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विधायकों के यात्रा भत्ते में बढ़ोतरी के खिलाफ सड़क पर लोग, ये अच्छा है...
Fri, 27 Sep 2019 02:00 AM IST
केएस तोमर
के एस तोमर
के एस तोमर
Published by: केएस तोमर
Updated Fri, 27 Sep 2019 02:00 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : अमर उजाला
विधायकों का यात्रा भत्ता हाल ही में ढाई लाख रुपये से बढ़ाकर चार लाख रुपये प्रति वर्ष करने के खिलाफ लोगों का आक्रोश एवं गुस्सा समाज की वैचारिक सोच, निराशा और अधैर्य का संपूर्ण रूपांतरण है, जो लोकतंत्र की सेहत के लिए बेहतर है और हर किसी को इस जागरूकता का स्वागत करना चाहिए। हिमाचल प्रदेश ने विधायकों के यात्रा भत्ते में बढ़ोतरी के खिलाफ आवाज बुलंद करने का बीड़ा उठाया है, हालांकि संसद 2018 में ही सांसदों के विभिन्न भत्ते बढ़ा चुकी है। यह विद्रूप ही है कि विधायकों को अब जनता से चुनौती मिल रही है, जो विधायकों को ऐसा विशेषाधिकार प्राप्त वर्ग समझती है, जिसके पास पैसे कमाने के अनेक रास्ते हैं।
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हिमाचल की जयराम सरकार ने विधायकों के यात्रा भत्ते में जिस तरह बढ़ोतरी की है, उसका युवाओं के अलावा समाज के हर तबके ने शांत और उदास तरीके से विरोध किया है। हालांकि सरकार के इस फैसले का कांग्रेस समेत दूसरे दलों ने समर्थन किया, लेकिन ऐसा एक कानून बनाने के कारण निशाने पर तो सत्तारूढ़ दल ही है, जिसके पास निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की मांग के आगे न झुकने का विकल्प था। लोगों के गुस्से की वजह यह है कि वेतन (55,000), चुनाव भत्ता (30,000) टेलीफोन (5,000) और दूसरे भत्तों को मिलाकर विधायकों को प्रति महीने 2.10 लाख रुपये मिलते हैं। जबकि पूर्व विधायकों को 36,000 रुपये मासिक पेंशन के अलावा तमाम सुविधाएं भी मिलती हैं। राज्य सरकार मंत्रियों और विधायकों का करीब चार करोड़ सालाना आयकर चुकाती है, जिसका कोई औचित्य नजर नहीं आता। राजकोष पर सालाना 15 करोड़ से भी अधिक का बोझ है। तिस पर अब विधायकों का यात्रा भत्ता बढ़ाकर राज्य सरकार ने राजकोष पर बोझ और बढ़ा दिया है। ऐसे में, बजट घाटा अब 50,000 करोड़ रुपये है।
बेशक जनप्रतिनिधियों का यात्रा भत्ता बढ़ाने से संबंधित विधेयक पर विधानसभा में सभी पार्टियों की सहमति देखी गई, पर कुछ विधायकों ने इस बढ़ोतरी का विरोध किया, जिसे बहुसंख्यक विधायकों ने स्टंट बताया। हालांकि माकपा विधायक राकेश सिंघा ने साफ कह दिया कि वह बढ़ा हुआ यात्रा भत्ता नहीं लेंगे।
विश्लेषकों के अनुसार, विधायकों का यात्रा भत्ता बढ़ाने पर लोगों में व्याप्त गुस्सा जन धारणा में एक गंभीर और अकल्पनीय बदलाव का सूचक है। ज्यादातर लोगों में राजनेताओं के प्रति घृणा है और वे उनमें से अधिकांश को भ्रष्ट, आत्मकेंद्रित और लोगों की समस्याओं के प्रति संवेदनहीन समझते हैं। लोगों में यह धारणा राजनेताओं की प्रतिबद्धता और समर्पण भाव में आई कमी की वजह से बनी है, जबकि पहले के दौर के राजनेता समाज की सेवा करने को अपना सौभाग्य मानते थे। लेकिन लोगों का मानना है कि आज के राजनेता अपना घर भरने के लिए भ्रष्ट तरीका अपनाते हैं। ज्यादातर निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के पास आज बड़े वाहन हैं और वे अपने लिए महल जैसा घर बनाते हैं।
राजधानी शिमला के माल रोड पर कुछ लोगों, समूहों और संगठनों ने भीख मांगते हुए सरकार के इस फैसले के प्रति विरोध जताया। आंदोलनकारी लोगों से भीख देने के लिए कह रहे थे, ताकि भीख में मिला पैसा निर्वाचित 'गरीब' जनप्रतिनिधियों को दिया जा सके। कुछ दशक पहले तक ऐसे विरोध के बारे में सोचा भी नहीं जा सकता था, क्योंकि तब समाज में जनप्रतिनिधियों की बेहतर छवि थी। समाजशास्त्रियों का कहना है कि घोटालों, धोखाधड़ी और भ्रष्टाचार के कारण मंत्रियों, सांसदों और विधायकों की प्रतिष्ठा धूमिल हुई है।