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संरक्षणवाद बना चुनौती

Mon, 19 Mar 2018 06:10 PM IST
जयंतीलाल भंडारी
जयंतीलाल भंडारी Updated Mon, 19 Mar 2018 06:10 PM IST
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protectionism become Challenge
जयंतीलाल भंडारी

हाल ही में अमेरिकी कारोबार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) रॉबर्ट लाइटहाइजर के कार्यालय ने विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) में भारत के खिलाफ कारोबारी विवाद आपत्तियों के निपटारे के लिए कठोर आवेदन प्रस्तुत किया है। इन कारोबार आपत्तियों में भारत सरकार द्वारा वस्तुओं के निर्यात को लेकर चलाई जाने वाली योजनाओं और निर्यात से जुड़ी इकाइयों की योजनाएं व अन्य ऐसी योजनाएं हैं, जो अमेरिका के कारोबार पर प्रतिकूल असर डाल रही हैं। भारत सरकार का कहना है कि उसके द्वारा दी जा रही विभिन्न राहत और सुविधाएं डब्ल्यूटीओ के तहत ही हैं। पर अमेरिका अन्यायपूर्ण ढंग से भारत पर व्यापार प्रतिबंध बढ़ाता दिखाई दे रहा है। ट्रंप प्रशासन द्वारा अमेरिका में आयातित इस्पात पर 25 फीसदी और एल्युमीनियम पर 10 फीसदी शुल्क लगाने के निर्णय के बाद भारत पर होने वाले प्रतिकूल प्रभावों के मद्देनजर भारत सरकार के वाणिज्य मंत्रालय और इस्पात व खनन विभाग ने शीघ्र नई कार्ययोजना तैयार करने का निर्णय लिया है। यह निर्णय भी लिया गया है कि डब्ल्यूटीओ में भारत पर अमेरिका के द्वारा लगाए जा रहे कारोबार प्रतिबंधों तथा अमेरिकी सरकार द्वारा लगाई जा रही कारोबार आपत्तियों का उपयुक्त जवाब दिया जाएगा और अपना न्यायोचित पक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।


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इसमें कोई दो मत नहीं है कि अमेरिका ने नए व्यापारिक प्रतिबंध लगाकर संरक्षणवाद पर आगे बढ़ने के साथ-साथ वैश्विक व्यापार युद्ध के दरवाजे पर दस्तक दी है। ट्रंप ने आयात शुल्क में इजाफे पर जो जोर दिया है, वह दरअसल अमेरिका के साथ कारोबारी शर्तों की कड़ाई का पहला चरण है। ट्रंप लंबे समय से यह कहते आ रहे हैं कि अमेरिका के कारोबारी साझेदार विभिन्न देश अमेरिका को कारोबार में भारी घाटा दे रहे हैं। वस्तुत: ट्रंप अमेरिकी औद्योगिक क्षेत्र को संरक्षण देकर उसमें नई जान फूंकना चाहते हैं। उनकी धारणा है कि वैश्वीकरण अमेरिकी अर्थव्यवस्था के लिए नुकसानदेह है।

अमेरिका के वाणिज्य मंत्री विल्बर रॉस ने यहां तक कह दिया है कि अमेरिका ने दूसरे विश्वयुद्ध के समाप्त होने के बाद से ही यूरोप और एशियाई देशों को भारी रियायतें दी हैं, अब इनके जारी रहने का कोई तुक नहीं है। पिछले एक वर्ष में अमेरिका जैसे-जैसे संरक्षणवाद की ओर बढ़ा है, वैसे-वैसे दुनिया के कई विकसित देशों ने उसका अनुसरण किया है।

स्पष्ट दिख रहा है कि अमेरिका एवं कई विकसित देश वस्तुओं एवं सेवाओं के आयात पर तरह-तरह के प्रतिबंध लगाकर वैश्विक व्यापार युद्ध का नया चिंताजनक परिदृश्य बना रहे हैं। अमेरिका का कहना है कि विश्व व्यापार की समस्या का संबंध चीन से सबसे ज्यादा है। चीन अपने उन वायदों पर खरा नहीं उतरा है, जो उसने डब्ल्यूटीओ के दायरे में आते समय किए थे। चीन ने कहा था कि वह अपने घरेलू बाजार को उदार बनाएगा तथा नियामकीय और मेहनताने के मानकों में सुधार करेगा। लेकिन वर्तमान परिदृश्य बता रहा है कि विश्व के साथ चीन का व्यापार चुनौतीपूर्ण है। अमेरिका ने न केवल चीन के साथ, बल्कि जापान, दक्षिण कोरिया, जर्मनी और भारत जैसे देशों के साथ भी व्यापार युद्ध की शुरुआत कर दी है। दुनिया के आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है कि यदि विश्व व्यापार व्यवस्था वैसे काम नहीं करती, जैसा कि उसे करना चाहिए, तो डब्ल्यूटीओ ही एक ऐसा संगठन है, जहां इसे दुरुस्त किया जा सकता है। अगर ऐसा नहीं हुआ, तो दुनिया भर में विनाशकारी व्यापार लड़ाइयां ही 21वीं शताब्दी की हकीकत बन जाएंगी।

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