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फिक्सिंग करो कि जनता आती है
यशवंत व्यास
Updated Sat, 18 May 2013 09:33 PM IST
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जनता को समझ में आ गया है कि रतन खत्री वाला मटका खेलने में उतना मजा नहीं है जितना क्रिकेट खेलने में। हमारे एक दोस्त तमाम किस्म के सट्टे खेलते रहे हैं। पहले वे पतरे के सट्टे और नाली के सट्टे के उस्ताद कहे जाते थे।
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पतरे-नाली सट्टे में पानी की जरूरत होती है। हल्की सी बदली दिखी कि सट्टा शुरू। बदली इधर से उधर हो रही है और बंदे चवन्नी लेकर शुरू हो गए। बारिश होगी या नहीं होगी, इस पर धंधा चल निकलता है।
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पतरे के सट्टे में सट्टा इस बात का होता है कि क्या बारिश इतनी आएगी कि छत पर रखे टीन के चद्दर से पानी की धार बंध जाएगी? आएगी भी तो कितनी देर में आएगी?
हर मिनट का सट्टा, हर बूंद और हर बादल का सट्टा, नाली का सट्टा इसका भाई-बंधु है। कुछ शहरों में ऊपर की मंजिल के आगे खुली गच्ची होती है। पानी गिरता है तो पाइप के जरिए नीचे आकर पतली नालियों में से होता हुआ सड़क की धारा में जा मिलता है। सटोरियों का हिसाब इसी बात पर चलता है कि नाली चलेगी भी कि नहीं?
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कई बार इतनी कम बारिश होती है कि गच्ची पर ही पानी बिखर जाता है, पाइप से नीचे आने लायक हिसाब ही नहीं बनता। नाली नहीं चलती, कई की जेबें हल्की कर जाती है। यह सट्टा नेहरू काल से चलता आया है। अब उत्तर आधुनिक काल है। अब जिन्हें पतरे और नाली के सट्टे में मजा आना बंद हो गया, वे मटके पर लगे हैं।
मुंबई से एक नंबर निकलता है ओपन का, एक क्लोज का और कई की तबीयत हरी हो जाती है। कागज का एक मामूली टुकड़ा जो कानूनी नजर में बोगस होगा, पर इतनी हैसियत रखता है कि पूरी ईमानदारी से आपका वलन यानि जीती हुई राशि मिलवा दे।
राष्ट्रीय बचत पत्र को नकद में बदलवाने में पोस्ट ऑफिस चक्कर लगवा सकता है, लेकिन इस पर्ची पर सट्टा खाईवाल से तत्काल माल मिल जाएगा। कभी-कभी अच्छे पुलिस अफसर ईमानदारी का सबक सीखने के लिए अपने अनुयायियों को मटकों के अड्डे पर पर्ची लेकर भेजते हैं। इससे पहले न्यूयॉर्क कॉटन तथा पेड़ के पत्ते गिरने पर सट्टे खेलने वाले उत्साही सट्टेबाज उनके लिए प्रेरणा का स्रोत तथा कलाकारी के उत्कृष्ट मॉडल साबित होते थे।
ऐसे में सन् 2000 में जब हैंसी क्रोनिए-शैली का प्राकट्य हुआ, तो प्रसन्नता की लहर दौड़ जाना स्वाभाविक ही था। यह जानने के बाद कि मैच फिक्सिंग यानी पैसा लेकर पूर्व निर्धारित सट्टा-योजना के अनुरूप मैच हारने की कुशल योजना को अंजाम देना और बड़ी कलाकारी का खेल साबित हुआ है।
जनता की इच्छा हुई कि मैचों की फिक्सिंग को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलनी चाहिए। क्रोनिए ने पूरा मैच हारने के नाम पर खाईवाली नहीं की थी। उसने 'गेंद-गेंद पर लिखा है सट्टेबाज का नाम' नामक आप्त वाक्य से प्रेरणा ली। ओवरों तथा रन औसत का पूरा नक्शा खींचकर पूर्ण वैज्ञानिक तरीके से हर बॉल और हर रन पर पैसा खाया गया।
