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कादरी क्रांति या तख्तापलट की आहट!

Tue, 15 Jan 2013 10:44 PM IST
पाकिस्तानी अखबार डॉन का विश्लेषण
पाकिस्तानी अखबार डॉन का विश्लेषण Updated Tue, 15 Jan 2013 10:44 PM IST
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qadri wind of revolution or coup
तकरीबन एक महीने पहले ताहिर-उल कादरी कनाडा में चैन से अपनी जिंदगी बसर कर रहे थे। इस्लाम से जुड़ी चैरिटी के अपने कामों में डूबे हुए थे। पर, पिछले तीन हफ्तों के दौरान काफी कुछ बदल गया है। वह वतन वापसी कर चुके हैं और चुनाव सुधारों की आवाज की अगुवाई कर रहे हैं। वह कहते हैं कि उनका एजेंडा सिर्फ लोकतांत्रिक चुनाव सुधारों का है। कानून तोड़ने वालों को कानून निर्माता बनाने की मुखालफत करने वाले कादरी के मंच ने भ्रष्ट राजनेताओं को पद से हटाने की न्यायपालिका की मुहिम को नया बल दिया है।
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लेकिन उनके इस अकस्मात हमले से इस आशंका को भी बल मिला है कि चुनाव को टालने के उद्देश्य से सेना कहीं उनका इस्तेमाल तो नहीं कर रही है। सेना वहां दशकों तक सत्ता पर काबिज रही है। इस मुहिम के जरिये वह जनरल के मनमाफिक काम करने वाली एक आज्ञाकारी अंतरिम प्रशासन स्थापित कर सकते हैं। पूरी दुनिया एक मौलवी का बदलाव लाखों की भीड़ की अगुवाई करने वाले शख्स के रूप में देख रही है।

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अगर पाकिस्तान में समय पर चुनाव हो जाते हैं, तो सैन्य शासन से निकलकर नागरिक सरकार की स्थापना को मजबूती मिलेगी, क्योंकि पहली बार एक ऐसी सरकार पांच साल का कार्यकाल पूरा करेगी और इसके बाद मतदान के जरिये एक नई सरकार का गठन होगा। पश्चिमी देशों का मानना है कि 18 करोड़ की आबादी वाले देश में युवाओं को रोजगार देने के लिए जूझती अर्थव्यवस्था और आतंकवाद की चुनौतियों से त्रस्त देश में शांतिपूर्ण चुनाव से लोकतंत्र मजबूत होगा।
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पिछले हफ्ते बम धमाकों में 100 से ज्यादा लोगों के मारे जाने के हालात के बीच कादरी की क्रांति के समय और उनकी मंशा पर अनेक सवाल उठते हैं। कादरी जनरल के इशारे पर काम कर रहे हैं, इस आशंका को तब और बल मिला जब उन्होंने तालिबान के खिलाफ लड़ाई के लिए सेना की तारीफ की। साथ ही यह भी कहा कि एक कार्यवाहक सरकार के गठन में सेना सलाहकार की भूमिका निभा सकती है। वैसे वह सेना से किसी तरह के संबंध को खारिज करते हुए जोर देते हैं कि उनका प्रदर्शन शांतिपूर्ण होगा। यही नहीं, सेना ने भी इसी महीने एक वक्तव्य जारी करके कादरी को समर्थन देने की बात का खंडन किया है।

पर तारीख के पन्नों में दर्ज है कि 1999 में तख्तापलट करके सत्ता पर काबिज होने वाले पूर्व सैन्य प्रमुख व पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ के समर्थन में कादरी की अहम भूमिका थी। 2006 में कनाडा जाने से पूर्व मुशर्रफ के कार्यकाल में वह नेशनल एसेंबली में भी रहे। कादरी मुख्यतः राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की सरकार के खिलाफ आक्रोश का फायदा उठाने की कोशिश कर रहे हैं। उनकी मुख्य मांग है कि सरकार चुनावों से पूर्व चुनाव सुधारों से जुड़े कई कानूनों को अमली जामा पहनाए।

उनकी मांगों में भ्रष्टाचार के मामलों में संदिग्ध राजनेताओं को हटाने संबंधी संविधान में मौजूदा प्रावधान को न्यायपालिका द्वारा सख्ती से लागू करने की बात भी शामिल है। वह कहते हैं कि इस कानून से कई राजनेताओं के सांसद बनने का रास्ता बंद हो जाएगा। सत्ताधारी पीपीपी और उसकी प्रतिद्वंद्वी पीएमएल-एन तय वक्त पर चुनाव कराने को लेकर एकमत हैं। साथ ही वे कादरी के उस एजेंडे को स्वीकार करती नहीं दिख रही हैं, जिसे कुछ विशेषज्ञ पाकिस्तान के संविधान में प्रावधानों के साथ संघर्ष बता रहे हैं।


लाहौर में 23 दिसंबर को तकरीबन दो लाख समर्थकों को जुटाकर कादरी ने अपने इस्लामिक फाउंडेशन की पहुंच का भी पूरा इस्तेमाल किया है। पाकिस्तान के साथ-साथ कई अन्य देशों में भी उनका संगठन सक्रिय है। पर अपने धार्मिक आधार से अलग उन्हें अभी मजबूत समर्थन हासिल करना होगा। पिछले सप्ताह उनकी सीमाएं उस समय स्पष्ट हो गईं, जब वाणिज्यिक राजधानी कराची में प्रभाव रखने वाले एक धर्मनिरपेक्ष दल एमक्यूएम ने इस्लामाबाद में कादरी की विशाल रैली को समर्थन देने की अपनी शुरुआती योजना से हाथ खींच लिया। नेशनल एसेंबली के सदस्य के रूप में इस्तीफे के बाद उनकी प्रासंगिकता खत्म हो गई थी। अब पाकिस्तान नागरिकता के साथ-साथ उन्होंने कनाडा की भी नागरिकता ले ली है, जिसका मतलब है कि वह खुद चुनाव नहीं लड़ सकते।

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