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संघीय व्यवस्था पर उठते सवाल

Mon, 07 Jan 2013 11:25 AM IST
Updated Mon, 07 Jan 2013 11:25 AM IST
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questions raise on federal system

हाल ही में संपन्न राष्ट्रीय विकास परिषद की बैठक हालांकि जयललिता के वॉक आउट के कारण चर्चित रही, लेकिन कुछ ऐसे मुद्दे इस बैठक से उभरे, जिन पर ध्यान देने की जरूरत है। देश में संविधान के मुताबिक संघीय शासन व्यवस्था है और राज्यों में राज्य सरकारें व केंद्र शासित प्रदेशों में अन्य प्रकार से चुनी गई सरकारें काम करती हैं। दुनिया के कुछ अन्य देशों में भी, जिनमें अमेरिका शामिल है, संघीय व्यवस्था लागू है, पर अमेरिकी राज्य संघ से अलग होना तक तय कर सकते हैं, जबकि भारत में राज्य ऐसा नहीं कर सकते।

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देश के सभी राज्य एक समान विकसित नहीं हैं। लेकिन गरीब और अल्प विकसित राज्यों के लोगों में भी विकास की आकांक्षाएं हैं। अमीर राज्य अपनी ऊंची आय के बल पर ज्यादा राजस्व एकत्र करते हैं और वहां की सरकारें बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर और बेहतर नागरिक सुविधाएं उपलब्ध कराने में सफल हो पाती हैं। इन राज्यों के लोग ऊंची आय के कारण तो अच्छा जीवन जीते ही हैं, बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर, नागरिक सुविधाओं और सब्सिडियों के चलते वहां का माहौल अधिक समृद्ध रहता है। जबकि गरीब राज्यों में आमदनी तो कम है ही, राजस्व के अभाव के कारण वहां नागरिक सुविधाएं भी पर्याप्त नहीं हैं।
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गौरतलब है कि बारहवीं पंचवर्षीय योजना के संदर्भ में राष्ट्रीय विकास परिषद की यह बैठक बुलाई गई थी। यह योजना एक अप्रैल, 2012 से शुरू हो चुकी है, लेकिन राज्यों के हिस्से की राशि, योजना के प्रारूप और विभिन्न मद्दों पर खर्च के संदर्भ में अब भी कई अनसुलझे सवाल बाकी हैं। दरअसल विभिन्न राज्य हमेशा से ही अपने लिए ज्यादा राशि के आवंटन की मांग करते रहे हैं। यही मुद्दा इस सम्मेलन में भी छाया रहा। मसलन, बिहार ने अपने लिए विशेष पैकेज की मांग की, तो पश्चिम बंगाल सरकार ने राज्य को ऋण मुक्त करने की गुजारिश की।
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देश का संविधान केंद्र के लिए ज्यादा संसाधन सुनिश्चित करता है और राज्यों के हिस्से कम संसाधन आते हैं। आयकर, निगम कर, उपहार कर, सीमा कर, केंद्रीय उत्पाद शुल्क और सेवा कर जैसे ज्यादा कमाऊ कर केंद्र द्वारा लगाए जाते हैं। जबकि राज्य सरकारों को बिक्री कर, उत्पाद शुल्क और स्टांप शुल्क से सर्वाधिक आमदनी होती है। वर्ष 2011-12 में केंद्र सरकार को करों के जरिये 10,77,612 करोड़ रुपये की आमदनी हुई, तो राज्य सरकारों को मात्र 5,39,590 करोड़ रुपये प्राप्त हुए।

राज्यों को चूंकि विभिन्न नागरिक सुविधाओं और विकास कार्यों पर भारी खर्च करना पड़ता है, इसलिए उनकी जरूरतें केंद्र सरकार की तुलना में कहीं ज्यादा है। ऐसे में संविधान में वित्त आयोग की व्यवस्था की गई है। गौरतलब है कि 2010 से 2015 के लिए तेरहवें वित्त आयोग ने केंद्र के करों का 32 प्रतिशत राज्यों को देना निश्चित किया है। इसके अलावा राज्यों को केंद्र की ओर से कुछ अनुदान भी दिए जाते हैं, लेकिन विकास की जरूरतों के संदर्भ में ये पर्याप्त नहीं हैं।

विकास को केंद्र में रखते हुए पंचवर्षीय योजना में विभिन्न राज्यों को विविध कार्यों के लिए राशि आवंटित की जाती है। तथ्य यह है कि बिहार, झारखंड, ओडिशा जैसे राज्यों के त्वरित विकास पर खास ध्यान देने की जरूरत है, लेकिन दुर्योग से इन राज्यों में विपक्षी पार्टियों की सरकारें हैं। सही हो या गलत, पर विपक्ष शासित राज्य सरकारों द्वारा यह माना जाता है कि उनके साथ भेदभाव हो रहा है। इससे भी इनकार नहीं कि गरीब राज्यों को उतना धन नहीं मिल पाता, जितना उनके विकास के लिए जरूरी है।


बल्कि वित्त आयोग जैसी सांविधानिक संस्था भी गरीब राज्यों को करों के हिस्सों और अनुदानों के माध्यम से पर्याप्त धन उपलब्ध नहीं करवा पाई, बल्कि तेरहवें वित्त आयोग ने एक ऐसा फार्मूला लागू किया, जिससे गरीब राज्यों को भारी नुकसान हुआ। जाहिर है कि गरीब राज्य अपनी विकास की आकांक्षाओं के चलते वह राजकोषीय अनुशासन नहीं अपना पाए, जिसके चलते उन्हें कम हिस्सा मिला। एक मोटे अनुमान के अनुसार, झारखंड को पिछले पांच वर्षों में 10,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ, तो ओडिशा को 5,000 करोड़ रुपये का। इन विसंगतियों को दूर करने की ज्यादा जरूरत है।

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