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निंदक नियरे राखिये
पूरन सरमा
Updated Sun, 19 Apr 2015 08:18 PM IST
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एक दिन मैंने अपने निंदक से कहा, भाई, तुम तो कमाल के आदमी हो। तुम जो नेक कार्य करते हो, उससे मुझे बड़े लाभ होते हैं। मसलन तुम्हारी निंदा से लोग अब मुझे बड़ा आदमी समझने लगे हैं।
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निंदक बोला, तुम्हारी निंदा करने से मुझे भी बहुत से लाभ हैं। तुम्हारे विरोधियों को जैसे ही मैं तुम्हारी आलोचना के दो शब्द सुनाता हूं, वे भाव विभोर होकर मुझे चाय पिलाते हैं, नाश्ता कराते हैं। और भला मुझे चाहिए भी क्या?
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मैंने कहा, निंदक, इसीलिए तो मैं तुम्हें अपने साथ रखता हूं। हम एक दूसरे का साथ दे रहे हैं।
निंदक ने कहा, हे निंदनीय आदमी, इस खुशफहमी में मत रहना। मैं तुम्हारा नुकसान ही करूंगा, भला नहीं।
खैर निंदक को चाय-नाश्ता कराकर मैंने उसे विदा किया। बाद में मैंने खूब सोचा कि निंदक के साथ सुलूक कैसा होना चाहिए। अंत में जो हल सामने आया, वह यही था कि निंदक तो ‘नियर’ ही रहना चाहिए। वह हमारे बारे में बीस तरह की वे बातें भी पास-पड़ोस में फैला देता है, जो बात हम अपने मुंह से नहीं कह पाते। यही सोचकर मैं फिर निंदक के पास गया और बोला, निंदक भाई, चलो, मुझे तुम्हारी सख्त जरूरत है। कृपया मेरे उस किरायेदार से यह तो कह आओ कि वह अच्छा आदमी नहीं है। उसके बच्चे अशिष्ट हैं और पत्नी निरी बेवकूफ।
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निंदक को भला कैसी शर्म! उसने मेरे किरायेदार से वे बातें कह दीं। किरायेदार गुस्सा हुआ, तो मौका देखते हुए मैंने भी कह दिया, ऐसा है, आप मकान खाली कर दीजिए।
किरायेदार ने स्वाभिमान के वशीभूत मकान खाली कर दिया। मैं निंदक का आभार प्रकट करते हुए बोला, आपने मेरी समस्या का समाधान किया है। मैं आपके एहसान का बदला कैसे चुकाऊं?
बदला तो चुकाना ही पड़ेगा। वरना मैं वसूल करना भी जानता हूं। निंदक कुटिलता से बोला।
मैंने घबराकर कहा, नहीं, नहीं, ऐसा मत कीजिए। मुझे आप जैसे निंदक की जरूरत आगे भी पड़ेगी।