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पूर्ण स्वराज और गांधी, जानिए कितना अहम था लाहौर अधिवेशन

Tue, 26 Jan 2021 04:22 AM IST
सुब्रत मुखर्जी सुब्रत मुखर्जी
सुब्रत मुखर्जी Published by: सुब्रत मुखर्जी Updated Tue, 26 Jan 2021 04:22 AM IST
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Purna Swaraj and Gandhi, know how important the Lahore session was
महात्मा गांधी (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : iStock

वर्ष 1922 में असहयोग आंदोलन वापस लेकर महात्मा गांधी ने खुद को रचनात्मक कार्यक्रमों तथा सांप्रदायिक सद्भाव की मुहिम में झोंक दिया। पर कांग्रेस के अंदर जो वामपंथी तत्व थे, उन्होंने पूर्ण स्वराज पर जोर दिया था। शुरुआत में गांधी और पुरातनपंथियों ने इसका विरोध किया, पर 1929 में लाहौर कांग्रेस में कांग्रेस ने जो प्रस्ताव पारित किया, उनमें स्वतंत्रता और नागरिक अवज्ञा को ही प्रमुखता दी गई। मोतीलाल नेहरू ने इन प्रस्तावों का समर्थन किया तथा अपने अध्यक्षीय भाषण में जवाहरलाल नेहरू ने कहा कि पूर्ण स्वराज की लड़ाई महात्मा गांधी के नेतृत्व में लड़ी जाएगी। गांधी के प्रस्ताव का तब सुभाषचंद्र बोस, सत्यमूर्ति, केलकर और मालवीय ने विरोध किया था। यद्यपि बाद में सुभाष ने स्वीकारा कि स्वतंत्रता संग्राम में गांधी के विराट योगदान को रेखांकित करने में लाहौर सम्मेलन ने बेहद महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 


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हालांकि उससे पहले 1926 की गुवाहाटी कांग्रेस में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पेश किया गया था। जवाहरलाल नेहरू ने पहली बार 1927 में मद्रास (चेन्नई) में आयोजित कांग्रेस के 42 वें सत्र में पूर्ण स्वराज का प्रस्ताव पारित किया था। पर तब गांधी जी ने इसका विरोध किया था, क्योंकि उनका उद्देश्य ऑस्ट्रेलिया, कनाडा तथा न्यूजीलैंड की तरह भारत को डोमिनियन स्टेट का दर्जा दिलाना था। उन्होंने यंग इंडिया में लिखा भी कि पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव हर साल पारित किया जाता रहा, जिसे भारी संख्या में सदस्यों ने खारिज किया। हालांकि नेहरू का प्रस्ताव भारी बहुमत से पारित हुआ था। गांधी के अलावा मोतीलाल नेहरू ने भी प्रस्ताव का विरोध किया था। पर एनी बेसेंट ने प्रस्ताव का समर्थन किया। ज्यादातर कांग्रेसियों के लिए पार्टी के रुख में आया यह बदलाव दिखावटी ही था, क्योंकि उनमें से ज्यादातर पार्टीजन डोमिनियन स्टेट का समर्थन ही करते रहे।

वर्ष 1927 में ब्रुसेल्स में आयोजित कांग्रेस ऑफ ऑप्रेस्ड नेशनलिटी में भाग लेने के बाद नेहरू अतिवादी या उग्र सुधारवादी हो गए थे और कांग्रेस की धीमी गति उनमें ऊब पैदा करने लगी थी। वह गांधीवादी तौर-तरीके से बाहर निकलकर क्रांतिकारी कदम उठाने के हिमायती हो गए थे। गांधी जी ने नेहरू के प्रस्ताव पर नाराजगी जताते हुए उनसे कहा था कि वह मुद्दे की जटिलता को नहीं समझ पा रहे। इसी दौरान काकोरी कांड (1925), मेरठ षड्यंत्र मामला (1929) तथा ब्रिटेन में लेबर पार्टी की पहली सरकार (1924) और मिस्र को मिली आंशिक स्वतंत्रता (1922) जैसी वैश्विक घटनाओं से कांग्रेस के अंदर भी तेज बदलाव की भावना विकसित हुई। 23 दिसंबर, 1929 को लॉर्ड इरविन ने जब भारत को डोमिनियन स्टेट का दर्जा दिलाने के प्रति अपनी अक्षमता जताई, तब गांधी के पास पूर्ण स्वराज के प्रस्ताव को स्वीकारने के अलावा और कोई विकल्प नहीं था, जैसा कि उन्होंने लाहौर सम्मेलन में किया भी। 

नागरिक अवज्ञा आंदोलन ने विश्व स्तर पर गांधी की मजबूत छवि बनाई और वह बहुसंख्यक ब्रिटिशों को एहसास कराने में सफल हुए कि ब्रिटिश उपनिवेशवाद का नैतिक समर्थन नहीं किया जा सकता। नमक सत्याग्रह और पहली बार रेडियो पर आए गांधी के संदेश ने अमेरिकी जनमत के बड़े हिस्से को भारत की आजादी का पक्षधर बनाया, और ब्रिटेन के राजनीतिक वर्ग ने भी महसूस किया कि भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की समाप्ति में विलंब तो किया जा सकता है, पर इसे रोका नहीं जा सकता। 1929 के लाहौर सम्मेलन में ही यह फैसला लिया गया था कि 26 जनवरी, 1930 को पूरे देश में प्रथम स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाएगा। तभी से 26 जनवरी हमारे लिए एक महत्वपूर्ण दिन हो गया, और 15 अगस्त को आजादी मिलने के बाद गणतंत्र दिवस के रूप में वर्ष 1950 में 26 जनवरी का दिन चुना गया।

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