इस तरह पांच लोग मिलकर पूरी टीम का रुख बदल सकते थे तथा बाजार में सक्रिय अपने सटोरिए भाइयों से इन पांचों पर अलग-अलग सट्टा लगवाया जा सकता था। करोड़ों के इस सट्टे के बावजूद कहा जाता था कि मैच फिक्सिंग नहीं की गई, क्योंकि पूरे मैच को सटोरियों के हाथों नहीं बेचा गया था।
जनता को यह शैली बहुत जमी। जितना ध्यान लगाकर इसमें हर बॉल पर कौशल दिखाना होता है, वह मामूली क्रिकेट से कई गुना भारी है। यह भीषण कलाकारों का ही काम हो सकता है। इसलिए जनता मांग करती रही है कि यदि हर उस मैच के बारे में पहले से खुलासा कर दिया जाए कि इसे इतने ओवर पर, इस खिलाड़ी द्वारा, इतने रन का भाव फिक्स किया गया है, तो मैचों के टिकट ब्लैक में बिकने लगेंगे। जनता खुला पैसा लगाएगी, खुलकर खेल करेगी, धांसू क्रिकेट होगा, हर बल्ले से रुपया झरेगा।
जनता की यह मांग बरसों बाद कुछ इस तरह पूरी हुई कि आईपीएल एकदम पारदर्शी मॉडल लेकर उतर आया। खिलाड़ियों की नीलामी से इसने बिक्री-खरीदी का साफ-सुथरा हिसाब रखा। शराब बनाकर एयरलाइंस 'फुकरी’ करार देने वालों से लेकर फिल्म वालों से राजनेताओं तक ने इसमें हाथ चलाए। सिक्सर पर चीयर गर्ल्स के ऑफिशियल आनंद के साथ इसमें हर मालिक का सौन्दर्य भाव उच्च कोटि का था।
अब जब श्रीसंत ने टॉवेल के इशारे से स्पॉट फिक्सिंग का आविष्कार कर लिया है, जनता और भी उत्साहित हो उठी है। पक्का हो गया है कि जनता के पैसे से बॉल, ओवर, आसमान और टॉवेल सब पर मामला फिक्स हो सकता है।
इधर-उधर से पांच-पांच पार्टियों को इकट्ठा करके सरकार चलाने के इन मुश्किल दिनों में यह आशा का नया स्रोत है। प्रेरणा यह मिलती है कि पूरी सरकार पर सट्टा खेलने की बजाय दो-चार सीटों पर खेलना चाहिए। आप सरकार के ताजा अनुभवों से कह सकते हैं कि इससे हरेक सांसद और एम.एल.ए. को लोकतंत्र से वाजिब हिस्सा मिल सकेगा।
जनता बहुत खुश है। वह राजनीतिज्ञों से आह्वान करती है कि वे क्रिकेट में अपना पैसा लगाएं। फिक्सिंग करें। उस कमाए हुए पैसे तथा अर्जित किए हुए कौशल को संसद-विधानसभाएं चलाने में इस्तेमाल करें। फिक्सिंग पर ही सरकारें चलाने की पारदर्शी व्यवस्था हो। अभियान का बाकायदा नारा बनेगा 'मैच फिक्स करो कि जनता आती है' इससे जनता को भी जेहाद का भ्रम रहेगा। खेल का खेल और जेहाद का जेहाद।
सबके काम तय हैं जनता को मैच देखना है, राजनेताओं को मैच फिक्स करना है। जनता राजनीति में कांग्रेसी-मटके तथा वामपंथी या दक्षिणपंथी सट्टे से बोर हो चुकी है क्योंकि उसमें पिटाई बहुत हो रही है। जनता क्रिकेट में सट्टा और केंद्र में सत्ता के नए संबंधों को फलते-फूलते देखना चाहती है। उम्मीद है कि इंडियन पॉलिटिकल लीग का फॉर्मूला जल्दी ही हमारे कल्याण के लिए सामने आएगा। आखिर क्रिकेट के आईपीएल में राजनीति के आईपीएल वाले खिलाड़ियों की कोई कम थोड़े ही चलती है।