पुतिन और पराक्रमी भारत
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रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ वर्ष 2000 में द्विपक्षीय सामरिक समझौता हुआ था, जिसके तहत भारत लगातार रूस से हथियार खरीदने वाला अग्रणी देश बना रहा। लेकिन पिछले एक दशक से दोनों देशों की नीतियां तनिक बदलीं। और परिणाम यह निकला कि जहां भारत रूस से हथियारों की लगभग नब्बे प्रतिशत खरीद को सत्तर प्रतिशत तक ले आया और शेष हथियार, विशेषकर अमेरिका और यूरोप से लेने शुरू कर दिए, वहीं रूस ने भी चीन को हथियारों और गैस-आपूर्ति का सबसे बड़ा साझेदार बना लिया। फिर भी ब्रह्मोस प्रक्षेपास्त्र, भारतीय युद्धपोत विक्रमादित्य, कुडनकुलम का परमाणु ऊर्जा केंद्र, एसयू 30 युद्धक विमान, टी-90 टैंक आदि भारत-रूस मैत्री को महत्वपूर्ण और सर्वाधिक विश्वसनीय भी बनाते हैं।
11 दिसंबर यानी आज नई दिल्ली में मोदी और पुतिन की पहली और औपचारिक शिखर वार्ता होगी। इसकी पृष्ठभूमि में भारत की अमेरिका और जापान के साथ बढ़ती सामरिक घनिष्ठता एवं चीन से संबंधों में अभूतपूर्व सुधार का दृश्य यदि प्रभावी 'बैकड्रॉप' बनाता है, तो यूक्रेन के मामले में अमेरिका से शीत युद्ध की स्थिति में आया रूस यह भी देख रहा है कि भारत के गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा आ रहे हैं। निश्चय ही यह ब्रेझनेव-इंदिरा गांधी के युग वाली भारत-सोवियत संघ मैत्री करार के ऐतिहासिक युग से भिन्न अध्याय लिखे जाने का समय है। उदाहरण के लिए, हथियारों की आपूर्ति के मामले में भारत रूस से हटकर अन्य देशों की ओर मुड़ा, तो उसकी भरपाई रूस द्वारा भारत में बनाई जा रही 'स्मार्ट सिटीज', हीरे तराशने के व्यापार, विज्ञान और तकनीक में साझेदारी, दवा निर्माण, विमानन, भारी इंजीनियरिंग और खाद्य के क्षेत्र में पहले से कई गुना अधिक रूसी पूंजी निवेश द्वारा हो रही है।
इसी तरह, अभी दोनों देशों के बीच व्यापार आठ अरब डॉलर तक पहुंचा है, और अगले वर्ष तक इसे बीस अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। दोनों देशों में स्मार्ट सिटी बनाने के काम पर भी समझौता हुआ है। और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की ब्रिक्स शिखर सम्मेलन में कही गई उस उक्ति को पुतिन की इस दिल्ली यात्रा में खरा सिद्ध करने की बात भी है, जिसमें उन्होंने कहा था कि 'भारत का हर व्यक्ति और बच्चा तक यह जानता है कि रूस भारत का महानतम मित्र है।' यहां उल्लेखनीय है कि रूस न केवल चीन के साथ अति उच्च श्रेणी के हथियारों और पनडुब्बियों के समझौते कर चुका है, बल्कि पाकिस्तान के साथ भी उसने युद्धक हेलीकॉप्टरों की आपूर्ति का समझौता किया है और एमआई- 35 सैन्य हेलीकॉप्टर की एक खेप इस्लामाबाद को दे चुका है। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। हाल ही में रूस का साइबेरिया एक्सप्रेस के नाम से प्रसिद्ध चीन को तीस वर्ष तक गैस की आपूर्ति करने का चार सौ अरब अमेरिकी डॉलर का समझौता हुआ है, और इस प्रकार रूस चीन का विश्व में सबसे बड़ा सामरिक साझेदार बन गया है। इन दोनों स्थितियों पर भारत की नजर है, लेकिन यह भारतीय लोकतंत्र का खूबसूरत पहलू है कि सरकारों के बदलने के बावजूद रूस के प्रति भारत में जो स्वाभाविक झुकाव और विश्वसनीय अपनेपन का भाव है, उसे देखते हुए आपसी संबंधों को आहत नहीं किए जाने की नीति कायम है।
अभी स्थिति यह है कि रूस के अधिकांश विश्वविद्यालयों में हिंदी के अलावा तमिल, गुजराती, मराठी, बांग्ला, संस्कृत और पालि पढ़ाई जाती है। वहां के लोगों में भारतीय नृत्य विशषेकर भारतनाट्यम, योग और आयुर्वेद के प्रति गहरा झुकाव है। रूस के दस देशों में भारतीय संस्कृति का विराट महोत्सव पिछले वर्ष ही मनाया गया और भारत के कलाकार, विशेषकर फिल्में वहां अपार लोकप्रिय हैं। वहां के मेडिकल कॉलेजों में साढ़े चार हजार से अधिक भारतीय आसान शर्तों और शुल्कों से पढ़ाई कर रहे हैं। हालांकि बीच में भगवद्गीता और इस्कॉन (हरे कृष्णा) पर प्रतिबंध के मामले उठे, लेकिन उस सरकार ने उसे बुद्धिमता से भारतीय पक्ष में सुलझाया।
चेचन्या में इस्लामी आतंकवादियों पर रूस की कड़ी कार्रवाई का भारत में सामान्यतः स्वागत ही हुआ था और यूक्रेन में रूसी हस्तक्षेप के बाद भले ही समूचा पश्चिमी विश्व रूस के विरुद्ध हो गया हो तथा अमेरिका के नेतृत्व में प्रतिबंधों की आक्रामक बाढ़ रूस के विरुद्ध शुरू हुई, पर भारत ने असाधारण स्वतंत्र विदेश नीति का परिचय देते हुए रूस के विरुद्ध पश्चिमी खेमे से स्वयं को संबद्ध नहीं किया। पुतिन अपने कठोर राजनीतिक रवैये और वहां की अर्थव्यवस्था को दिवालियेपन के कगार से वापस लीक पर लाने के लिए विश्व में एक मजबूत राष्ट्रवादी महाशक्ति के प्रतिनिधि होने का सम्मान पाते हैं। उनके इस कठोर रवैये की स्वदेश और विदेश में कड़ी आलोचना भी होती है, जिसमें भारत का भी एक बड़ा वर्ग शामिल है। लेकिन इन तमाम आलोचनाओं की परवाह न करते हुए पुतिन ने फौलादी नेता होने का खिताब भी अर्जित किया, और अपने आलोचकों को उन्होंने यह कहते हुए चुप कराया कि वह रूस के राष्ट्रपति हैं और राष्ट्र के हित में जो भी करना होगा, उसे करने के लिए उन्हें पश्चिमी देशों से स्वीकृति लेने की जरूरत नहीं है। इसलिए उनके काम को एकतंत्रवादी कहते हुए भी रूस की जनता उन्हें बार-बार समर्थन देती है।
भारत में उनकी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ यह पहली शिखर वार्ता होगी और यह उम्मीद है कि दोनों लौह पुरुष अपने-अपने देशों के हित में 'रूसी-हिंदी भाई-भाई' की नई इबारत लिखने में सफल होंगे। यह दौर वास्तव में दोनों देशों के बीच नए ऐतिहासिक युग का सूत्रपात कर सकता है।
(लेखक राज्यसभा में भाजपा सांसद हैं)