संविधान बदलने की तैयारी में पुतिन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
एक बार फिर रूस व्लादिमीर पुतिन की फिरकी में उलझ गया। अपने सबसे भरोसेमंद साथी और प्रधानमंत्री दिमित्रि मेदवेदेव और उनके समूचे मंत्रिमंडल का इस्तीफा लेने के बाद पुतिन चक्रवर्ती मुद्रा में नजर आ रहे हैं। वह फिर संविधान में बड़ी तब्दीली करना चाहते हैं। पर इस बार इस राजनीतिक कदम से रूस के लोग तनिक आश्चर्य में हैं। पुतिन ने साफ-साफ कहा कि मंत्रिमंडल लोगों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाया। उनके इस कथन से दो तथ्य स्पष्ट होते हैं। एक तो यह कि अपने तीन दशक से भी अधिक पुराने सहयोगी पर उन्हें विश्वास नहीं रहा, और दूसरा यह कि नए प्रधानमंत्री के तौर पर उन्होंने मिखाइल मिशुस्तिन जैसे नए चेहरे को सामने लाकर लंबी पारी खेलने की तैयारी कर ली है। हालांकि मिखाइल को प्रधानमंत्री बनाने से पहले उन्हें संसद की मंज़ूरी लेनी होगी। पुतिन के लिए यह चुटकी बजाते ही कर देने वाला काम है। मेदवेदेव की छवि एक उदार राजनेता की है। उन्होंने रूस की आर्थिक और औद्योगिक प्रगति की रफ्तार तेज करने की दिशा में बड़ा योगदान किया है। उन पर भ्रष्टाचार के आरोप तो लगे, पर साबित नहीं हुए।
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
सत्ताईस साल पुराना संविधान बदलने के लिए पुतिन देश भर में जनमत संग्रह कराएंगे। उनके पक्ष में यह जनमत संग्रह आया, तभी वह संविधान बदल सकेंगे। पुतिन ने रूस में अपनी एक चमत्कारिक छवि गढ़ी है। इसलिए नहीं लगता कि उन्हें आने वाले दिनों में कोई समस्या हो सकती है। इस तरह पुतिन-मेदवेदेव की जोड़ी भले ही टूटी, पर अब भी पुतिन महानायक के रूप में प्रतिष्ठित रहेंगे। वर्तमान संविधान के मुताबिक, एक व्यक्ति लगातार दो बार से अधिक राष्ट्रपति नहीं रह सकता। पुतिन 2000 से 2008 तक दो बार राष्ट्रपति रहे। तब राष्ट्रपति का कार्यकाल चार साल का होता था। वर्ष 2008 में उन्होंने अपने साथी मेदवेदेव को राष्ट्रपति बनवाया। वह मेदवेदेव का प्रचार कर रहे थे और प्रचार में मेदवेदेव यह वादा कर रहे थे कि अगर वह जीते, तो पुतिन को प्रधानमंत्री बनाएंगे। ऐसा ही हुआ। और जब 2012 में मेदवेदेव ने इस पद पर कार्यकाल पूरा किया, तो पुतिन ने फिर राष्ट्रपति की कुर्सी की शोभा बढ़ाई। छह साल बाद 2018 में उन्होंने फिर राष्ट्रपति का चुनाव जीता। इस तरह उन्हें 2024 तक तो कोई खतरा नहीं है। इसके बाद की पारी खेलने के संकेत उन्होंने राष्ट्र के नाम अपने संबोधन में दे दिए हैं।
महानायक के रूप में खुद को स्थापित करने वाले पुतिन की उपलब्धियां भी कम नहीं हैं। उन्होंने तब देश की कमान संभाली थी, जब बोरिस येल्तसिन के कार्यकाल में यह शानदार देश जड़ता महसूस कर रहा था और नए नेतृत्व की मांग उठने लगी थी। वर्ष 1999 में प्रधानमंत्री बने पुतिन ने काफी लोकप्रियता बटोरी। उन्होंने बेरोजगारी और गरीबी पर अंकुश लगाया, विदेशी कर्ज घटाया और देश के खजाने में बढ़ोतरी की। चेचन्या और क्रीमिया को उन्होंने रूस का हिस्सा बनाया तथा अमेरिका के सामने पूरी ताकत से खड़े रहने की वजह से पुराने दौर के सोवियत संघ जैसी स्थिति बहाल की।
आम तौर पर दुनिया किसी अधिनायक को पसंद नहीं करती। पर पुतिन को उनका देश पसंद करता है। सोवियत संघ के बिखरने के बाद मिखाइल गोर्बाचेफ की छवि एक कमजोर राजनेता की बन गई थी। जबकि रूस एक ताकतवर नेता चाहता था, जो उन्हें पुतिन के तौर पर मिला। पुतिन की मजबूती ही रूस की ताकत है।