भारत रत्न की गरिमा पर सवाल

हेमंत शर्मा Updated Mon, 25 Nov 2013 08:29 PM IST
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Questions on the dignity of Bharat Ratna

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कैसा लगेगा आपको, जब ‘भारत रत्न’ ताकत बढ़ाने का पेय बेचेंगे? जब ‘भारत रत्न’ यह बताएंगे कि किस निजी कंपनी की बीमा पॉलिसी आप खरीदें? जब ‘भारत रत्न’ बहुराष्ट्रीय कंपनियों की उपभोक्ता सामग्री बेचेंगे? जब ‘भारत रत्न’ तेल, साबुन, जूते, कपड़े और कोला कंपनियों के शीतल पेय का विज्ञापन करेंगे? सचिन तेंदुलकर को मिले ‘भारत रत्न’ से ये खतरे एक साथ खड़े हो गए हैं।
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हमें नहीं भूलना चाहिए कि खिलाड़ी आएंगे और जाएंगे। पर क्रिकेट और समाज की निरंतरता बनी रहेगी। सचिन को भारत रत्न देने के ऐलान के साथ एक नया विवाद भी छिड़ गया। विचारवान जनता को हॉकी के जादूगर ध्यानचंद और अटल बिहारी वाजपेयी के नाम याद आने लगे।
सचिन तेंदुलकर समूची दुनिया के रत्न हैं। वह सर्वकालीन महान खिलाड़ी हैं। उनकी सादगी, विनम्रता, शालीनता और समर्पण का कोई सानी नहीं है। ऐसा रत्न शताब्दियों में जन्मता है। लेकिन उन्हें यह सम्मान तब देना चाहिए था, जब वह कम से कम उत्पादों के ‘एन्डोर्समेंट’ बंद कर चुके होते।
वह अपना जीवन क्रिकेट की नई पीढ़ी को बनाने में लगाते, और रेस्टोरेंट के धंधे और दूसरे कारोबार से बाहर आते। क्योंकि जिस बाजार के दबाव में उन्हें यह सम्मान मिला, वही बाजार अब ‘भारत रत्न’ को भी भुनाएगा। इसी बाजार ने पहले क्रिकेट को धर्म बनाया; फिर उस धर्म का सचिन को भगवान। ताकि इस भगवान के जरिये पैसा कमाया जा सके। अब यह सवाल है ‘भारत रत्न’ बड़ा है या बाजार जनित ‘भगवान’?

शायद यही वजह थी कि ‘भारत रत्न’ उम्र के ढलते पड़ाव पर लोगों को दिया जाता रहा, ताकि व्यक्ति अपनी तमाम सक्रियता छोड़ दे और उसके विवादों में फंसने की गुंजाइश न रहे। लता मंगेशकर को भी यह सम्मान तब दिया गया, जब उन्होंने गाना लगभग बंद कर दिया था।  हालांकि सचिन को यह सम्मान देने के पीछे की नीयत भी बहुत साफ नहीं है।

दरअसल इस महान खिलाड़ी की लोकप्रियता पर सवार हो अपना बेड़ा पार कराने की सरकारी मंशा ज्यादा है। अगर अगले बरस आम चुनाव न होते, तो क्या सचिन को भारत रत्न देने का फैसला लिया जाता? अभी छह महीने पहले गृह मंत्रालय यह लिखकर दे चुका था कि सचिन को भारत रत्न नहीं दिया जा सकता। फिर जब यह फैसला लिया ही जा रहा था, तब सरकार ने ध्यानचंद को क्यों भुला दिया? मनमोहन सिंह दस साल तक अपने सलाहाकार रहे प्रो. राव को तो इस सम्मान के लिए तो याद रखते हैं, पर होमी जहांगीर भाभा को नहीं।

वजह यही है कि ध्यानचंद के पीछे बाजार नहीं है। नई पीढ़ी शायद उन्हें जानती भी न हो। 15 अगस्त, 1936 को बर्लिन ओलंपिक में मेजर ध्यानचंद ने हिटलर के सामने जर्मनी को 9-1 से रौंदा था। इस जीत के बाद हिटलर ने ध्यानचंद को बुलाकर उन्हें जर्मनी के लिए खेलने के लिए कहा, और यह भी कहा कि उन्हें मुंहमांगी कीमत मिलेगी। ध्यानचंद ने प्रस्ताव ठुकराते हुए कहा था कि वह पैसे के लिए नहीं, देश के लिए खेलते हैं। उनके दो दशक के करियर में भारत एक भी अंतरराष्ट्रीय मुकाबला नहीं हारा। ध्यानचंद हमारे इतिहास के रत्न हैं। मनमोहन के भारत रत्न नहीं।

एजेंसियां कहती हैं रिटायरमेंट के बाद सचिन के विज्ञापनों पर कोई असर नहीं होगा, बल्कि उनके ‘एन्डोर्समेंट’ बढ़ेंगे, क्योंकि वह अब भारत रत्न हैं। उन्होंने सिर्फ विज्ञापनों से अब तक पांच सौ करोड़ रुपये कमाए हैं। क्रिकेटरों में सबसे ज्यादा संपत्ति के मालिक हैं वह। वेल्थ एक्स की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक सचिन की कुल संपत्ति एक हजार करोड़ रुपये से ऊपर है। भारतीय क्रिकेट को आत्मविश्वास और लोकप्रियता दिलाने में सुनील गावस्कर और कपिल देव का कम योगदान नहीं है। पर वे पिछड़ते हैं, तो बाजार के ब्रांड मूल्य पर।

सरकार की लोकप्रियता निचले तले पर है, और सचिन की आकाश छू रही है। तो क्यों न इस वातावरण से कुछ सद्भावना कमा लें। इसी सोच से मनमोहन सिंह ने सम्मान का ऐलान कर बहती गंगा में हाथ धो लिया। पर क्या भारत रत्न का फैसला लोकप्रियता, बाजार और मीडिया के दबाव में लिया जाएगा!
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