समस्या का हल नहीं है मृत्युदंड

अलका आर्य Updated Sat, 29 Dec 2012 12:30 AM IST
punishment does not solve problem
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बलात्कारियों या दुष्कर्मियों से कैसे निपटें, इस सवाल को 16 दिसंबर की रात दिल्ली में चलती बस में पैरामेडिकल की छात्रा के साथ हुए सामूहिक बलात्कार के हादसे ने एक बार फिर प्रासंगिक बना दिया है। देश के कई इलाकों की सड़कों पर बलात्कार के विरोध में इकट्ठा हुए असंख्य प्रदर्शनकारियों से लेकर देश की संसद के भीतर बलात्कारियों को फांसी की सजा देने की मांग सुनाई दी।
लोकसभा में विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज ने कहा कि इस घटना से पूरा देश शर्मसार है, ऐसे लोगों को फांसी की सजा मिलनी चाहिए। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने बलात्कार की इस घटना को अपने कार्यकाल की सबसे दर्दनाक घटना करार देते हुए बलात्कारियों के लिए फांसी की सजा की वकालत की। 'फांसी दो' का जो यह शोर इन दिनों हमारे कानों में बार-बार सुनाई पड़ रहा है, क्या इससे बलात्कार रुक जाएंगे? ऐसे सवालों पर विमर्श करने का यह नाजुक वक्त है, क्योंकि सरकार पर दुष्कर्म पर अंकुश लगाने के लिए कानून को सख्त बनाने का बहुत दबाव है।

इतिहास गवाह है कि फांसी की सजा किसी भी जुर्म के कम होने का शर्तिया समाधान नहीं है। हत्या के जुर्म में फांसी की सजा का प्रावधान है, इसके बावजूद 1971 से 2011 की अवधि में हत्या के मामलों में 250 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई है। यह सही है कि बलात्कार के मामलों में सजा की दर बहुत कम होने के कारण विकृत मानसिकता के लोगों का दुस्साहस बढ़ता है, इसके बावजूद फांसी की सजा व्यावहारिक नहीं है। इसका असर खासकर लड़कियों/महिलाओं पर देखने को मिल सकता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि बलात्कार या यौन अपराध के 80 प्रतिशत से ज्यादा मामलों में अधिकतर परिवारजन और जानकार ही शामिल होते हैं।

ऐसे में पीड़िता पर रिश्तेदार व समाज अपराध के खिलाफ रिपोर्ट नहीं दर्ज कराने के लिए दबाव बनाएंगे और उससे धमकाने की शैली में पूछा जाएगा कि क्या तुम चाहती हो कि उसे फांसी की सजा हो, और फिर उसका परिवार, समाज हमारा सामाजिक बहिष्कार कर दे? ऐसे में बलात्कार के जो मामले आज सरकारी दस्तावेजों में दर्ज होते हैं, उनकी संख्या धीरे-धीरे कम होने लगेगी। एक आशंका यह भी जाहिर की जा रही है कि फांसी की सजा वाले प्रावधान के बाद आरोपी पीड़िता को ही जान से मार सकता है, क्योंकि उसकी कोशिश गवाह को मिटाने की होगी। ऐसे में, हिंसा का एक नया चक्र शुरू हो सकता है।

एक अहम दलील यह भी है कि मौत की सजा की मांग करने का मतलब राज्य को किसी की जिंदगी छीनने का अधिकार देना है, जो मानवाधिकार के बुनियादी सिद्धांत के खिलाफ है। क्या हमें राज्य को यह अधिकार देना चाहिए? राज्य को अधिक शक्तियां देना, चाहे वह पुलिस का सैन्यकरण हो और उन्हें देखते ही गोली मार देने वाला अधिकार देना हो या मौत की सजा देने संबंधी अधिकार हो, अपराध कम करने का व्यवहार्य समाधान नहीं है। अमेरिका का उदाहरण बताता है कि वहां अल्पसंख्यक समुदाय के पुरुषों को अनुपातिक संख्या में मौत की सजा ज्यादा दी गई।

अपने मुल्क में जिन अपराधों में मौत की सजा का कानूनन प्रावधान है, वहां का आकलन भी यही खुलासा करता है कि इस प्रावधान का इस्तेमाल करते वक्त भेदभाव किया जाता है। मौत की सजा वाले प्रावधान का विरोध इसलिए भी किया जा रहा है कि ऐसा होने से बलात्कार के मामलों में सजा की दर में गिरावट आएगी, जबकि यह दर पहले ही कम है। गौरतलब है कि नेशनल अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, बीते चार दशकों में बलात्कार के अपराध में सर्वाधिक 873.3 प्रतिशत वृद्धि दर्ज की गई, पर 2011 में ऐसे मामलों में सजा की दर महज 26.4 प्रतिशत ही थी।

लिहाजा फोकस फास्ट ट्रैक अदालतों के गठन, तय समय सीमा में मामलों के निपटारे, पुलिस, जांच एजेंसियों, न्यायिक प्रक्रिया को संवेदनशील और कारगर बनाने जैसे महत्वपूर्ण बिंदुओं पर होना चाहिए। इस समय महिला सुरक्षा संबंधी जो जनाक्रोश दिखाई दे रहा है, उसमें मौत की सजा वाली मांग अतिरेक का स्वर है। बलात्कार की सजा को सख्त बनाने की आड़ में सनसनी फैलाना उचित मांगों की राह में रुकावट डालना ही है।

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सिर्फ पुरुष ही नहीं

इन दिनों अक्सर जेंडर न्यूट्रल कानून बनाने की मांग जोर पकड़ रही है। जो कानून लैंगिक आधार पर भेदभाव करते हैं, उन्हें बदलने की जरूरत है। विवाह की पवित्रता सिर्फ पुरुष को ही सजा देकर नहीं बनी रह सकती।

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