तेरी रहबरी का सवाल है
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कांग्रेस खत्म हो चुकी है; कांग्रेस अमर रहे! देश की सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के भविष्य को लेकर भारत में चिंता और क्षोभ, दोनों है। जब कांग्रेस किसी विधानसभा चुनाव में मुंह के बल गिरती है, तो 'कांग्रेस मुक्त भारत' का नारा देने वाले नरेंद्र मोदी और भाजपा, दोनों की उत्साहित टिप्पणी होती है, देखा, हमने कहा था न! मौजूदा स्थिति में कांग्रेस के लिए एकमात्र आश्वस्ति की बात यही है कि उसका हाल इससे बदतर नहीं हो सकता। हाल ही में हुए महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में मुंबई के उस मालाबार हिल विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस के उम्मीदवार की जमानत जब्त हो गई, जहां के ग्वालिया टैंक में 22 दिसंबर, 1885 को 72 लोगों ने मिलकर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का गठन किया था!
नई दिल्ली स्थित कांग्रेस के मुख्यालय, 24, अकबर रोड, इस समय आए दिन हंगामे का गवाह बनता है। कांग्रेस कार्यसमिति की नियमित बैठकें न होने के कारण दिग्विजय सिंह और पी चिदंबरम जैसे वरिष्ठ नेतागण पार्टी के बारे में अपने विचार मीडिया के जरिये ही व्यक्त करते हैं। कांग्रेस के संगठन चुनाव अगले साल होने वाले हैं, और पार्टी में नई जान फूंकने के लिए अब कुछ न कुछ करने की जरूरत है। पार्टी के भीतर यह आम सोच है कि राहुल गांधी को कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव लड़ना चाहिए और लोकतांत्रिक तरीके से अध्यक्ष बन जाना चाहिए। ठीक उसी तरह, जिस तरह सोनिया गांधी वर्ष 1999 में जितेंद्र प्रसाद को पराजित कर पार्टी अध्यक्ष बनी थीं, और सीताराम केसरी ने वर्ष 1997 में पार्टी अध्यक्ष के चुनाव में शरद पवार और राजेश पायलट, दोनों को हराया था।
पी चिंदबरम और दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं के हाल की टिप्पणियों को देखें, तो यह शीशे की तरह स्पष्ट हो जाता है कि सोनिया गांधी अब सक्रिय राजनीति से संन्यास लेने के बारे में बेहद गंभीरता से सोचने लगी हैं। करीब दो वर्ष बाद सोनिया गांधी सत्तर वर्ष की हो जाएंगी। वह निरंतर इस कोशिश में हैं कि समय पर सार्वजनिक जीवन से अलग होकर एक मिसाल कायम करें। इस तरह की विपरीत परिस्थिति में कांग्रेस के पास तीन विकल्प हैं- पहला, अपने नेता के तौर पर वह गांधी परिवार से बाहर के किसी कांग्रेसी को वह अपने नेता के तौर पर स्वीकार करे, जिस ओर पिछले दिनों पी चिदंबरम ने एक इंटरव्यू में संकेत भी किया था, दूसरा, राहुल गांधी को अपने नेता के रूप में स्वीकार करे, पार्टी के अधिकांश लोग यही चाहते हैं, और तीसरा, प्रियंका गांधी को अनुरोध करे कि वह जर्जर हो चुकी इस राजनीतिक पार्टी की कमान संभालें।
