्सन द्वारा की गई हत्या की याद दिलाती हैं। विल्सन को ग्रैंड जूरी ने दोषमुक्त कर दिया। हालांकि सुरेश भाई बच गए, पर उन्हें लकवा मार गया। इस सबसे पुलिस की भूमिका और अश्वेतों की सुरक्षा पर गंभीर बहस चल रही है।
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने टेनेस बनाम गार्नर (1985) में व्यवस्था दी थी कि मारक बल का प्रयोग करने के पहले ‘वस्तुगत औचित्य’ संबंधी दिशा-निर्देश का पालन होना चाहिए। लेकिन इससे बर्बर पुलिस वालों पर कोई लगाम नहीं लगी है। टेनेस बनाम गार्नर मामले में ‘वस्तुगत औचित्य’ को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय से मानवाधिकार प्रेमियों की उम्मीद जगी कि इससे नृशंस पुलिसवालों पर रोक लगेगी, परंतु ऐसा नहीं हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने निर्णय दिया कि मारक बल का प्रयोग तभी किया जा सकता है, जब अधिकारी या दूसरे लोगों पर खतरा हो, किंतु यह वस्तुगत आधार पर उचित होना चाहिए। सवाल यह है कि यह निर्णय कौन करेगा कि क्या उचित है। कई बार अदालतें भी अधिकारियों के पक्ष को सही ठहराती हैं, भले ही वैज्ञानिक प्रमाण उल्टा बोल रहे हों। यह बर्कले की उस घटना से साबित होता है, जब पुलिस अधिकारी रॉबर्ट पीक्यूटोस्की एवं कीथ कीर्जकोस्की ने वर्ष 2000 में अर्ल मुर्दे तथा रोनाल्ड बीजली को इस डर से गोली मार दी कि पीड़ित की कार उनकी तरफ तेजी से लुढ़क रही थी। फोरेंसिक जांच से यह पक्का हो गया कि कार उनकी तरफ नहीं गई थी। फिर भी ग्रैंड जूरी ने उन्हें दोषमुक्त कर दिया।
अमेरिका का अनुभव बताता है कि अदालती निर्देशों का पालन नहीं होता। अमेरिकी लोकतंत्र का जन्म 1620 में हुए ‘मेफ्लॉवर कौम्पैक्ट’ की स्थापना में माना जाता है। इसके साथ ही उपनिवेशवादियों ने उचित एवं समान कानून बनाने पर हुए समझौते पर हस्ताक्षर किए, परंतु आज उन विचारों एवं आदर्शों पर भेदभाव के काले बादल छाए हुए हैं।