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जनता के चुने लोग और अदालत

Tue, 06 Aug 2013 08:34 PM IST
शीतला सिंह
शीतला सिंह Updated Tue, 06 Aug 2013 08:34 PM IST
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public Representative and court

सर्वोच्च न्यायालय द्वारा जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा-8 (4) को संविधानेतर घोषित करने एवं यह व्यवस्था देने से, कि जेल में दाखिल कोई भी व्यक्ति न तो चुनाव अधिकारी के समक्ष नामांकन दाखिल करने में सक्षम है और न जेल में रहकर चुनाव ही लड़ सकता है, राजनीतिक दलों में खासी गहमा गहमी है। इससे पहले भी जब शीर्ष अदालत की ओर से विधायिका से अपेक्षा की गई थी कि वह इस संबंध में ऐसा कानून बनाए, जिससे अपराधी चुनाव न लड़ पाएं, तो तमाम राजनीतिक दल एक साथ हो गए थे। उनके अपने तर्क हैं कि जैसे निलंबित अधिकारी की सेवाएं समाप्त नहीं मानी जातीं, यदि वह निलंबन से मुक्ति के बाद सारे लाभ, जिसमें वेतन से लेकर पदोन्नति तक शामिल है, प्राप्त करता है, तो नीचे की अदालत से सजा पाए व्यक्ति को यदि चुनाव लड़ने से रोक दिया जाए, तो क्या उसकी भरपाई का कोई माध्यम नहीं होना चाहिए?

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न्यायपालिका के लोग तो सेवाओं में चयनित पद्धति से आते हैं, उन्हें जनता जैसी बड़ी अदालत का सामना नहीं करना पड़ता। जब लोकतंत्र में यह माना जाता है कि अदालत से भी बड़ी जनता की अदालत है, तो उसके निर्णयों पर कानून के नाम पर आपत्ति उठाना और निरर्थक बताना क्या उचित माना जाएगा? 26 जनवरी, 1950 को जिस संविधान को स्वीकार किया गया था, उसके संबंध में सर्वोच्च न्यायालय की आपत्तियों को निरर्थक बनाने का काम सरकार की ओर से हुआ है। जमींदारी उन्मूलन कानून में यह प्रश्न उठा था कि संविधान के मौलिक अधिकारों में जब संपत्ति का अधिकार है, तब उससे किसी को वंचित कैसे किया जा सकता है? लेकिन संविधान में परिवर्तन कर इस धारा को ही निकाल दिया गया।
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संविधान के अनुसार, देश की नागरिकता जन्म से मिलती है, पांच वर्ष या उससे अधिक रहने पर भी मिलती है, जबकि विदेशियों के लिए यह प्राप्त करनी पड़ती है, और किसी आपराधिक कार्यों से समाप्त नहीं होती। इसी तरह चुनाव कानून का दोषी होने पर ही संसद एवं विधान मंडल का मतदाता होने की पात्रता से वंचित हुआ जा सकता है, लेकिन किसी अन्य अपराध के कारण यह अधिकार समाप्त नहीं होता। अनुच्छेद-19 (1) (6)-जिसमें वृत्ति, व्यवसाय और आजीविका की स्वतंत्रता दी गई है, उसमें भी वकालत या डॉक्टरी का लाइसेंस देने के जो संस्थान हैं, वही किसी को प्रतिबंधित कर सकते हैं। लेकिन राजनीति पेशा नहीं, सेवा है और इसके लिए लाइसेंस देने वाला कोई संस्थान नहीं, पर इन्हें भी नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत से अलग नहीं रखा जा सकता। यानी हमने तो चुनाव लड़ने से उसे रोक दिया, पर सुनवाई या अपील में वह निर्दोष निकला, तो चुनाव में भाग लेने का अवसर उसे बाद में ही मिलेगा। इसलिए चुनाव कानून में भी सजाओं का वर्गीकरण नैतिक अधःपतन और अन्य मामलों में नहीं, बल्कि सजा की अवधि पर आधारित है, जबकि पेशेगत मामलों में ऐसा नहीं है। वहां जमानत पर या जेल से छूटकर अपना कारोबार संचालित किया जा सकता है।
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सर्वोच्च न्यायालय को यह विसंगति नहीं दिखी कि जिला परिषद, विधान परिषद और राज्यसभा के निर्वाचन जिस पद्धति से होते हैं, उसमें मतदाताओं के 50 प्रतिशत से अधिक वोट पाने वाले ही चुने जाते हैं, यानी वहां एकल संक्रमणीय चुनाव पद्धति लागू है, जबकि पंचायतों से लेकर विधानसभा और लोकसभा तक अधिक मत पाकर लोग चुनाव जीतते हैं। इस देश को लोकतंत्र किसी अदालत से नहीं मिला है, इसमें जनता की इच्छा सर्वोपरि है। आखिर वह इन दागी उम्मीदवारों को क्यों नहीं नकारती? अपराधियों की भांति जाति, धर्म और पूंजी भी तो चुनाव कानून के अंतर्गत अनुचित माने गए हैं, लेकिन इनके लिए सवाल क्यों नहीं उठते?


इसलिए लोकतंत्र में जनेच्छा ही सर्वोपरि होगी। जेल या हवालातों में रहने वाले भी मतदाता की पात्रता और योग्यता से वंचित नहीं होते। जहां तक अवरोध का प्रश्न है, तो वह कानून का ही नहीं, प्रकृति और स्थितियों का भी होता है। मसलन, अस्पताल में दाखिल व्यक्ति मतदान करने में असमर्थ हो जाता है। बाढ़ और प्राकृतिक आपदाएं भी मतदाताओं के रास्ते में बाधक बनने का कार्य करती हैं। आपातकाल के समय जो लोग उन्नीस महीने जेल में रहकर चुनाव लड़े थे, उनके चयन को उचित माना जाए या नहीं!

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