इनमें से गांधी परिवार के बाहर के किसी को पार्टी के नेता के तौर पर स्वीकार करने के विकल्प के बारे में सोचना ही बेकार है। यह मान लेने का मतलब ही नहीं है कि प्रांतीय या राष्ट्रीय स्तर के किसी कांग्रेसी को पार्टी का अध्यक्ष बन जाने पर वैसा ही सम्मान मिलेगा, जैसा गांधी परिवार को या फिर भारतीय जनता पार्टी में नरेंद्र मोदी को मिलता है। न ही गांधी परिवार से बाहर के किसी पार्टी अध्यक्ष से सोनिया, राहुल या प्रियंका जैसे करिश्मे की कभी उम्मीद की जाएगी। कांग्रेस के लिए ऐसी स्थिति सिर्फ तभी आएगी, जब गांधी परिवार सामूहिक रूप से सक्रिय राजनीति से अलग होने का फैसला लेगा।
पर राहुल गांधी का कांग्रेस की कमान संभाल लेने का विकल्प भी खतरे से भरा हुआ है। राहुल के साथ समस्या यह है कि उनमें आम कांग्रेसियों को प्रेरित कर पाने की वैसी क्षमता नहीं है। इसके अलावा पार्टी के पुराने दिग्गज और बीच की स्थिति के लोग उनकी उस नेतृत्व शैली से चौकन्ने हैं, जो उदासीनता और अव्यावहारिक विचारों का मिला-जुला रूप है। कांग्रेस के भीतर जो सबसे बड़ा सवाल इन दिनों चल रहा है, वह यह है कि राहुल गांधी अपने तौर-तरीके में बदलाव लाने के लिए कितने तैयार हैं और वह आम कांग्रेसियों की उम्मीदें किस तरह पूरी कर सकते हैं।
तुलनात्मक रूप से प्रियंका वाड्रा की स्वीकार्यता ज्यादा है। लेकिन वरिष्ठ कांग्रेसी मानते हैं कि वह पार्टी की कमान नहीं संभालने वालीं। इसके पीछे वे तीन वजहें भी गिनाते हैं। एक तो यही कि नरेंद्र मोदी की लहर अभी कुछ साल तक बनी रहने वाली है। ऐसे में, प्रियंका वाड्रा कांग्रेस का नेतृत्व संभालने के लिए सामने आएंगी, तो उनका आकर्षण और करिश्मा, दोनों बेअसर हो जाएंगे। दूसरी बात यह कि राहुल कांग्रेस का प्रियंका कांग्रेस में बदलने की बात करना जितना आसान है, व्यावहारिकता में ऐसा हो पाना उतना ही कठिन। तीसरी वजह यह कि रॉबर्ट वाड्रा से जुड़े विवाद के मुद्दे इतने प्रबल हैं कि उनमें प्रियंका द्वारा हासिल करने वाली तमाम उपलब्धियों को फीका कर देने की क्षमता है।
ऐसी मुश्किल परिस्थितियों में, राहुल गांधी को चाहिए कि वह आत्मविश्लेषण करें और खुद को बदली हुई स्थितियों के मुताबिक तैयार करें। अगर राहुल सचमुच उन दस करोड़ मतदाताओं की उम्मीदें पूरी करना चाहते हैं, जिन्होंने इस साल हुए लोकसभा चुनाव में कांग्रेस को वोट दिए थे, तो उन्हें तुलनात्मक रूप से अधिक सक्रिय और पार्टी मंचों, संसद, मीडिया, सोशल मीडिया आदि में ज्यादा मुखर होना ही पड़ेगा। अपने आपको साबित करने के लिए उन्हें अपने सक्रिय सामाजिक जीवन और विदेशी दौरों को कम तो करना ही पड़ेगा, अपनी चुप्पी भी तोड़नी पड़ेगी। अगर सिर्फ और सिर्फ राहुल गांधी देश भर के लाखों कार्यकर्ताओं को प्रेरित कर पाने में सफल हों, तो निष्पंद दिखने वाली कांग्रेस उठ खड़ी हो सकती है। हर स्तर के कांग्रेसी नेतृत्व से फिलहाल यही पूछ रहे हैं, तू इधर उधर की बात न कर, ये बता काफिला क्यों लुटा, मुझे रहजनों से गिला नहीं, तेरी रहबरी का सवाल है।
(वरिष्ठ पत्रकार और 24, अकबर रोड के लेखक)