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बदलाव: व्यापक कानूनी सुधारों की दिशा में बढ़े कदम, समय से न्याय मिलने की उम्मीद
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गृहमंत्री अमित शाह
- फोटो :
ANI
विस्तार
पिछले दिनों गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में तीन विधेयकों के माध्यम से 19वीं सदी के तीन महत्वपूर्ण कानूनों के भारतीय प्रारूप को पेश किया। भारतीय दंड संहिता, 1860 की जगह भारतीय न्याय संहिता, मूलतः 1878 में पारित दंड प्रक्रिया संहिता की जगह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता तथा इंडियन एविडेंस ऐक्ट, 1872 की जगह भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 नामक तीन विधेयक लाए गए।
आधुनिक समाज की जरूरतों के पैमाने पर ये कानून पुराने पड़ चुके थे। नई परिस्थितियों में नए तरह के अपराध हो रहे हैं। अपराधियों के काम करने के तरीकों में अंतर आया है। उनसे निपटने के लिए कानून तथा साक्ष्य इकट्ठा करने के नए तरीके अपनाना जरूरी था। समय-समय पर नए कानूनों के पैबंदों के जरिये उनमें मरम्मत भी की जाती रही, जो नाकाफी रही। कई बार इन कानूनों में परिवर्तन के सुझाव भी आए। वर्ष 1971 में विधि आयोग की 42वीं रिपोर्ट में इस तरह के व्यापक बदलाव का सुझाव दिया गया। उस पर अमल करने के लिए 1972 तथा 1978 में सरकार की ओर से विधेयक भी लाया गया। किंतु दोनों बार लोकसभा भंग हो जाने के कारण व्यपगत हो गया था। वर्ष 2003 में मलिमथ कमेटी ने भी अपनी रिपोर्ट में व्यापक सुधारों का सुझाव दिया था।
प्रस्तावित भारतीय न्याय संहिता में मौजूदा भारतीय दंड संहिता की 511 धाराओं की जगह सिर्फ 356 धाराएं होंगी। अप्रासंगिक हो चुकीं 22 धाराएं निरस्त कर दी गई हैं। पुरानी 175 धाराओं में कुछ संशोधन कर उन्हें शामिल कर लिया गया है तथा आठ नई धाराएं जोड़ी गई हैं। अदालत की कार्यवाही के दौरान आधुनिक तकनीक को स्थान देने के लिए पुरानी दंड प्रक्रिया संहिता की 478 धाराओं की जगह अब 511 धाराएं होंगी। उनमें 160 धाराओं में संशोधन किया गया है, नौ नई जोड़ी गई हैं तथा 22 निरस्त की गई हैं। भारतीय साक्ष्य अधिनियम में पहले 167 धाराएं थीं, जिनकी जगह अब 170 धाराएं होंगी। इसमें 23 धाराओं में संशोधन किया गया है तथा पांच निरस्त की गई हैं।
वर्ष 1860 में जब भारतीय दंड संहिता तैयार की गई थी, तब वह दुनिया की सबसे पहले लिपिबद्ध की गई दंड संहिता थी। उस समय तक के तमाम अदालती अनुभवों का संहिताकरण कर दिया गया था, किंतु उसमें व्यापक परिवर्तनों की जरूरत थी। राजद्रोह से जुड़े प्रावधान पर लगातार सवाल उठ रहे थे। ब्रिटेन, अमेरिका, न्यूजीलैंड, ऑस्ट्रेलिया, सिंगापुर और स्कॉटलैंड जैसे देशों ने उसके पुराने स्वरूप को हटा दिया। उसकी सबसे बड़ी कमी यह थी कि वह न्याय की आधुनिक अवधारणा के अनुरूप नहीं हैं। अपराध के लिए किसी आशय का होना जरूरी होता है, किंतु भारतीय दंड संहिता की धारा 124ए में राजद्रोह के अपराध के लिए आशय की जरूरत नहीं है। यदि अदालत में साबित कर दिया जाए कि किसी के शब्दों, संकेतों एवं अभिव्यक्ति के दूसरे साधनों द्वारा विधि द्वारा स्थापित सरकार के प्रति घृणा या अवमानना की गई या उसका प्रयास किया गया, तो उसे राजद्रोह का दोषी ठहराया जा सकता है।
प्रस्तावित विधेयक में इसकी जगह धारा 150 में इसका बेहतर और संशोधित स्वरूप लाया गया है। इसमें कहा गया है कि जब कोई व्यक्ति जान-बूझकर या उद्देश्यपूर्वक अपने शब्दों या अन्य माध्यमों से संप्रभुता या अखंडता को खतरे में डालता है या सशस्त्र विद्रोह को उकसाता है या उसका प्रयास करता है, तो वह इस धारा के अधीन दोषी होगा।
पिछले कुछ दशकों में अलग तरह के अपराधों में भी वृद्धि हुई है, जो परिभाषित नहीं हैं। जैसे, पहचान छिपाकर यौन संबंध बनाने, नफरती भाषण देने और चेन स्नैचिंग जैसे अपराधों के मामलों में कानूनी उपबंध नाकाफी साबित हो रहे थे। प्रस्तावित कानून में इनके लिए अलग उपबंध हैं और सजा की व्यवस्था है। नाबालिग बच्चों से दुष्कर्म की घटनाओं पर मृत्युदंड तक का प्रावधान है। मॉब लिंचिंग के अपराध को केवल धार्मिक उन्माद से होने वाली हिंसा तक सीमित न कर व्यापक रूप दिया गया है। जब पांच या अधिक व्यक्ति नस्ल, समूह, समुदाय, लिंग, जन्म स्थान, भाषा, निज विश्वास या अन्य आधार पर हत्या करता है, तो समुह का हर सदस्य हत्या का दोषी होगा, जिसमें न्यूनतम सात साल तथा अधिकतम मौत की सजा हो सकती है। इसकी परिभाषा इतनी व्यापक है कि इसमें डायन घोषित करके महिलाओं के विरुद्ध की जाने वाली हिंसा के मामलों को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।
कुछ वर्षों पहले 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने नवतेज जौहर बनाम भारत संघ के मामले में अप्राकृतिक यौन संबंधों से जुड़ी धारा 377 को आंशिक रूप से असांविधानिक घोषित कर दिया था तथा वयस्कों द्वारा सहमति से बनाए संबंधों को मान्यता दे दी थी। नए कानून में इस निर्णय को ध्यान में रखते हुए दंड संहिता की धारा 377 को समाप्त कर दिया गया है। अब सहमति से समलिंगी संबंध पर सजा नहीं होगी।
आतंकी गतिविधियों के बारे में भारतीय न्याय संहिता में अलग से उपबंध जोड़ा गया है। अब तक इसके लिए यूएपीए के अंतर्गत मुकदमे दर्ज होते थे। प्रस्तावित न्याय संहिता की धारा 111 में आतंकी कृत्य को परिभाषित किया गया है। इसमें भारत में या उसके बाहर भारत की एकता, अखंडता या संप्रभुता को खतरे में डालने के आशय से कोई आतंकी गतिविधि करता है या रासायनिक हथियार या जहरीली गैस का इस्तेमाल करता है या ऐसा करते हुए लोगों के मन में दहशत पैदा करता है या भारतीय संस्थानों को डराने या अस्थिर करने की मंशा से कार्य करता है, तो इन्हें आतंकी कृत्य माना गया है और अधिकतम मौत की सजा तक का प्रावधान है।
छोटे-मोटे मामलों में-मसलन, चोरी के 5,000 रुपये तक के मामलों में पहली बार अपराध करने पर सामुदायिक सेवा को सजा के नए विकल्प के रूप में शुरू करना सकारात्मक पहल है। ऐसे मामलों में मजिस्ट्रेट द्वारा संक्षिप्त विचारण कर समय से न्याय मिलने की स्वस्थ परंपरा शुरू होगी। मानहानि के मामले में नई धारा 354(2) में भी सजा के विकल्प के रूप में सामुदायिक सेवा की सजा की व्यवस्था है। किंतु अब भी उसके लिए दो वर्ष तक अधिकतम सजा रखे जाने की व्यवस्था बरकरार रखने की बात समझ से परे है। इस पर विचार किया जाना चाहिए।
-प्रोफेसर तथा डीन, विधि संकाय, तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय, मुरादाबाद।